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पहाड़ में जल प्रबंधन ध्वस्त, पेयजल योजनाओं और पाइप लाइनों का ही सहारा
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, हल्द्वानी
Updated Sun, 28 May 2017 02:56 PM IST
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gagas river
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गाढ़, गधेरों, नौलों और धारों से ऐसा नाता टूटा कि पहाड़ की जल प्रबंधन की सालों से चली आई परंपरा ध्वस्त हो गई।
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गगास के जल संग्रहण क्षेत्र में बिंता से लेकर लोद और रतखाल तक के गांवों में यह साफ-साफ देखने को मिल भी रहा है। हाल यह है कि गगास के जल संग्रहण क्षेत्र के करीब 350 गांव और कस्बे चाल-खाल (खाव) को सहेजने और नए बनाने की पुरानी परंपरा से नाता तोड़ चुके हैं और वाटर हार्वेस्टिंग की नई व्यवस्था को अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं।
गगास नदी के जल संग्रहण क्षेत्र के गांव अब जल संकट का सामना कर रहे हैं। ऊंचाई वाले इलाकों के गांवों के तो हाल और भी बुरे हैं। दुधोली, रतखाल, चरी, नायल आदि गांवों में गर्मियों में पीने के पानी का संकट भी उठ खड़ा हुआ है। हाल यह है कि इन गांवों में ही जल प्रबंधन की पुरानी परंपरा पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।
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चाल-खावों को सहेजने और संवारने से गांव दूर हो चुके हैं। गांवों का जंगलों से नाता टूटा तो लोगों ने जंगल जाना भी छोड़ दिया। इसी का परिणाम है कि चाल-खाल मिट्टी से भर चुके हैं और अब ये बारिश के पानी को इकठ्ठा नहीं कर पा रहे हैं। स्रोत से सीधे पाइप लाइन के जरिये पानी घर तक पहुंचाने का चलन है कि गांव वाले मिलकर डिग्गी या पक्का तालाब भी गांव में बनाने पर जोर नहीं देते। इसी तरह जंगल में बांज, बुरांश के पौधों को लगाने पर भी जोर नहीं दिया जा रहा है। पुरानी परंपरा से नाता टूटा, लेकिन नई परंपरा को भी नहीं अपनाया गया है।
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जल संकट का सामना करने के बावजूद ड्रिप इरिगेशन या वाटर हार्वेस्टिंग भी इन गांवों के लिए दूर की कौड़ी है। खेती छूट रही है और इसी के साथ पानी को सहेज कर रखने की कोशिश भी कम होती जा रही है। बारिश के कारण नौलों-धारों के रिचार्ज होने पर छह माह तक पानी का संकट टल जा रहा है और इसी वजह से पानी की बात भी बाकी के छह माह में ही उभर कर सामने आ रही है।
पहले कैसे होता था जल प्रबंधन
-नौलों और धारों को धार्मिक आस्था का प्रतीक बनाकर इनकी साफ सफाई का ध्यान रखा गया और जल के अधिक दोहन पर सामाजिक रूप से प्रतिबंध लगाया गया। इनके जल संग्रहण क्षेत्र के जंगलों की हरियाली को बचाकर रखने का प्रयास किया गया।
-चाल-खाल(खाव) आदि का निर्माण व्यापक पैमाने पर किया गया। जंगल की हरियाली बचाने के लिए हर संभव कोशिश की गई।
-इस बात का ध्यान रखा गया कि सिंचित क्षेत्र ऐसी जगह न हों जो भूस्खलन के कारण गांव के लिए समस्या बनें, धान वाले खेतों को गांव से दूर बनाया गया और पानी की निकासी के इंतजाम गूल आदि बनाकर किए गए।
-आपदा प्रबंधन की दृष्टि से नदी के किनारे गांव बसाने से परहेज किया गया। मिट्टी को बहने से बचाने के लिए सीढ़ीनुमा खेत बनाए गए।
अब क्या है स्थिति
-जंगलों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। जंगल की हरियाली को बचाए रखने से किनारा कर लिया गया है। वन पर वन विभाग का अधिकार मान लिया गया।
-जल संसाधन को ऐसा संसाधन मान लिया गया जिसका असीमित उपयोग किया जा सकता है।
-पुराने चाल-खाल (खाव) को सहेजना और नए बनाने से बिल्कुल ही किनारा कर लिया गया। नौलों और धारों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया या फिर यहां से पानी को टैप करके पेयजल पाइप लाइन बिछाने पर जोर दिया गया।
-किसी भी प्राकृतिक स्रोत तक पहुंचने की बजाय इस स्रोत से पाइप लाइन के जरिए पानी को घर तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। इससे यह विश्वास और पुख्ता हुआ कि पानी असीमित है और स्टेंड पोस्ट और हैंडपंप पानी के स्रोत हैं।
-नदियों को पानी को वहन करने वाली प्राकृतिक संरचना के स्थान पर रेत, बजरी उपलब्ध कराने वाली संरचना मान लिया गया। सीमेंट, गारे से मकान बनाने का प्रचलन बढ़ने के साथ ही नदियों और गाड़-गधेरों पर यह दबाव बढ़ता ही जा रहा है।
नया तरीका अपनाया नहीं जा रहा है
-पानी को फसल मानने के नए विचार को अपनाया नहीं जा रहा है। वाटर हार्वेस्टंग के तहत तालाब, टैंक बनाकर बारिश के पानी को इकठ्ठा करना और घर की जरूरत के लिए उसका उपयोग करना अभी शुरू नहीं किया गया है।
-खेती में कम से कम पानी का इस्तेमाल होने की व्यवस्था अभी शुरू नहीं की गई है। ड्रिप इरिगेशन अपनाया नहीं जा रहा है।
-एक्यूफर को रिचार्ज करने, जल संग्रहण क्षेत्रों में प्राकृतिक स्रोतों से सबंधित नई जानकारी का उपयोग गांवों के स्तर पर नहीं हो रहा है।