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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा : पेड़ों को काटने के बजाय प्रत्यारोपण बेहतर विकल्प, मांगी रिपोर्ट
Thu, 05 May 2022 06:20 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 05 May 2022 06:20 AM IST
सार
अदालत ने उप वन संरक्षक विभाग से तीन वर्ष में काटे गए पेड़ों की संख्या पर मांगी रिपोर्ट। दिल्ली के हरित आवरण को बनाए रखने और बढ़ाने के साथ-साथ पूर्ण विकसित पेड़ों को काटने की अनुमति है।
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दिल्ली हाईकोर्ट
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
उच्च न्यायालय ने कहा कि पूरी तरह से उगे पेड़ों को काटने के बजाय प्रत्यारोपण करना तर्कसंगत और विवेकपूर्ण होगा। अदालत ने दिल्ली सरकार के उप वन संरक्षक (डीसीएफ) विभाग को पिछले तीन वर्षों में माह और क्षेत्र वार काटे जाने वाले और प्रत्यारोपित पेड़ों की संख्या, पौधरोपण की स्थिति फोटो सहित पेश करने का निर्देश दिया है।
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पेड़ काटने संबंधी अदालत के आदेश की अवमानना के एक मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता आदित्य एन प्रसाद ने अदालत को बताया कि दिल्ली में हर घंटे आधिकारिक मंजूरी के तहत एक पेड़ काटा जाता है यह एक चिंताजनक मुद्दा है। दिल्ली के हरित आवरण को बनाए रखने और बढ़ाने के साथ-साथ पूर्ण विकसित पेड़ों को काटने की अनुमति है।
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न्यायमूर्ति नजमी वजीरी ने कहा कि पेड़ आशा, विवेक, पर्यावरण मोचन और यहां तक कि साहचर्य की जीवित संस्थाओं का स्वागत और आश्वासन देते हैं और उन्हें बेवजह काटने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। अदालत ने मामले की प्रकृति को देखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन को न्याय मित्र नियुक्त किया है।
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प्रसाद ने अदालत का ध्यान लोक निर्माण विभाग के अभियंता प्रमुख द्वारा 17 मई 2013 को एनजीटी के समक्ष दायर एक हलफनामे की ओर भी दिलाया, जिसमें यह कहा गया था कि 46 सड़कों का तुरंत पुन: दौरा किया जाएगा और नोट किए गए 3,279 पेड़ों को डी-कंक्रीट किया जाएगा।
अदालत ने पिछले आदेश पर ध्यान दिया जिसमें दिखाया गया था कि वृक्ष अधिकारी ने 25-30 वर्ष की आयु के पूर्ण विकसित पेड़ को काटने की अनुमति दी थी। अदालत ने वृक्ष अधिकारी को स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि क्या उन्होंने साइट का निरीक्षण किया है और इसे काटने की अनुमति देने से पहले पेड़ों का आकलन किया है।
यह ध्यान में रखना होगा कि दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम के तहत अनुमति मांगी गई है, जिसमें पेड़ों का संरक्षण प्राथमिक लक्ष्य है। अदालत ने कहा वृक्ष अधिकारी जनता के विश्वास और विश्वास का भंडार है, जो पेड़ लोगों के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा हैं, उन्हें बेवजह या बेवजह काटे जाने की अनुमति नहीं है।
सावरकर की जीवनी मामले में पांच और ट्वीट हटाने के आदेश
उच्च न्यायालय ने माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर को इतिहासकार ऑड्रे ट्रुशके द्वारा विनायक दामोदर सावरकर की दो खंड की जीवनी के संबंध में कथित साहित्यिक चोरी पर इतिहासकार डॉ विक्रम संपत के खिलाफ पोस्ट किए गए पांच और ट्वीट्स हटाने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति अमित बंसल ने कहा कि विचाराधीन ट्वीट्स मानहानि कारक प्रकृति के हैं। इनमें पत्रों के लिए एक लिंक पोस्ट किया गया है।
अदालत ने इनके प्रकाशन पर 18 फरवरी और 24 फरवरी के आदेश में रोक लगा दी थी। संपत की और से दायर आवेदन में ट्रुश्के द्वारा ट्विटर पर पोस्ट किए गए अपमानजनक ट्वीट्स को हटाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। इससे पहले भी इस साल फरवरी में कोर्ट ने संपत के खिलाफ ट्रुशके द्वारा किए गए कुछ ट्वीट्स को हटाने का आदेश दिया था।
याचिकाकर्ता ने ऑड्रे ट्रुश्के और अन्य व्यक्तियों के खिलाफ रॉयल हिस्टोरिकल सोसाइटी को भेजे गए एक पत्र पर मुकदमा दायर किया है। इसमें उनके खिलाफ एक जर्नल प्रकाशन और विनायक दामोदर सावरकर की दो खंड की जीवनी मामले में साहित्यिक चोरी के आरोप लगाए गए हैं। मुकदमे में कहा गया है कि इतिहासकार ट्रुश्के और अन्य व्यक्तियों जैसे अनन्या चक्रवर्ती और रोहित चोपड़ा ने 11 फरवरी को लंदन में रॉयल हिस्टोरिकल सोसाइटी को पत्र लिखकर साहित्यिक चोरी के गंभीर आरोप लगाए थे।
ई-वाहनों के बीमा मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस
इलैक्ट्रिक वाहनों का बीमा अनिवार्य करने और बिना बीमा के शोरूम से वाहनों के बाहर निकालने पर प्रतिबंध की मांग को लेकर उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई है। अदालत ने इस मुद्दे पर केंद्र व दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी व न्यायमूर्ति नवीन चावला की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को 20 अक्तूबर तक इस मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। याची अधिवक्ता आरके कपूर में पीठ को बताया कि इलैक्ट्रिक वाहनों के लिए सरकार की नीति स्पष्ट नहीं है और सरकार ने जल्दबाजी में वाहनों को चलाने की मंजूरी प्रदान कर दी। नीति को अब तत्काल प्रभाव से अधिसूचित किया गया है।
याची ने कहा सरकार ने तय नीति में कहा है कि इलैक्ट्रिक वाहनों विशेषकर छोटे वाहनों के लिए न तो बीमा जरूरी किया है न ही लाइसेंस और पंजीकरण। याची ने कहा मोटर वाहन अधिनियम 1988 के तहत मोटर वाहनों के लिए बीमा अनिवार्य है, जैसा कि एमवी अधिनियम की धारा 146 के अवलोकन से स्पष्ट है। उन्होंने कहा जिस दर से लोग इलेक्ट्रिक वाहन खरीद रहे हैं।