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Delhi News: जामा मस्जिद दंगा मामले में 16 बरी
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कोर्ट ने अभियोजन की कहानी में संदेह होने का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया
नई दिल्ली। तीस हजारी कोर्ट ने 2012 में हुए दंगा, आगजनी के मामले में 16 आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार खरता ने अभियोजन की कहानी में संदेह होने का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया। मामला 21-22 जुलाई, 2012 की रात जामा मस्जिद के पास उर्दू बाजार क्षेत्र में हुए कथित दंगे, पथराव, आगजनी और पुलिस स्टेशन में तोड़फोड़ से संबंधित था।
24 सितंबर को सुनाए गए फैसले में कोर्ट ने कहा, अभियोजन के किसी भी गवाह ने आरोपियों की पहचान नहीं की, न ही व्यक्तिगत भूमिका को स्पष्ट किया गया। कोर्ट ने जांच अधिकारी (आईओ) की नाकामी पर सवाल उठाया, जो घटनास्थल या उस रास्ते से गुजरने वाली भीड़ का सीसीटीवी फुटेज जुटाने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा, अभियोजन के अनुसार, यह घटना लंबे समय तक चली और कई थाना प्रभारी सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे, लेकिन किसी ने भी मोबाइल फोन से घटना का वीडियो नहीं बनाया। ताकि आरोपियों के चेहरों की पहचान हो सके। इससे अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा होता है। कोर्ट ने यह भी बताया कि आरोपियों से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई। कार से चोरी की घटना को भी उनसे जोड़ा नहीं जा सका। न्यायिक परीक्षण पहचान परेड के माध्यम से आरोपियों की पहचान न हो पाना अभियोजन के मामले को कमजोर करता है।
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नई दिल्ली। तीस हजारी कोर्ट ने 2012 में हुए दंगा, आगजनी के मामले में 16 आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार खरता ने अभियोजन की कहानी में संदेह होने का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया। मामला 21-22 जुलाई, 2012 की रात जामा मस्जिद के पास उर्दू बाजार क्षेत्र में हुए कथित दंगे, पथराव, आगजनी और पुलिस स्टेशन में तोड़फोड़ से संबंधित था।
24 सितंबर को सुनाए गए फैसले में कोर्ट ने कहा, अभियोजन के किसी भी गवाह ने आरोपियों की पहचान नहीं की, न ही व्यक्तिगत भूमिका को स्पष्ट किया गया। कोर्ट ने जांच अधिकारी (आईओ) की नाकामी पर सवाल उठाया, जो घटनास्थल या उस रास्ते से गुजरने वाली भीड़ का सीसीटीवी फुटेज जुटाने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा, अभियोजन के अनुसार, यह घटना लंबे समय तक चली और कई थाना प्रभारी सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे, लेकिन किसी ने भी मोबाइल फोन से घटना का वीडियो नहीं बनाया। ताकि आरोपियों के चेहरों की पहचान हो सके। इससे अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा होता है। कोर्ट ने यह भी बताया कि आरोपियों से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई। कार से चोरी की घटना को भी उनसे जोड़ा नहीं जा सका। न्यायिक परीक्षण पहचान परेड के माध्यम से आरोपियों की पहचान न हो पाना अभियोजन के मामले को कमजोर करता है।
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