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एक साथ ढोल वादन का विश्व रिकॉर्ड बनाएगा उत्तराखंड
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सर्वे चौक स्थित आईआरडीटी ऑडिटोरियम में संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन
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उत्तराखंड के हजारों ढोल वादक एक साथ अपने वाद्य यंत्र बजाकर विश्व रिकॉर्ड बनाएंगे। दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन के समापन अवसर पर कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पहले एक हजार ढोल वादकों के साथ नमो नाद कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें अब वादकों की संख्या बढ़ाई जाएगी।
सर्वे चौक स्थित आईआरटीडी ऑडिटोरियम में साहित्य सम्मेलन के दूसरे दिन का शुभारंभ संस्कृति विभाग की निदेशक बीना भट्ट, प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी, पद्मश्री प्रीतम भरतवाण, दीवान सिंह बजेली, जुगल किशोर और प्रवीण भट्ट ने संयुक्त रूप से किया। पहले सत्र में डॉ. देव सिंह पोखरिया, कुलीन जोशी, जुगल किशोर पेटशाली, नरेंद्र सिंह नेगी ने उत्तराखंड की लोकभाषाएं और लोक साहित्य विषय पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने गढ़वाली-कुमाऊंनी, जौनसारी के समृद्ध साहित्य की जानकारी दी। वक्ताओं ने कहा कि एक हजार वर्ष पहले जिस समय हिंदी भाषा का उदय हो रहा था, उसी समय उत्तराखंड में भी गढ़वाली-कुमाऊंनी, जौनसारी का उदय हुआ। सत्र का संचालन गणेश खुगशाल गणी ने किया।
दूसरे सत्र में डॉ. दाताराम पुरोहित, प्रवीण भट्ट, उत्तम दास, पद्मश्री प्रीतम भरतवाण ने ढोल, ढोली और ढोल सागर विषय पर विस्तार से चर्चा की। संचालन प्रेम पंचोली ने किया। प्रो. दाताराम पुरोहित ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को एक मंच पर लाने के लिए संस्थान की स्थापना किए जाने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि संस्कृति का अभिलेखीकरण किया जाना चाहिए।
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इस अवसर पर संस्कृति साहित्य एवं कला परिषद के उपाध्यक्ष घनानंद, पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी, पद्मश्री बसंती बिष्ट, योगंबर सिंह बर्त्वाल, हीरा सिंह राणा, वीणापाणी जोशी, कुसुम भट्ट, भारती पांडेय, सुरेशानंद ममगाईं आदि मौजूद रहे।
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सर्वे चौक स्थित आईआरटीडी ऑडिटोरियम में साहित्य सम्मेलन के दूसरे दिन का शुभारंभ संस्कृति विभाग की निदेशक बीना भट्ट, प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी, पद्मश्री प्रीतम भरतवाण, दीवान सिंह बजेली, जुगल किशोर और प्रवीण भट्ट ने संयुक्त रूप से किया। पहले सत्र में डॉ. देव सिंह पोखरिया, कुलीन जोशी, जुगल किशोर पेटशाली, नरेंद्र सिंह नेगी ने उत्तराखंड की लोकभाषाएं और लोक साहित्य विषय पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने गढ़वाली-कुमाऊंनी, जौनसारी के समृद्ध साहित्य की जानकारी दी। वक्ताओं ने कहा कि एक हजार वर्ष पहले जिस समय हिंदी भाषा का उदय हो रहा था, उसी समय उत्तराखंड में भी गढ़वाली-कुमाऊंनी, जौनसारी का उदय हुआ। सत्र का संचालन गणेश खुगशाल गणी ने किया।
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दूसरे सत्र में डॉ. दाताराम पुरोहित, प्रवीण भट्ट, उत्तम दास, पद्मश्री प्रीतम भरतवाण ने ढोल, ढोली और ढोल सागर विषय पर विस्तार से चर्चा की। संचालन प्रेम पंचोली ने किया। प्रो. दाताराम पुरोहित ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को एक मंच पर लाने के लिए संस्थान की स्थापना किए जाने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि संस्कृति का अभिलेखीकरण किया जाना चाहिए।
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इस अवसर पर संस्कृति साहित्य एवं कला परिषद के उपाध्यक्ष घनानंद, पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी, पद्मश्री बसंती बिष्ट, योगंबर सिंह बर्त्वाल, हीरा सिंह राणा, वीणापाणी जोशी, कुसुम भट्ट, भारती पांडेय, सुरेशानंद ममगाईं आदि मौजूद रहे।