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Uttararakhand Election 2022: अपने ही दुर्ग में असमंजस में भाजपा, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत हैं इस सीट पर विधायक
Sat, 15 Jan 2022 02:49 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Sat, 15 Jan 2022 02:49 PM IST
सार
इस सीट पर कद्दावर नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत विधायक हैं। सीट पर चुनाव लड़ने के प्रबल इच्छुक हैं और चुनाव क्षेत्र में दौड़ धूप कर रहे हैं, लेकिन उनकी सक्रियता और इच्छा के बावजूद पार्टी के भीतर नए विकल्प की चर्चा हो रही है।
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त्रिवेंद्र सिंह रावत
- फोटो : पीटीआई फाइल फोटो
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विस्तार
डोईवाला विधानसभा सीट पारंपरिक रूप से भाजपा के वर्चस्व वाली रही है। विधानसभा चुनाव में भाजपा के इस दुर्ग को भेदना कांग्रेस के लिए सपना रहा है। 2014 के उपचुनाव की जीत को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो कांग्रेस को यहां सभी चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा, लेकिन 2022 के समर में भाजपा अपने इस अजेय दुर्ग को लेकर पहली बार असमंजस में दिखाई दे रही है।
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यह असमंजस दुर्ग में किसी दरार को लेकर नहीं है बल्कि इस बात को लेकर है कि इस बार पार्टी डोईवाला में किस चेहरे पर दांव खेलेगी। पार्टी के भीतर यह मंथन तब हो रहा है जब इस सीट पर कद्दावर नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत विधायक हैं। सीट पर चुनाव लड़ने के प्रबल इच्छुक हैं और चुनाव क्षेत्र में दौड़ धूप कर रहे हैं, लेकिन उनकी सक्रियता और इच्छा के बावजूद पार्टी के भीतर नए विकल्प की चर्चा हो रही है। यह चर्चा चुनाव क्षेत्र में टीम त्रिवेंद्र और भाजपा के नेटवर्क के लिए अजीब सी दुविधा पैदा कर रही है।
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इतिहास भाजपा के पक्ष में
सीट के चुनावी इतिहास पर गौर करें तो राज्य गठन के बाद हुए 2002 और 2007 के विधानसभा चुनाव में त्रिवेंद्र सिंह रावत जीते। पहले चुनाव में बेशक उनकी जीत का अंतर 1536 वोटों का रहा। 2007 के चुनाव में यह अंतर 14127 वोटों का हो गया। 2012 के चुनाव में त्रिवेंद्र डोईवाला से रायपुर चले गए और वहां उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा, लेकिन डोईवाला सीट पर पार्टी की जीत हैट्रिक बनीं बेशक इस बार चेहरा पूर्व सीएम डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक थे। 2014 में निशंक लोकसभा का चुनाव लड़े और उपचुनाव में त्रिवेंद्र की डोईवाला सीट पर फिर वापसी हुई लेकिन इस बार डोईवाला के मतदाताओं ने उन्हें हरा दिया। कांग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट चुनाव जीते। 2017 में पार्टी ने फिर त्रिवेंद्र पर ही दांव लगाया और वह रिकार्ड 24,608 मतों से विजयी हुए। 61 फीसदी मत हासिल कर त्रिवेंद्र को पार्टी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी और डोईवाला सीट देखते ही देखते वीवीआईपी हो गई।
मुख्यमंत्री बनने का मिला लाभ
दिलचस्प बात यह है कि क्षेत्र के अधिकांश लोग यह मानते हैं कि पिछले पांच वर्ष में चुनाव क्षेत्र में विकास की गति धीमी नहीं पड़ी। भाजपा से जुड़े लोग विधि विवि, सीपैट, कास्ट कार्ड भर्ती केंद्र, डिग्री कॉलेज, कैंसर अस्पताल, ऑडिटोरियम, तहसील भवन, बस अड्डा, सूर्यधार झील, सड़कों, पुल जैसे फैसले और निर्माण त्रिवेंद्र के कार्यकाल की उपलब्धियां मानते हैं।
विकास बनाम महंगाई और बेरोजगारी
चुनाव क्षेत्र में त्रिवेंद्र के काम और महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की नाराजगी के बीच भी जंग है। कांग्रेस और विपक्षी दल सत्तारोधी रुझान के साथ महंगाई और बेरोजगारी और स्वास्थ्य, शिक्षा से जुड़े मुद्दों को मुख्य चुनावी हथियार बना रहे हैं। किसान आंदोलन का भी एक क्षेत्र विशेष में प्रभाव रहा है, जिसका कांग्रेस फायदा लेने की कोशिश कर रही है।
पर्वतीय मतदाताओं की भूमिका अहम
विधानसभा क्षेत्र में पर्वतीय मतदाताओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। पहाड़ से पलायन लोग इस चुनाव क्षेत्र में बड़ी तादाद में बसे। सीट पर पर्वतीय और मैदानी मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर पहुंच चुकी है। इनमें करीब 15 फीसदी मुस्लिम और सिख मतदाता हैं।
प्रत्याशी तय होने पर कुहासा छंटेगा
भाजपा और कांग्रेस डोईवाला विधानसभा सीट के दो पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी हैं। दोनों के प्रत्याशी अभी तय नहीं हो पाए हैं। इसलिए इस सीट पर सियासी हालात पर छाया कुहासा तभी कुछ हद छंटेगा जब दोनों ओर से प्रत्याशी घोषित होंगे।