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दिल्ली : कोरोना काल में बढ़ गया सांसों पर संकट, एम्स में डॉक्टरों का टोटा, बिस्तरों की भी किल्लत

परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 16 Oct 2021 05:38 AM IST

सार

एम्स में श्वसन रोग विशेषज्ञ केवल तीन स्थायी और दो अस्थायी डॉक्टरों के दम पर चल रहा है। मरीजों को तारीख मिलना भी मुश्किल, एम्स के डॉक्टर ही सोशल मीडिया पर उठा रहे सवाल।
एम्स दिल्ली
एम्स दिल्ली - फोटो : फाइल
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विस्तार

कोरोना काल में सांसों पर संकट बढ़ा है। संक्रमण की चपेट में आने वाले मरीजों को सांस लेने में कठिनाई जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। संक्रमण से ठीक होने के बाद भी काफी मरीजों के फेफड़े पहले जितने स्वस्थ नहीं रह पा रहे हैं। इनका पल्मोनरी यानी श्वसन रोग तंत्र से जुड़े विशेषज्ञों की निगरानी में लंबे समय तक उपचार की जरूरत है। देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में यह काफी जटिल हो चुका है।

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दिल्ली एम्स में पूरा पल्मोनरी विभाग केवल तीन स्थायी और दो अस्थायी डॉक्टरों के दम पर चल रहा है। ये डेढ़ साल से क्षमता से अधिक मरीजों का उपचार कर रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि मरीजों की संख्या बढ़ने के कारण उन्हें तारीख मिलना भी मुश्किल हो गई है। यह स्थिति तब है, जब एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया स्वयं पल्मोनरी विभाग के प्रमुख रह चुके हैं। वे कोरोना महामारी को लेकर देशभर में लगातार डॉक्टरों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। 


जानकारी के अनुसार, एम्स के डॉक्टर ही संस्थान की कमियों को लेकर सोशल मीडिया पर शिकायतें कर रहे हैं। मरीजों की दुहाई देते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय और पीएमओ को टैग भी कर रहे हैं। डॉ. विजय गुर्जर ने एक मरीज का चिकित्सा कार्ड सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा कि पल्मोनरी विभाग में पर्याप्त डॉक्टर न होने की वजह से मरीजों के कार्ड पर एनडीए (नो डेट अवेलबल) लिखा जा रहा है। गरीब मरीजों को उपचार के लिए डेट नहीं मिल पा रही है। वहीं एम्स में कोरोना और पोस्ट कोविड के चलते काफी वीआईपी इलाज करा रहे हैं। इससे डॉक्टरों की कमी और गंभीर हो गई है। 

इस मामले में एम्स प्रबंधन ने कोई टिप्पणी नहीं की है। पल्मोनरी विभागाध्यक्ष डॉ. अनंत मोहन ने इसके पीछे डॉक्टरों की संख्या कम होने को कारण बताया। इधर, अस्पताल के चिकित्सकों का कहना है कि केवल रेजीडेंट डॉक्टरों के भरोसे ही ज्यादातर मरीजों का उपचार हो रहा है। ओपीडी आने वाले 80 से 90 फीसदी मरीजों को रेजीडेंट डॉक्टर ही डील कर रहे हैं। वरिष्ठ और फैकल्टी के डॉक्टर वीआईपी और सोर्स वाले मरीजों का इलाज कर रहे हैं। 

एम्स में बिस्तरों का संकट भी बढ़ा
पल्मोनरी के अलावा एम्स के गैस्ट्रो विभाग में भी मरीजों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। एक 40 वर्षीय मरीज को लिवर की गंभीर बीमारी होने के बाद भी इसलिए भर्ती नहीं किया गया, क्योंकि पर्याप्त बिस्तर नहीं हैं। यह मरीज जीबी पंत से लेकर कई सरकारी अस्पतालों में चक्कर लगाने के बाद एम्स पहुंचा था। डॉक्टरों ने इस मरीज के दर्द को साझा करते हुए चिकित्सा सेवाओं में विस्तार की मांग की है।

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