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ग्लेशियर के खिसकने पर वैज्ञानिकों का नया खुलासा

Wed, 22 Apr 2015 12:45 PM IST
दीप जोशी/ अमर उजाला, अल्मोड़ा
दीप जोशी/ अमर उजाला, अल्मोड़ा Updated Wed, 22 Apr 2015 12:45 PM IST
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world earth day special story.

पिछले दस सालों में ग्लेशियरों के पीछे खिसकने की गति कम हुई है। जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिकों के अध्ययन के मुताबिक करीब दस साल पहले कुमाऊं का प्रसिद्ध मिलम ग्लेशियर 18 मीटर प्रति वर्ष की गति से पीछे खिसक रहा था, लेकिन अब यह गति घटकर नौ मीटर प्रति वर्ष पहुंच गई है।

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इसी तरह प्रसिद्ध गंगोत्री ग्लेशियर के पीछे खिसकने की गति में भी कमी आई है। वैज्ञानिक इसे पर्यावरण की दृष्टि से अच्छा संकेत मान रहे हैं।

कुमाऊं के पिथौरागढ़ जिले में स्थित मिलम ग्लेशियर कुछ साल पहले तक तेजी से पीछे खिसक रहा था। जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिक पिछले कई सालों से इस ग्लेशियर की स्थिति के बारे में अध्ययन कर रहे हैं।
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वैज्ञानिकों के दल का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ वैज्ञानिक किरीट कुमार के मुताबिक वर्ष 2000 के बाद दो-तीन वर्षों के दौरान मिलम ग्लेशियर के पीछे खिसकने की गति 18 मीटर प्रति वर्ष तक रिकॉर्ड की गई थी, लेकिन पिछले दो-तीन सालों में यह गति कम होकर नौ मीटर प्रति वर्ष तक आ गई है।

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कई साल से सामान्य हुआ गंगोत्री के पानी का फ्लो

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वैज्ञानिक किरीट कुमार ने बताया कि पिथौरागढ़ जिले में स्थित नेवला, छीपा और लापा ग्लेशियरों पर भी अध्ययन किया जा रहा है लेकिन इसके परिणाम कुछ समय बाद सामने आएंगे। जीबी पंत संस्थान के वैज्ञानिक पिछले कई सालों से  गंगोत्री ग्लेशियर पर भी अध्ययन कर रहे हैं।

वरिष्ठ वैज्ञानिक किरीट कुमार ने बताया कि 2004-05 के दौरान गंगोत्री ग्लेशियर 12 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे खिसक रहा था। वर्तमान में यह गति 11 मीटर प्रति वर्ष आ गई है। उन्होंने बताया कि गंगोत्री ग्लेशियर का दायां किनारा हर साल टूटकर पीछे जा रहा है।

गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपर स्थित कुछ छोटे ग्लेशियरों का पानी बहकर नीचे की तरफ आता है। प्रारंभिक तौर पर गंगोत्री ग्लेशियर के दाएं हिस्से के टूटने की यही वजह मानी जा रही है। हालांकि इस पर अध्ययन जारी है। किरीट कुमार के अनुसार गंगोत्री में पानी का फ्लो पिछले कई साल से सामान्य बना हुआ है। इसमें उल्लेखनीय उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिला है।

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