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बदलती छात्र राजनीति: ओडिशा से दिल्ली तक एबीवीपी का दबदबा, युवाओं के मुद्दों पर टिकी नजरें
Sat, 17 Oct 2026 06:48 PM IST
Digvijay Singh
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
Published by: Digvijay Singh
Updated Sat, 17 Oct 2026 06:48 PM IST
सार
देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र राजनीति की तस्वीर बदलती नजर आ रही है। ओडिशा में करीब आठ साल बाद छात्रसंघ चुनाव बहाल होने के बाद आए नतीजों ने इस बदलाव को चर्चा में ला दिया है। राज्य के 13 विश्वविद्यालयों में से आठ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने जीत दर्ज की।
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ओडिशा से दिल्ली तक एबीवीपी का दबदबा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र राजनीति की तस्वीर बदलती नजर आ रही है। ओडिशा में करीब आठ साल बाद छात्रसंघ चुनाव बहाल होने के बाद आए नतीजों ने इस बदलाव को चर्चा में ला दिया है। राज्य के 13 विश्वविद्यालयों में से आठ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने जीत दर्ज की, जबकि बीजू जनता दल के छात्र संगठन बीसीजेडी को पांच विश्वविद्यालयों में सफलता मिली। महाविद्यालयों के स्तर पर भी एबीवीपी ने 342 में से 208 संस्थानों में जीत हासिल की। वहीं, बीसीजेडी को 117 और कांग्रेस समर्थित भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) को 17 महाविद्यालयों में सफलता मिली।
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दिल्ली से पंजाब और उत्तराखंड तक प्रदर्शन
ओडिशा के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में भी एबीवीपी ने चार प्रमुख पदों में से तीन—अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव—पर जीत दर्ज की। पंजाब विश्वविद्यालय में संगठन ने लगातार दूसरी बार अध्यक्ष पद हासिल किया। उत्तराखंड के देहरादून, मसूरी, अल्मोड़ा और बागेश्वर जैसे क्षेत्रों के महाविद्यालयों में भी एबीवीपी के उम्मीदवारों ने कई प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। इन नतीजों ने अलग-अलग राज्यों के शैक्षणिक परिसरों में संगठन की सक्रियता को चर्चा में ला दिया है।
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निर्दलीय उम्मीदवारों से बदल सकते हैं समीकरण
इन चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत भी महत्वपूर्ण रही। कई परिसरों में विद्यार्थियों ने व्यक्तिगत लोकप्रियता और जनसंपर्क के आधार पर चुनाव जीता। चुनाव के बाद कुछ निर्दलीय विजेताओं के एबीवीपी के करीब आने या उसे समर्थन देने की चर्चाएं हैं। यदि ये अनौपचारिक जुड़ाव आगे चलकर औपचारिक रूप लेते हैं, तो संबंधित परिसरों में संगठन की स्थिति बदल सकती है। हालांकि, निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत और किसी संगठन की आधिकारिक जीत में अंतर है। इसी तरह, समर्थन और औपचारिक सदस्यता को भी अलग-अलग देखना जरूरी है।
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जेनरेशन ज़ी की प्राथमिकताएं और संगठन की कसौटी
सोशल मीडिया और छोटे वीडियो का दौर होने के बावजूद छात्र राजनीति में युवाओं की भागीदारी बनी हुई है। आज की जेनरेशन ज़ी यानी नई युवा पीढ़ी शिक्षा की गुणवत्ता, शुल्क में पारदर्शिता, छात्रवृत्ति और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर सजग है। ऐसे में छात्र संगठनों के लिए केवल चुनाव के समय सक्रिय रहना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों के बीच लगातार मौजूदगी दर्ज कराना और उनकी समस्याओं को लेकर आवाज उठाना भी महत्वपूर्ण है।
भोजनालयों में खाने की गुणवत्ता, छात्रावासों की स्थिति और परीक्षा परिणामों में देरी जैसे मुद्दे विद्यार्थियों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े हैं। इन समस्याओं को लेकर संगठन कितनी सक्रियता दिखाते हैं, इसका असर विद्यार्थियों के भरोसे पर पड़ सकता है। एबीवीपी के हालिया प्रदर्शन के पीछे संगठनात्मक सक्रियता और कार्यकर्ताओं के मजबूत नेटवर्क की भूमिका को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
जीत के बाद असली चुनौती
ओडिशा से दिल्ली और उत्तराखंड तक मिली जीत ने एबीवीपी को छात्र राजनीति में अपनी सक्रियता दिखाने का अवसर दिया है। हालांकि, चुनाव जीतने के बाद विद्यार्थियों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना उसके लिए बड़ी चुनौती होगी। आज का विद्यार्थी चुनावी वादों के साथ-साथ उनके क्रियान्वयन का भी हिसाब चाहता है।
ऐसे में इन नतीजों का वास्तविक महत्व इस बात से तय होगा कि छात्र संगठन शैक्षणिक परिसरों की बुनियादी समस्याओं को हल करने के लिए कितने प्रभावी कदम उठाते हैं। चुनावी सफलता को विद्यार्थियों के हित में किए गए काम में बदल पाना ही किसी भी संगठन के लिए आगे की सबसे बड़ी कसौटी होगी।