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Bank Strike: अनुपम बोले- मुनाफे में चल रहे बैंकों का निजीकरण, अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा सरकार का ये कदम 

Thu, 16 Dec 2021 09:05 PM IST
अभिषेक दीक्षित डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Thu, 16 Dec 2021 09:05 PM IST
सार

'युवा हल्ला बोल' पिछले कई महीनों से राष्ट्रीय संपत्तियों को बेचे जाने के विरोध में 'हम देश नहीं बिकने देंगे' मुहिम चला रही है।

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Bank Strike: Anupam said That Privatization of profitable banks this step of the government will weaken the economy
बैंकों की हड़ताल - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दिल्ली के जंतर मंतर समेत देश के कई हिस्सों में बैंककर्मियों ने निजीकरण के विरोध में प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन बैंक यूनियनों के समूह यूएफबीयू द्वारा दो दिवसीय हड़ताल के अवसर पर किया गया। देशभर में बेरोजगारी को अहम मुद्दा बनाने वाले युवा हल्ला बोल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुपम ने प्रदर्शन में शामिल होकर बैंककर्मियों को समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि मुनाफे में चल रहे बैंकों का निजीकरण देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा।

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युवा नेता अनुपम ने कहा कि मुनाफा कमा रहे राष्ट्रीय उपक्रमों को निजी हाथों में बेचने की नीति का बेरोजगारी और महंगाई पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उन्होंने आगे कहा कि केंद्र सरकार की इस नीति को मोडानीकरण कहना चाहिए क्योंकि जहां एक तरफ मुनाफे का निजीकरण हो रहा है, वहीं घाटे का राष्ट्रीयकरण भी चल रहा है।
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'युवा हल्ला बोल' पिछले कई महीनों से राष्ट्रीय संपत्तियों को बेचे जाने के विरोध में 'हम देश नहीं बिकने देंगे' मुहिम चला रही है। अनुपम ने कहा कि बड़े पैमाने पर बैंकों में पद रिक्त होने के बावजूद सरकार इन पर नियुक्ति नहीं कर रही। इन पदों पर भर्ती करने का सीधा प्रभाव आम जनता को मिलने वाली सेवाओं पर पड़ता है। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि सरकार अपनी ही नाकामी का बहाना बनाकर बैंकों को बेचना चाहती है। 
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राष्ट्रीय संपत्ति बिक्री नीति के मुखर विरोधी 'युवा हल्ला बोल' के राष्ट्रीय महासचिव प्रशांत कमल ने कहा कि हम जानते हैं कि हड़ताल से आम आदमी को थोड़ी असुविधा होगी, लेकिन हमें बड़ी आफत को टालने के लिए थोड़ी असुविधा उठाने के लिए तैयार होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि असल असुविधा सिर्फ दो दिन के हड़ताल से नहीं बल्कि 12 बैंकों में 41777 पद के रिक्त होने से है। इन रिक्त पदों की वजह से आम ग्राहकों को हर दिन असुविधा का सामना करना पड़ता है। सरकार को चाहिए कि इन रिक्त पदों को भरकर राष्ट्रीयकृत बैंकों को और मजबूत बनाए ताकि आम लोगों की गाढ़ी कमाई सुरक्षित रह सके। सरकारी नौकरियों की मांग कर रहे युवाओं को सरकारी उपक्रम बेचे जाने का विरोध करना ही होगा, क्योंकि अगर सरकारी उपक्रम नहीं होंगे तो नौकरियां कहां से मिलेंगी।

अनुपम का कहना है कि मुनाफा कमा रहे बैंकों को इस कदर निजी हाथों में बेचना देशहित में नहीं हैं। सरकारी बैंकों का एकमात्र मकसद फायदा कमाना नहीं होता बल्कि जनता की सेवा, गरीबों को आर्थिक सुरक्षा और जनकल्याण कार्यों को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होता है। इसके बावजूद मुनाफे में चल रहे बैंकों का निजीकरण देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा। इसलिए यह मुद्दा सिर्फ बैंक कर्मचारियों का ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों का भी है। विशेषकर गरीब, मध्यम वर्ग और युवाओं के लिए तो यह गंभीर मुद्दा है। 


उन्होंने कहा कि देश का युवा आंदोलन पूरी ताकत से बैंक कर्मचारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस मुहिम में एकजुट दिख रहा है। संसद के वर्तमान सत्र में बैंक निजीकरण के उद्देश्य से लाए जाने वाले विधेयक की सुगबुगाहट ने इन विरोध प्रदर्शनों को और तेज कर दिया है। जिस प्रकार देशभर के बैंककर्मी और युवा आंदोलन एकजुट हो रहे हैं उसका केंद्र सरकार पर जरूर प्रभाव पड़ेगा।

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