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सर्दी में मानसिक तनाव दूर करने के लिए योग जरूरी
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सर्दी में मानसिक तनाव दूर करने के लिए योग जरूरी
- अकेले में बढ़ता है डिप्रेशन
माई सिटी रिपोर्टर
गाजियाबाद। नया साल शुरू होने के बाद एक तरफ कोरोना संक्रमण का कम होने से लोगों ने राहत की सांस ली थी, वहीं दूसरी तरफ ब्रिटेन के नए कोरोना स्ट्रेन का डर भी लोगों में लोगों में बढ़ रहा है। इससे लोगों में तनाव बढ़ रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि तनाव (डिप्रेशन) और उन्माद (मेनिया) के सीजन के अनुसार लक्षण उभरते और कम हो जाते है। सर्दियों में तनाव के राेगियों में 70 फीसद लक्षण उभर आते हैं। ऐसा वातावरण में हुए बदलाव के कारण होता है। मानसिक रोगियों को सीजन के प्रभाव से बचने के लिए लगातार चिकित्सक के संपर्क में रहना चाहिए और काउंसलिंग करवानी चाहिए। सकारात्मक माहौल और सोच के साथ जिंदगी को जीना चाहिए, ताकि मानसिक बीमारी अपने उग्र रूप में ना आ पाएं।
सर्दियों में तनाव बढ़ने के होते है ये कारण
सायक्रियाटिस्ट डा. हेमिका अग्रवाल का कहना है कि सर्दियों में डिप्रेशन अथवा तनाव बढ़ता है। यह सूर्य की किरणों के कारण होता है। सूर्य किरणों से शरीर में विटामिन डी की मात्रा बढ़ती है। जिससे दिमागी रसायनों में भी बदलाव आता है। इससे तनाव के लक्षण सामने आते है। जिससे मानसिक रोगी सर्दियों के मौसम में अधिक तनाव में रहते है। कई बार दवांए लेने के बाद भी उनमें यह लक्षण लगातार बने रहते हैं। ऐसे मानसिक रोगियों में 70 फीसद से अधिक सीजन का प्रभाव देखा गया है। वहीं तनाव में व्यक्ति सोचता है कि वह किसी काम का नहीं है, अपने आपको औरो से कम आंकना आदि लक्षण सामने आते है। इसे सीजन इफेक्टिव डिशऑर्डर के नाम से भी जाना जाता है। इनमें 20 फीसद मरीजों में साल के किसी खास सीजन में जैसे सर्दी या गर्मी में ही यह बीमारी देखने में आती है। इन्हें सीजनल मानसिक बीमारियों का नाम दिया गया है। अगर कोई तनाव का मरीज है तो उसमें सर्दियों में उदासी आ जाती है। उदाहरण के तौर पर किसी तनाव के मरीज में हर वर्ष सितंबर महीने में इस बीमारी के लक्षण उभरते है। सीजन के साथ ही दिमाग के रसायनों में फेरबदल होता है।
योग और लोगों से बातचीत करने पर कम होता है उन्माद या मेनिया
साइकोलॉजिस्ट डा. जया सुकुल का कहना है कि पल में बहुत खुश होने और दूसरे ही पल बेहद नाराज हो जाने वाला मूड जो व्यवहार और सोच के अचानक बिल्कुल उल्टा हो जाने (बायपोलर बीमारी) की वजह से होता है। इसे उन्माद अथवा मेनिया के नाम से जाना जाता है। यह एक मानसिक बीमारी है जिसमें बिना कारण हंसना, बोलना, नाचना, गाना, अधिक खुश रहना, सोने की इच्छा में कमी, बड़े-बड़े दावे (बातें) करना, खुद को बड़ा बताना, अपने अन्दर अत्यधिक शक्ति का अनुभव करना, बहुत सारे काम एक साथ करने की कोशिश करना। लेकिन किसी भी काम को सही तरीके से न कर पाना। यौन इच्छा में वृद्वि, अपनी क्षमता से अधिक खर्चे करने की इच्छा रखना, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाना, विवादों या झगडों में पड़ना आदि उन्माद के लक्षण है।
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इन बातों पर ध्यान देने से बीमारी से होता है बचाव
- व्यवहार में बदलाव होने पर तुरंत मनोचिकित्सक से मिले
- दवा नियमित रूप से लें, बीमारी के लक्षण नहीं रहने पर दवा का सेवन बिना चिकित्सक की सलाह के बंद ना करें।
- यदि रोगी किसी भी तरह का नशा करता है तो समझा कर नशा करना बंद कराना चाहिए।
- रोगी के आस-पास वातावरण को तनावमुक्त बनाए रखना चाहिए।
- रोगी के सम्मान व जरूरतों का ध्यान रखें।
- नियमित तौर योग करना चाहिए।
- अकेले में समय न बिताएं।
- अपने परिजनों या दोस्तों के साथ समूह में रहने का प्रयास करें।
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आशुतोष यादव