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दिल्ली : केंद्र ने कोरोना महामारी के दौरान समलैंगिक विवाह को मान्यता मुद्दे पर जल्द सुनवाई पर जताई आपत्ति

Mon, 24 May 2021 11:46 PM IST
सुशील कुमार कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: सुशील कुमार कुमार Updated Mon, 24 May 2021 11:46 PM IST
सार

मेहता ने कहा आपको अस्पतालों के लिए मैरिज सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। याचिका में हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम और विदेशी विवाह अधिनियम के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग की गई है।
 

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Center objected to early hearing on the issue of recognition of same sex marriage during the Corona epidemic
अदालत ने सुनाई सजा - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

केंद्र ने वर्तमान में कोविड महामारी के दौरान भारत में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के मुद्दे पर तत्काल सुनवाई पर आपत्ति जताई है। केंद्र ने कहा न तो अस्पताल में भर्ती के लिए मैरिज सर्टिफिकेट की जरूरत है और कोई इस बात पर मर रहा है कि उसके पास मैरिज सर्टिफिकेट नहीं है। अदालत ने मामले की सुनवाई छह जुलाई के लिए स्थगित कर दी।
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राजीव सहाय एंडलॉ व न्यायमूर्ति अमित बंसल की खंडपीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले की सुनवाई पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कोविड-19 महामारी की विनाशकारी दूसरी लहर के बीच सरकार केवल वास्तविक जरूरी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। मेहता ने कहा आपको अस्पतालों के लिए मैरिज सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। याचिका में हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम और विदेशी विवाह अधिनियम के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग की गई है।
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याचिकाकर्ता की और से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सौरब कृपाल ने तर्क रखा कि ऐेसे मामले में सरकार को तटस्थ होना चाहिए और अदालत को इस विषय की तात्कालिकता का निर्धारण करना है। वहीं अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने भी तत्काल सुनवाई के लिए दबाव डालते हुए तर्क रखा कि इससे लाखों नागरिकों के दैनिक जीवन पर असर पड़ा। उन्होंने कहा कि हमें अस्पतालों, चिकित्सा उपचार में छोड़ दिया जाता है।
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सॉलिसिटर जनरल ने गुरुस्वामी के तर्क पर आपत्ति जताते हुए सुनवाई के लिए रोस्टर बदलने का मामला उठाया। खंडपीठ ने केंद्र से रोस्टर के सवाल पर अपना स्पष्टीकरण देने को कहा है। गुरुस्वामी ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने याचिकाओं को इस पीठ के पास सुनवाई के लिए भेजा है। फरवरी में केंद्र ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिकता को गैरकानूनी घोषित करने के बावजूद समलैंगिक विवाह देश में मौलिक अधिकार नहीं है।

केंद्र सरकार ने यह भी कहा था कि समान लिंग के जोड़े को पार्टनर के रूप में एक साथ रहने और यौन संबंध रखने की तुलना एक 'भारतीय परिवार इकाई' के साथ नहीं की गई। केंद्र सरकार ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अधीन है, और समलैंगिक विवाह न तो मान्यता प्राप्त है और न ही किसी भी अशोधित व्यक्तिगत कानूनों या किसी संहिताबद्ध सांविधिक कानूनों में स्वीकार किए जाते हैं।

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