Uttarakhand Weather: ठंड से हाइपोथर्मिया की चपेट में आ रहे नवजात, एम्स ने जारी की हेल्थ एडवाइजरी
अत्यधिक ठंड में सबसे अधिक मामले हाइपोथर्मिया बीमारी से संबंधित हैं। ठंड लगने से शिशुओं में विभिन्न समस्याएं आ रही है।
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मैदानी क्षेत्रों में घने कोहरे और पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी से कड़ाके की ठंड से नवजात शिशु बीमारी की चपेट में आने लगे हैं। एम्स की नियोनेटोलॉजी विभाग की ओपीडी में ऐसे शिशुओं की संख्या बढ़ रही है। चिकित्सकों के मुताबिक ओपीडी पहुंचने वाले 60 प्रतिशत शिशु ठंड लगने से बीमार हो रहे हैं। शिशुओं के ठंड से बचाव के लिए एम्स ऋषिकेश ने हेल्थ एडवाइजरी जारी की है।
नियोनेटोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. श्रीपर्णा बासु ने बताया कि अत्यधिक ठंड में सबसे अधिक मामले हाइपोथर्मिया बीमारी से संबंधित हैं। ठंड लगने से शिशुओं में विभिन्न समस्याएं आ रही है। हाइपोथर्मिया को सामान्य भाषा में बच्चे का ठंडा पड़ जाना कहते हैं। खासतौर से ढाई किलो से कम वजन वाले नवजात शिशु इस बीमारी से सर्वाधिक ग्रसित होते हैं। विभाग की एसोसिएट प्रो. पूनम सिंह ने बताया कि जब शिशु के शरीर का तापमान 36.5 डिग्री सेल्सियस से कम होने लगता है तो वह हाइपोथर्मिया कहलाता है।
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हाइपोथर्मिया की शिकायत पर बच्चा सुस्त होकर दूध पीना बंद कर देता है। धीरे-धीरे उसके खून में शर्करा की कमी होने से बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है। बताया कि शिशु का सुस्त हो जाना, उसके पैर और पेट ठंडे पड़ना और दूध पीना बंद कर देना इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं।
क्या करें
नवजात को हाइपोथर्मिया से बचाने का प्रयास जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। यदि किसी स्वास्थ्य केंद्र में नवजात की देखरेख की व्यवस्था नहीं है तो गर्भवती मां को सुविधा युक्त अस्पताल में ले जाकर ही डिलीवरी करवाएं।
- बच्चे को जन्म के पहले एक घंटे में न नहलाएं।
- बच्चे का बदन गुनगुने पानी से गीले कपड़े से पोंछें।
- न्यूनतम तीन सतह में कपड़े पहनाएं
- टोपी, मौजे और दस्ताने जरूर पहनाएं।
- कंगारू मातृ देखरेख का तरीका अपनाएं।
क्या न करें
- बीमार पड़ने पर बच्चे को अस्पताल ले जाने में देरी न करें।
- बच्चे को खुले वाहन में लेकर कतई न जाएं।
- कोहरे और हवा में बच्चे को कमरे से बाहर न निकालें।
इन लक्षणों से भी रहें सचेत
बच्चे का दूध कम पीना, अचानक सुस्त हो जाना, सांस लेते हुए छाती में खड्डे पड़ना, मिर्गी के झटके, बुखार होना या शरीर का ठंडा पड़ना, पैरों के तलवे और हथेलियों में पीलापन आना, नाभी के आस-पास लाली या उससे मवाद आना।
चिंतनीय है उत्तराखंड में मृत्युदर
जन्म से पहले शिशु मां के गर्भ में सुरक्षित और आरामदायक कवच में रहता है। जन्म लेने के बाद उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बाहर के वातावरण से सामंजस्य बैठाना होता है। इसलिए जन्म से कम से कम छह माह तक बच्चों को मौसम की मार से सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार उत्तराखंड में शिशु मृत्यु दर 34 से अधिक है। जन्म लेने वाले प्रति 1000 बच्चों में से 34 शिशुओं की विभिन्न कारणों के चलते मृत्यु हो जाती है।
एम्स में नवजात शिशुओं के इलाज के लिए गहन चिकित्सा इकाई निक्कू वार्ड बना है। यहां वार्मर बेड, वेंटिलेटर, पीलिया ग्रस्त शिशुओं के लिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन सुविधा, समय से पहले प्रीमैच्योर शिशुओं के इलाज की सुविधा, अल्ट्रासाउंड और आवश्यकता पड़ने पर नवजात बच्चों के लिए सर्जरी की सुविधा भी उपलब्ध है।
- प्रो. मीनू सिंह, निदेशक, एम्स ऋषिकेश