तीन तलाक और हलाला पर क्या कहते हैं उलमा, पढ़ें खास इंटरव्यू
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केंद्र सरकार के तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे से पूरे देश में हल्ला मचा है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अगुवाई में देश के उलमा इसका विरोध कर रहे हैं। हस्ताक्षर अभियान चलाकर विरोध दर्ज कराया जा रहा है। उलमा का मानना है कि इस्लाम में निकाह जितना आसान है, उतना ही मजबूरी पेश आने पर पति-पत्नी के अलग होने का तरीका तलाक भी।
मुसलिम समाज में जागरूकता की कमी और अशिक्षा के कारण ये दिक्कतें सामने आ रही हैं। उलमा के अनुसार हदीस पाक में है कि अल्लाह के नजदीक हलाल चीजों में सबसे नापसंद तलाक है। तीन तलाक के मुद्दे पर आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के उत्तराखंड कन्वीनर मौलाना रिसालुद्दीन हक्कानी से अमर उजाला संवाददाता चांद मोहम्मद ने बात की, प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:
सवाल: तीन तलाक पर केंद्र सरकार के हलफनामे पर क्या सोचते हैं?
जवाब: मोदी सरकार का हलफनामा गलत है। भारतीय संविधान में हर नागरिक को अपने मजहब पर अमल की आजादी है। शरीयत के मामले में सरकार की दखलंदाजी ठीक नहीं। इसमें किसी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं है। हां इसको सही से समझने और अक्ल का इस्तेमाल करने की जरूरत है। नेता देश की चिंता करें, मजहब के लिए उलमा काफी हैं। जब तक किसी धर्म की समझ नहीं होगी, आप कोई फैसला नहीं कर सकते।
तीन तलाक अगर खत्म हो जाए तो परेशानी क्या है?
सवाल: तीन तलाक अगर खत्म हो जाए तो परेशानी क्या है?
जवाब: तीन तलाक का कानून एक इस्लामिक कानून है। इस्लामिक कानून कुरान और हदीस की रोशनी में बने हैं। इसकी मुखालफत करने से मुसलमान का ईमान खराब हो सकता है। इसलिए सरकार को भी इसमें दखल नहीं देना चाहिए।
सवाल: तीन तलाक का तो मुस्लिम महिलाएं भी विरोध कर रही हैं?
जवाब: हर मुसीबत की जड़ अशिक्षा और जागरूकता की कमी है। जो महिलाएं विरोध कर रही हैं उनकी संख्या बहुत कम है। उन्होंने इस्लाम को समझा नहीं। करोड़ों भारतीय महिलाएं शरीयत का सम्मान करती हैं। शरीयत में महिलाओं को बराबरी का हक दिया गया है। शरीयत में उनको भी तलाक (खुला) का मौका और पिता की विरासत में हिस्सेदारी का कानून है। तलाक के बाद इद्दत के दौरान भी गुजारा भत्ता का प्रावधान है।
सवाल: तीन तलाक पर कई मुस्लिम देशों में पाबंदी है तो भारत में क्यों नहीं ?
जवाब: हम मुस्लिम देशों के हुक्मों पर नहीं, इस्लामिक कानूनों पर चलते हैं। इस्लामिक कानून हमें तीन तलाक पर पाबंदी की इजाजत नहीं देता, न ही भारतीय संविधान में किसी धर्म की आजादी छीनने का जिक्र है।
सवाल: क्या तलाक के मामले को कॉमन सिविल कोड से जोड़ना मुनासिब है?
जवाब: तीन तलाक पर पाबंदी लगाना कॉमन सिविल कोड की ओर ले जाने वाला कदम है। यह पश्चिमी देशों की अवधारणा है। उस अवधारणा के खुलेपन को हिंदुस्तान का कोई मजहब स्वीकार नहीं करेगा।
हलाला क्या है?
सवाल: पर्सनल लॉ बोर्ड मुस्लिम महिलाओं की तालीम, सेहत के मुद्दे क्यों नहीं उठाता?
जवाब: पर्सनल लॉ बोर्ड का काम इस्लामिक कानून की हिफाजत करना है। बहुत से संगठन (जमीयत उलमा ए हिंद, जमात ए इस्लामी आल इंडिया मिल्ली काउंसिल) महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, निकाह आदि पर काम कर रहे हैं। महिलाओं को बोर्ड में शामिल कर मंच पर अपनी बात रखने का भी मौका देता है।
सवाल: तलाक का बेहतर तरीका कौन सा है?
जवाब: हर पति, पत्नी को मुहब्बत से रहना चाहिए, जिससे तलाक की नौबत ही न आए। अगर ऐसी कोई मजबूरी आन पड़े तो तलाक-ए-रजई सबसे बेहतर तरीका है, इसमें इद्दत के पूरा होने तक निकाह नहीं टूटता। गलती का अहसास होने पर बीवी से दोबारा रिश्ता बनाया जा सकता है। इद्दत की अवधि पूरी होने पर मेहर की राशि अदा करनी पड़ेगी और निकाह भी दोबारा होगा। तीन तलाक (तलाक ए मुगल्लजा) से हमेशा के लिए दोनों जुदा जाते हैं। फिर से दोबारा निकाह हलाला के बाद ही हो सकता है।
सवाल: हलाला क्या है?
जवाब: तलाक के बाद औरत का निकाह किसी दूसरे व्यक्ति के साथ होता है। उस व्यक्ति के तलाक देने के बाद ही पहला शौहर शादी कर सकता है। इसे हलाला कहते हैं। लेकिन प्लानिंग के तहत इसे किया जाना गलत है और शरीयत में इसकी गुंजाइश नहीं। ऐसे लोगों पर लानत है जो ऐसा करते हैं। ऐसी ही गलतियों की वजह से इस्लामिक कानूनों पर उंगलियां उठती हैं।