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दिल्ली: कोर्ट का आकार पटेल के खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर को वापस लेने का निर्देश, सीबीआई ने दायर की पुनर्विचार याचिका

Fri, 08 Apr 2022 01:06 PM IST
सुशील कुमार अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: सुशील कुमार Updated Fri, 08 Apr 2022 01:06 PM IST
सार

पटेल ने बताया कि लुकआउट नोटिस की जानकारी उन्हें नहीं थी। उन्हें पता भी नहीं है कि यह क्यों जारी किया गया है। उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने मुझे जाने नहीं दिया।

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Delhi court directs cbi to withdraw look out circular issued against activist aakar Patel
आकार पटेल - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

अदालत ने गुरुवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को विदेशी योगदान नियमन अधिनियम के कथित उल्लंघन के एक मामले में एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया बोर्ड के अध्यक्ष आकार पटेल के खिलाफ जारी लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) को वापस लेने का निर्देश दिया था, जिसके बाद सीबीआई ने कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है। अदालत ने कहा कि एजेंसी की ओर से सीबीआई निदेशक पटेल को लिखित में माफी मांगकर अपने अधीनस्थ की ओर से चूक को स्वीकार करें और इससे इस प्रमुख संस्थान में जनता का विश्वास बनाए रखने में मदद मिलेगी।

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अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट पवन कुमार ने अपने फैसले में जांच एजेंसी को 30 अप्रैल तक माफी मांग कर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि आर्थिक नुकसान के अलावा याची को मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्हें निर्धारित समय पर जाने की अनुमति नहीं मिली।
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अदालत ने कहा सीबीआई द्वारा अपनाया गया रुख एक अंतर्निहित विरोधाभासी है, एक तरफ सीबीआई का दावा है कि एलओसी जारी किया गया क्योंकि अर्जीकर्ता के विदेश भागने की आशंका थी और इसके विपरीत आरोपी को जांच और आरोप पत्र के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया तथा गिरफ्तारी के बिना आरोप पत्र दाखिल किया गया। अदालत ने कहा कि सीबीआई ने यह भी नहीं बताया कि जांच के दौरान या आरोप पत्र दाखिल करते समय क्या सावधानियां या उपाय किए गए ताकि मुकदमे के दौरान आरोपियों की उपस्थिति सुनिश्चित हो सके। 
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अदालत ने कहा दिलचस्प बात यह है कि जैसा कि जांच अधिकारी ने बताया है कि एलओसी जारी करने के लिए अर्जी उस दिन दी गई जब आरोपपत्र पूरा हो गया और अदालत में दाखिल करने के लिए भेज दिया गया था। अदालत ने कहा यह दिखाता है कि यह लापरवाही या अज्ञानता का मामला नहीं है, बल्कि यह जांच एजेंसी का आरोपी के मूल्यवान अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने का एक जानबूझकर किया गया कार्य है। यह जांच एजेंसी का मामला नहीं है कि आरोपी अपनी गिरफ्तारी से बचा या जांच में शामिल नहीं हुआ। अदालत ने कहा एलओसी जारी करने से पहले प्रभावित व्यक्ति के अधिकारों के परिणामों का अनुमान लगाया जाना चाहिए था। किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को कानून द्वारा स्थापित किसी भी प्रक्रिया के बिना कम नहीं किया जा सकता है।


जांच एजेंसी के कारण याची को हुआ आर्थिक नुकसानअदालत ने यह भी कहा कि एलओसी जारी करने से आरोपी को लगभग 3.8 लाख रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ क्योंकि वह अपनी उड़ान से चूक गए और उन्हें उसमें सवार नहीं होने दिया गया। अदालत ने कहा यह सही है कि एलओसी आगे बढाने का विवेकाधिकार जांच एजेंसी के पास है, लेकिन विवेकाधिकार का प्रयोग बिना किसी उचित कारण या आधार के मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है।

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