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उत्तराखंड : पहाड़ी अनाजों से महिलाएं दिखा रहीं आजीविका की राह

Fri, 29 Nov 2019 03:33 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Fri, 29 Nov 2019 03:33 PM IST
सार

  • - केदारनाथ धाम का प्रसाद, मडुंवा के बिस्कुट, चौलाई व झंगोरे के लड्डू बना आमदनी का जरिया

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Uttarakhand: Women showing their way of livelihood and earning from mountainous grains
प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

मातृ शक्ति वाले प्रदेश में गृहणी की भूमिका निभाने वाली महिलाओं को छोटा सा काम मिला तो उन्होंने इस काम को ही 500 करोड़ से अधिक के कारोबार में बदल दिया।

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पहाड़ के दूरदराज के गांवों से लेकर कस्बों तक सिमटी हुई ये महिलाएं गांव की देहरी को लांघने को विवश नहीं हैं और अपने बलबूते पहाड़ के पलायन को चुनौती दे रही हैं। पहाड़ी अनाज से तैयार विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाने वाले महिला समूह मिसाल बन रहे हैं। अगर इस दिशा में और प्रयास किए जाएं तो पलायन की समस्या कुछ हद तक और कम हो सकती है।
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केदारनाथ धाम का प्रसाद, चौलाई व झंगोरे के लड्डू व मंडुवा के बिस्कुट से लेकर अन्य उत्पादों को आजीविका के रूप में अपनाकर पहाड़ की महिलाओं ने करीब 500 करोड़ का कारोबार खड़ा कर दिया है। समूह बना कर महिलाओं ने गांव में ही आजीविका के लिए कदम आगे बढ़ाए हैं। घर से लेकर खेतीबाड़ी के कामकाज के साथ इन महिलाओं की गांव में ही आमदनी हो रही है।
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केदारनाथ यात्रा में स्थानीय उत्पादों के प्रसाद ने महिलाओं की आर्थिकी को नया आयाम दिया है। इस वर्ष यात्रा में एक करोड़ 22 लाख से अधिक का प्रसाद बिका। जिसमें महिला समूहों को 62 लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका है। प्रसाद में चौलाई का लड्डू, चूरण, धूप, बेलपत्री, केदारनाथ का प्रतीक सिक्का व भष्म को शामिल किया गया है। प्रसाद को अलग-अलग मूल्य के पैकेट में पैकिंग कर बेचने की व्यवस्था की गई।

बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति, प्रसाद संघ और जिला प्रशासन की देखरेख में इस वर्ष जनपद में गंगा दुग्ध उत्पादक समूह, स्वराज सहकारिता, पिरामल फाउंडेशन, हरियाली भवन, केदार-बदरी समिति, ह्यूम इंडिया, आस्था, तुंगनाथ उत्पादक समूह, हिमाद्री समेत  आईएलएसपी और एनआरएलएम से जुड़े 142 समूहों की 1612 महिलाएं पहाड़ी अनाजों से प्रसाद तैयार कर रही हैं। चौलाई के लड्डू व चूरण बनाने के लिए जनपद के 30 गांवों के साढ़े पांच सौ किसानों से 55 रुपये प्रति किलो की दर से 930 क्विंटल चौलाई खरीदी गई है।
 

आजीविका के लिए 10 हजार महिला समूहों का गठन

एकीकृत आजीविका मिशन के तहत प्रदेश में 10 हजार महिला स्वयं सहायता समूह गठित किए गए हैं। इन समूहों के माध्यम से पहाड़ी अनाजों से विभिन्न प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। मां चिल्टा आजीविका स्वायत्ता सहकारी समूह मुनार कपकोट मंडुवा से बिस्कुट बना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में इस समूह की अभिनव पहल को सराहा था। 

गांव की महिलाओं को जोड़ कर समूह बनाया और उन्हें आजीविका के लिए प्रोत्साहन किया। आजीविका में सहभागिता बढ़ने से महिलाओं को 8 से 10 हजार की आय प्राप्त हो रही है। प्रसाद बना कर समूह की महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। इस तरह के छोटे-छोटे उत्पाद बना कर पहाड़ों में रोजगार के नए अवसर पैदाकर पलायन रोका जा सकता है।
- दुर्गा करासी, अध्यक्ष, तुंगेश्वर स्वयं सहायता समूह चोपता 

घर और खेतीबाड़ी के कामकाज के साथ केदारनाथ यात्रा का प्रसाद बनाने का कार्य मिला। इस कार्य से घर की आर्थिकी को बढ़ाने में काफी मदद मिल रही है। पहाड़ी अनाजों से विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाना महिलाओं व युवाओं के लिए आजीविका का साधन बन रहा है। सरकार को इस तरह के उत्पाद बनाने वाले समूहों को और प्रोत्साहन करने की जरूरत है। 
- इंदु देवी, निवासी डांगी भरदार, जखोली

केदारनाथ यात्रा के दौरान पारंपरिक अनाज से तैयार किए गए प्रसाद से आठ हजार रुपये से अधिक की आमदनी हुई है। परिवार की जिम्मेदारी को निभारने के साथ ही प्रसाद को रोजगार के रूप में अपनाया है। सरकार को प्रदेश के अन्य मंदिरों में भी पारंपरिक अनाजों से तैयार प्रसाद को बेचने की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे महिलाओं व युवाओं को गांव में ही रोजगार मिलने से पलायन रुकेगा।
- सुमन देवी, तुंगनाथ उत्पादक समूह, जखोली

महिलाओं के समूह बनाकर झंगोरे के लड्डू बनाए जा रहे हैं। इनकी डिमांड बढ़ रही है। लड्डू बनाकर समूह से जुड़ीं कई महिलाओं की आजीविका चल रही है। अब मिठाईयों की दुकानों में भी झंगोरे के लड्डू बेचने की योजना पर समूह काम रहा है। इसके साथ ही समूह के माध्यम से सब्जी उत्पादन भी किया जा रहा है।
- सावित्री ममगाईं, अध्यक्ष, नागराजा स्वयं सहायता समूह कमेड़ा 

मेरा मानना है कि पहाड़ों से पलायन रोकने और आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराने के लिए परंपरागत उत्पादों का मूल्य संवर्धन करने की जरूरत है। पहाड़ी अनाजों से विभिन्न उत्पाद बनाना आजीविका का सबसे बड़ा साधन बन सकता है। इस दिशा में सरकार भी विशेष पहल कर रही है।
- कपिल उपाध्याय, विशेषज्ञ

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