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मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर भाजपा के हाथ इतने खाली क्यों हैं?

Tue, 07 Jan 2020 07:09 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 07 Jan 2020 07:09 PM IST
सार

  • मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर केजरीवाल पड़ रहे हैं भारी
  • चेहरा घोषित करके भीतरघात का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती पार्टी
  • सीएम बनने की कतार में भाजपा के पास हैं कई चेहरे
  • टिकट बंटवारे में पारदर्शिता, बूथ, पन्ना प्रमुख प्रबंधन, घर-घर दस्तक है भाजपा के प्रचार की ताकत

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delhi election 2020: BJP will contest delhi assembly polls without CM face
kejriwal and manoj tiwari

विस्तार

आम आदमी पार्टी के पास मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया का चेहरा है। हाल में आए सर्वेक्षण से साफ है कि पार्टी के मुख्यमंत्री के तौर पर केजरीवाल का चेहरा भाजपा और कांग्रेस के तमाम चेहरों पर भारी पड़ रहा है। भाजपा के हाथ चुनाव मतदान से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के मामले में खाली हैं। पार्टी के अध्यक्ष और देश के गृहमंत्री प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे को आगे करके दिल्ली में सफलता का सूत्र तैयार कर रहे हैं।
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वहीं, कांग्रेस की हालत और पतली है। न वह अजय माकन, अरविंदर सिंह लवली, सुभाष चोपड़ा जैसे नेताओं का चेहरा आगे चुनाव लड़ने का जोखिम उठाना चाहती है और न ही वह इस बारे में कुछ बोल रही है।

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भाजपा के पास कई चेहरे हैं, पर जोखिम लेने के मूड में नहीं

पूर्व मुख्यमंत्री स्व. साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश साहिब सिंह वर्मा को अवसर मिलेगा, तो वह अपने पिता की विरासत संभालने के मूड में हैं। प्रवेश दिल्ली से भाजपा सांसद हैं। उनकी राजनीतिक सक्रियता भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अच्छी लगती है।

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डा. हर्ष वर्धन भाजपा का सबसे गैर विवादित, साफ-सुथरा, सौम्य चेहरा हैं। दिल्ली के पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी मानस से लेकर आम जन में उनकी अच्छी छवि है। फिलहाल वह केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हैं और 2015 में भाजपा ने उनके नाम पर चुनाव लड़ने से परहेज किया था। दिल्ली प्रदेश भाजपा से लेकर राष्ट्रीय भाजपा नेता आज भी 2015 में डा. हर्ष वर्धन को चेहरा घोषित न करने पर अफसोस जताते हैं।

 

मनोज तिवारी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं। कड़ी मेहनत कर रहे हैं। पूर्वांचल से आते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के मतदाताओं में अलग पहचान रखते हैं, लेकिन भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता, गायक की छवि उनका पीछा छोड़ नहीं रही है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने काफी पहले तिवारी को इसके बाबत आगाह किया था। उन्हें नाच, गाने से दूर रहने की सलाह दी थी।

पार्टी में तिवारी के विरोधी भी उनके खिलाफ इस छवि को लगातार धार देते हैं। यह छवि उन्हें एक राजनेता नहीं बनने दे रही है और उनके ऊपर खुलकर दांव लगाने में भाजपा के हाथ बांध रही है।

 

विजय गोयल केंद्र सरकार में पूर्व मंत्री रहे हैं। पिछले काफी समय से वह कड़ी मेहनत कर रहे हैं। विजय गोयल जब केंद्र सरकार में मंत्री थे, तब भी उनका दिल्ली की राजनीति में लगातार मोह बना हुआ था। मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी रखते हैं।
 

विजेंद्र गुप्ता दिल्ली में 2015 में सफलता पाने वाले तीन विधायकों में से एक हैं। राजनीति की समझ रखते हैं। दिल्ली में विजेंद्र गुप्ता की भी अच्छी पकड़ है। इसके अलावा भाजपा के पास नामों की कमी नहीं है। इनमें से चुनाव बाद बहुमत या सरकार बनाने की स्थिति आने पर किसी को भी मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश हो सकती है, लेकिन पार्टी अभी जोखिम नहीं लेना चाहती।

क्यों जोखिम नहीं लेना चाहती भाजपा?

डा. हर्ष वर्धन को छोड़ दें, तो भाजपा का हर संभावित चेहरा अपनी महत्वाकांक्षा को आकार दे रहा है। इसी कारण किसी भी एक नाम को आगे करने पर जहां उसका केजरीवाल की तुलना में मूल्यांकन शुरू हो जाएगा, वहीं भाजपा के भीतर खींचतान शुरू हो जाएगी। दिल्ली के प्रभारी और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, पूर्व प्रभारी अरुण सिंह, दिल्ली प्रदेश भाजपा के संगठनात्मक ढांचे पर पकड़ रखने वाले श्याम जाजू समेत अन्य इस समीकर को अच्छी तरह से समझ रहे हैं।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह न केवल संगठनात्मक क्षमता से भरपूर हैं, बल्कि उनके पास चुनाव जीतने की हमेशा से अच्छी रणनीति रही है। वह अच्छे होमवर्क पर भरोसा करते हैं और पिटे मोहरे पर दांव लगाने परहेज भी करते हैं। माना जा रहा है कि इसी के कारण भाजपा अध्यक्ष दिल्ली में बिना कोई चेहरा घोषित किए मोदी सरकार की नीतियों, राष्ट्रवाद समेत अन्य पर चुनाव लड़ना चाहते हैं।

सीएम फेस के नाम पर कांग्रेस का पिटा है दिवाला

दिल्ली में 1998-2013 तक राज करने वाली कांग्रेस के बाद पूर्व मुख्यमंत्री स्व. शीला दीक्षित के बाद कोई ढंग का चेहरा नहीं है, जो कांग्रेस के सभी कार्यकर्ताओं, नेताओं को मोटिवेट कर सके। उसके पास प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा की तरह कुछ गैर विवादित नाम हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव 2020 की मौजूदा स्थिति में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके जनादेश बढ़ाने वाले व्यक्तित्व की उसे कमी खल रही है।

इस मामले में कांग्रेस की स्थिति भाजपा से भी पतली है। वह कीर्ति आजाद, अजय माकन, अरविंदर सिंह लवली जैसे नामों को आगे करने का साहस नहीं जुटा पा रही है।

कितना अहम होगा दिल्ली में मुख्यमंत्री का चेहरा?

देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकप्रियता के मामले में शीर्ष पर हैं। प्रधानमंत्री के बाद दूसरे नंबर का राजनीतिक चेहरा कतार में बहुत दूर है। इसके समानांतर सर्वेक्षण से साफ है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के संयोजक, राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री के तौर पर जनता की पहली पसंद बने हैं। आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनाव में अपने कामकाज के मॉडल को आगे रखकर मतदाताओं के बीच में जा रही है।

इस चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच में ही होने की उम्मीद है। ऐसे में दिल्ली का स्थानीय मुद्दा वाला चेहरा कारगर साबित हो सकता है। धनेश कपूर, सियाराम शर्मा, कैप्टन कपिल रैना, सुनील मल्होत्रा जैसे दिल्लीवासियों का मानना है कि चुनाव में मुख्यमंत्री पद का चेहरा अहम भूमिका निभाएगा।

 

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