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प्रदूषण: आखिर क्यों फेल हो रहे हैं दिल्ली सरकार के हर उपाय, क्यों नहीं मिल पा रही है दिल्लीवासियों को साफ हवा

Tue, 26 Oct 2021 05:03 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Tue, 26 Oct 2021 05:03 PM IST
सार

दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में पराली जलाए जाने की घटनाएं लगातार हो रही हैं जो आने वाले दिनों में संकट के गंभीर होने का इशारा कर रही हैं, तो वाहनों का प्रदूषण अभी भी हवा को दमघोंटू बना रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए कई बड़े कदम उठाये, बावजूद इसके इनका अपेक्षित असर नहीं हो पा रहा है...

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Pollution: Why all the efforts of Delhi government are failing to stop pollution
दिल्ली में प्रदूषण - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

दिल्ली सरकार राजधानी का प्रदूषण कम करने के लिए विभिन्न उपाय कर रही है, लेकिन इस समय हवा की गुणवत्ता बता रही है कि ये सारे उपाय कोई विशेष असर छोड़ने में नाकाम साबित हो रहे हैं। दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में पराली जलाए जाने की घटनाएं लगातार हो रही हैं जो आने वाले दिनों में संकट के गंभीर होने का इशारा कर रही हैं, तो वाहनों का प्रदूषण अभी भी हवा को दमघोंटू बना रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए कई बड़े कदम उठाये, बावजूद इसके इनका अपेक्षित असर नहीं हो पा रहा है। आइए 10 पॉइंट में जानने की कोशिश करते हैं क्या है वजह...  

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1- पराली प्रबंधन: उपाय अच्छा, लेकिन कारगर नहीं

पराली को जलाने से निकले धुएं को राजधानी के प्रदूषण का सबसे बड़ा जिम्मेदार कारण बताया जाता है। अक्तूबर से दिसंबर तक यह राजधानी के लिए बड़ी समस्या बनी रहती है। दिल्ली सरकार ने पूसा के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पराली को खेतों में ही नष्ट करने का उपाय अपनाया। इससे राजधानी के किसानों ने पराली को जलाने की बजाय खेतों में ही गलाने का उचित उपाय अपनाया। इससे उनके खेतों की मृदा शक्ति भी बढ़ी और धुएं की समस्या भी कम हुई।

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चूंकि दिल्ली में कृषि योग्य भूमि और किसानों की संख्या बेहद कम है, यह उपाय बेहद सीमित मामलों तक ही सीमित रह गया। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसी पडोसी राज्यों के किसान अभी भी पराली को खेतों में ही जला रहे हैं जिनसे निकला धुंआ राजधानी की हवा को जहरीला बना रहा है। पडोसी राज्यों के असहयोग के कारण यह उपाय कारगर साबित नहीं हो पाया।    

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2- ई-वाहनों का चलन, सीएनजी को बढ़ावा

सरकार ने राजधानी में ई-वाहनों का चलन बढ़ाने का प्रयास किया है। सरकार की कोशिश है कि 2025 तक निकलने वाले सभी वाहनों में न्यूनतम 25 फीसदी ई-वाहन हों जिससे प्रदूषण स्तर में कमी आये। इसके लिए ई-वाहनों की खरीद और रजिस्ट्रेशन में भारी छूट के साथ कई कार्यक्रम भी शुरू किये गए हैं। लेकिन राजधानी में ई-वाहनों के चार्जिंग स्टेशनों की कमी, ई-वाहनों के बेहद महंगे होने, इन्हें ज्यादा दूर तक न ले जा सकने और पेट्रोल-डीजल वाहनों के मुकाबले इनकी कम क्षमता के चलते यह उपाय ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पा रहा है। ई-वाहनों की उपयोगिता को देखते हुए लोग इसके प्रति आकर्षित तो हो रहे हैं, जिससे ई-वाहनों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन  व्यावहारिक सीमाओं के कारण इसकी दर बहुत धीमी है।   

3- निर्माणस्थलों पर एंटी-डस्टिंग उपाय

दिल्ली सरकार ने बड़े-बड़े निर्माण स्थलों पर एंटी डस्टिंग गन लगाना अनिवार्य कर दिया है। नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माना भी लगाया जा रहा है। लेकिन इसका बहुत अधिक असर नहीं हो रहा है और हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 की मात्रा कम नहीं हो पा रही है। माना जा रहा है कि दिल्ली सरकार के इन उपायों का केवल बड़े निर्माण स्थलों तक सीमित होना, छोटे-छोटे हजारों निर्माण स्थलों पर कोई उपाय न होना और वाहनों की दौड़ के कारण यह उपाय बहुत कारगर परिणाम नहीं दे पा रहा है।    

4- हरित क्षेत्र बढ़ाने की जगह नहीं

दिल्ली सरकार ने राजधानी में वृक्षारोपण का कार्यक्रम शुरू किया। इसके अंतर्गत करोड़ों रुपयों की लागत से लाखों पेड़ लगाने का कार्यक्रम किया गया। सरकार ने दावा किया कि उसके उपाय से दिल्ली का हरित क्षेत्र बढ़ा है। लेकिन सच्चाई यही है कि दिल्ली में हरित क्षेत्र और खुली भूमि की भारी कमी है। हर जगह भवनों-सड़कों के निर्माण के कारण वृक्षारोपण के लिए ज्यादा संभावना नहीं है। यही कारण है कि हवा को शुद्ध करने का यह सबसे प्राकृतिक, सस्ता और टिकाऊ उपाय दिल्ली में कारगर नहीं हो पाया। सरकार के प्रयास केवल प्रतीकातमक ही रह गए।

5- यमुना स्वच्छता अभी तक कागजों पर ही सीमित

सीवर और फैक्ट्रियों के गंदे पानी से दिल्ली में एक नाले का रूप धारण कर चुकी यमुना राजधानी की हवा को प्रदूषित करने का बड़ा कारण बन गई है। दिल्ली सरकार ने लगभग आधा दर्जन नए एसटीपी प्लांट्स लगाने, यमुना में गंदे जल को गिरने से रोकने और यमुना के साफ-सफाई के कई दावे किये हैं। लेकिन यमुना में बहता गंदा पानी इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली और केंद्र सरकार के यमुना स्वच्छता के उपाय कागजी ही साबित हुए हैं। इसके लिए बड़े स्तर पर उच्च स्तर की तकनीकी की आवश्यकता है, इसके बाद ही यमुना को स्वच्छ करने का उपाय किया जा सकता है।    

6- एनसीआर के उद्योगों पर लगाम नहीं

दिल्ली की हवा को साफ़ करने के लिए यहां से प्रदूषणकारी उद्योगों को बाहर निकाल दिया गया। लेकिन ये सभी उद्योग दिल्ली के आसपास नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम में स्थापित हो गए। दिल्ली से सटे होने के कारण यहां से हटाए गये उद्योग आज भी दिल्ली की हवा को प्रदूषित करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इन उद्योगों के बाहर जाने से प्रदूषण स्तर में कमी तो अवश्य आई है, लेकिन बहती हवा के साथ इन फैक्ट्रियों का धुंआ एनसीआर को प्रभावित कर रहा है।  

7-  स्मॉग टावर की सीमित क्षमता

दिल्ली सरकार ने हवा को सांस लेने योग्य बनाने के लिए जगह-जगह पर स्मॉग टावर लगाने की योजना शुरू की है। दिल्ली सरकार ने कनाट प्लेस में ऐसे ही स्मॉग टावर का निर्माण कराया है। लेकिन इन स्मोग टावर्स की क्षमता बेहद सीमित होती है। यह प्रदूषित हवा को साफ करने का स्थायी उपाय नहीं माना जा सकता।

दिल्ली भाजपा के मीडिया प्रभारी नवींन कुमार जिंदल ने कहा कि दिल्ली सरकार केवल विज्ञापन देकर अपने कर्तव्यों की पूर्ति करती है। हवा को साफ़ करने के जो उपाय उसे मई-जून में करने चाहिए थे, उन पर अब अक्तूबर में काम किया जा रहा है, यही कारण है कि इनका कोई परिणाम नहीं निकल रहा है। कनाट प्लेस में लगाया गया स्मॉग टावर भी 40 पंखों की क्षमता होने के बाद भी केवल 3-4 पंखों के सहारे चल रहा है। लिहाजा ये उपाय केवल सफ़ेद हाथी साबित हुए हैं।

8- सार्वजनिक वाहनों की उपलब्धता समस्या

वाहनों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण की बड़ी वजह होता है। निजी वाहनों का प्रयोग कम करके इस समस्या को कम किया जा सकता है। लेकिन सार्वजनिक वाहनों की कमी और उनकी सुलभता न होना अभी भी सार्वजनिक वाहनों को सबका वाहन नहीं बना पाता है। यही कारण है कि वाहनों की संख्या कम नहीं हो रही है और प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। ‘रेड लाइट ऑन, गाड़ी ऑफ’ जैसे अभियान बेहद सीमित जागरूकता पैदा कर पाते हैं जिससे इनका बड़ा और व्यापक असर नहीं हो पाता।

9-  पड़ोसी राज्यों के वाहन

दिल्ली में तो सीएनजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, सरकार भी ई-वाहनों को बढ़ावा दे रही है, जिससे वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण में कमी आ रही है। लेकिन पूरे देश से आने वाले डीजल वाहनों, यात्री बसों और मालवाहक ट्रकों के आवागमन से प्रदूषण में कमी नहीं आ पा रही है। राजधानी की हवा को यह प्रदूषण भारी पड़ रहा है।  

10- ‘जनसहयोग की कमी से हर योजना हो रही फेल’

दिल्ली सरकार के प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रम से जुड़े एक अधिकारी ने अमर उजाला से कहा कि किसी शहर के प्रदूषण से निपटने की जिम्मेदारी केवल किसी सरकार की नहीं हो सकती। यह सरकार के साथ-साथ आम नागरिकों के सम्मिलित प्रयासों से पैदा होने वाली स्थिति है और नागरिकों के सहयोग के बिना कोई भी उपाय कभी कारगर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि सरकार के तमाम प्रयास के बाद भी जनता की तरफ से निजी वाहनों के उपयोग में कमी, सार्वजनिक वाहनों का उपयोग बढ़ाने, कूड़ा-करकट न जलाने, यमुना में कचरा न डालने के मुद्दों पर जनता से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता। यही कारण है कि इसके उचित परिणाम नहीं मिलते।

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