कोर्ट ने कहा : डर के माहौल में तुरंत गवाही देने की उम्मीद नहीं कर सकते
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट्ट ने कहा कि हिंसा के दौरान कई निर्दोष की जान चली गई और कई बेघर हो गए। दंगाइयों ने कई लोगों की दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को जला दिया। दंगों पर काबू पाने के बाद भी महीनों तक पूरी पूर्वोत्तर दिल्ली में आतंक और सदमे का माहौल बना रहा। हिंसा से आम जनता इतनी आहत थी कि कोई भी पुलिस के सामने बयान देने को तैयार नहीं था।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दंगों के बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली में व्याप्त आतंक और डर के माहौल ने आम जनता को पुलिस के समक्ष बयान दर्ज कराने से रोक दिया था। अदालत ने एक आरोपी जावेद के खिलाफ आरोप तय करते हुए यह टिप्पणी की।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट्ट ने कहा कि हिंसा के दौरान कई निर्दोष की जान चली गई और कई बेघर हो गए। दंगाइयों ने कई लोगों की दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को जला दिया। दंगों पर काबू पाने के बाद भी महीनों तक पूरी पूर्वोत्तर दिल्ली में आतंक और सदमे का माहौल बना रहा। हिंसा से आम जनता इतनी आहत थी कि कोई भी पुलिस के सामने बयान देने को तैयार नहीं था।
अदालत ने कहा, सार्वजनिक व्यक्ति जो हिंसा के गवाह थे, उनसे पुलिस को बयान देने के लिए तुरंत आगे आने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। पुलिस को दोहरी भूमिका निभानी पड़ी। शांति बहाली के साथ जांच भी। पुलिस को दंगों को नियंत्रित करने के लिए कहा गया था। अदालत ने कहा पुलिस को शांति बहाल करना के साथ जनता में सुरक्षा की भावना पैदा के अलावा उन्हें दंगों के बाद दर्ज की गई सैकड़ों प्राथमिकी में जांच करनी पड़ी। गवाहों और अपराधियों का पता लगाना पुलिस के लिए एक कठिन काम था। इन परिस्थितियों में केवल देरी के कारण गवाहों के बयानों को खारिज करना न्याय का उपहास होगा।
वहीं आरोपी के अधिवक्ता ने अपने मुवक्किल को आरोपमुक्त करने की मांग करते हुए तर्क रखा कि दो सार्वजनिक गवाहों के बयान दर्ज करने में लगभग एक साल की देरी हुई। उन्होंने तर्क दिया कि एक पुलिसकर्मी का बयान, जिसने कथित तौर पर अपने मुवक्किल की पहचान की थी, प्राथमिकी दर्ज होने के एक महीने बाद पहली बार दर्ज किया गया था जो अपने आप में विलंबित है।
नफरत फैलाने वाले भाषण संबंधी याचिका पर विचार से इनकार
हाईकोर्ट ने बृहस्पतिवार को दंगों को भड़काने के लिए कथित नफरत फैलाने वाले भाषण में नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग वाली हस्तक्षेप याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। भाजपा नेताओं कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और अभय वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और जांच की मांग को लेकर शेख मुजतबा की याचिका में हस्तक्षेप याचिका दायर की गई थी। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनूप जे भंभानी की खंडपीठ ने कहा कि कार्यान्वयन आवेदन की अनुमति नहीं दी जा सकती। क्योंकि, आवेदक न तो एक उचित और न ही एक आवश्यक पक्ष है।