सुंदरलाल बहुगुणा : टिहरी रियासत में पिता थे कोतवाल, बेटा दुनिया के सामने लाया राजा के अत्याचार
राजा को जब पता चला कि उसके विरुद्ध देश के अखबारों में छप रहा है तो लिखने वाले की ढूंढ-खोज शुरू हुई। तब पता चला कि लिखने वाला हाईस्कूल में पढ़ने वाला विद्यार्थी सुंदरलाल है।
विस्तार
टिहरी राजशाही के जुल्म-ओ-सितम को दुनिया के सामने उजागर करने का काम सुंदरलाल बहुगुणा ने किया। वे प्रतापनगर हाई स्कूल में पढ़ते थे। उस समय टिहरी राज के दमन-अत्याचार की कहानी उन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्रों को लिख भेजी।
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पर्यावरण कार्यकर्ता इंदिरेश मैखुरी ने बताया कि उनके लेख से देश ने जाना कि टिहरी में राजशाही ने लोगों पर कैसा कहर बरपा रखा है। राजा को जब पता चला कि उसके विरुद्ध देश के अखबारों में छप रहा है तो लिखने वाले की ढूंढ-खोज शुरू हुई। तब पता चला कि लिखने वाला हाईस्कूल में पढ़ने वाला विद्यार्थी सुंदरलाल है। तो मालूम पड़ा कि टिहरी राजा के कोतवाल अंबादत्त बहुगुणा का बेटा है सुंदरलाल।
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सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण के लिए समर्पित होने से पहले स्वतंत्रता सेनानी थे। स्वतंत्रता सेनानी भी कैसे थे वे, वे जिस टिहरी में पैदा हुए वो टिहरी तो राजा की रियासत थी। राजाओं के अत्याचार जो हर रियासत की पहचान होती थी। टिहरी की राजशाही भी वैसी ही क्रूर और जालिम थी। श्रीदेव सुमन जेल में अनशन करते हुए शहीद हो गए।
टिहरी राजशाही के खिलाफ अंतत: कॉमरेड नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत के बाद 1948 में राजशाही का खात्मा हुआ। उस टिहरी राजशाही में न बोलने की आजादी थी न संगठित होने की आजादी और न लिखने की। ऐसे में एक 10वीं का विद्यार्थी उस राजा के अत्याचारों को दुनिया के सामने उजागर करने का साहस करे, जिसके दरबार में उसके पिता कोतवाल थे तो यह गजब की बात तो है ही। ऐसा करने की सजा जो होनी थी हुई और सजा से बहुगुणा जी डिगे नहीं।
पर्यावरण, मिट्टी, पानी, हवा के लिए संघर्ष करने वाले सुंदरलाल बहुगुणा को 94 वर्ष में एक वैश्विक महामारी से संघर्ष करना पड़ा। उनकी अन्य लड़ाइयों से यह लड़ाई इस मायने में भिन्न हो गई है कि अन्य संघर्षों में वे जीते या हारे पर लड़ाई के सबक के साथ वे हमारे बीच होते थे। इस लड़ाई के बाद वे हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो गए।
अध्ययनशीलता उनके व्यक्तित्व का एक अहम पहलू था
मैखुरी बताया कि मैंने आज से लगभग 22-23 बरस पहले एक गोष्ठी में सुंदरलाल बहुगुणा को देखा। तब भी उनकी उम्र 70 पार तो थी ही। वे गोष्ठी में बैठे तो हर बोलने वाले को बड़े गौर से सुनते रहे। एक मोटी नोटबुक वे हाथ में लिए हुए थे और हर बोलने वाले की बात नोट करते जाते। अध्ययनशीलता उनके व्यक्तित्व का एक अहम पहलू था। सुंदरलाल बहुगुणा ने अपने जीवन में नारा दिया- क्या हैं जंगल के उपहार मिट्टी पानी और बयार। मिट्टी पानी और बयार हैं जीवन के आधार।
आज इस वैश्विक महामारी में हम देख रहे हैं कि प्राण वायु का संकट हमारे सामने खड़ा है। जाहिर सी बात है कि बहुगुणा जी के नारे में दिये इस सबक को हमें याद रखने की जरूरत है। बार-बार दोहराने की जरूरत है। विकास के नाम पर जंगलों का कत्लेआम करने वालों के बहरे कानों में गुंजा देने की जरूरत है। मिट्टी, पानी, बयार बचाने की लड़ाई के योद्धा के मिट्टी, पानी, बयार में विलीन हो जाने पर नमन श्रद्धांजलि अर्पित है।
शोधकार्य के दौरान गोल्डी ने बहुगुणा संग बिताए थे 50 दिन
हल्द्वानी के व्यापारी और समाजसेवी प्रमोद अग्रवाल गोल्डी ने छात्रजीवन में शोधकार्य के दौरान चिपको आंदोलन के प्रणेता रहे सुंदरलाल बहुगुणा के साथ 50 दिन बिताए थे। गोल्डी को आज भी उनका सादगी और सिद्धांतवादी जीवन याद है। बहुगुणा के निधन से दुखी गोल्डी ने बताया कि वर्ष 19 84-85 के दौरान उन्हें सुंदरलाल बहुगुणा के यहां रहकर वनों पर आधारित शोध कार्य करने का मौका मिला, जिसमें बहुगुणा ने उनकी विशेष मदद की।
वह बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1984-85 में करीब 50 दिन बहुगुणा के घर में रहकर शोधकार्य किया। इस दौरान वनों पर आधारित उनका अनुभव, उनके विचार, उनकी सोच, उनके कार्य आदि को नजदीक से देखा और अनुभव किया। गोल्डी बताते हैं कि 26 सितंबर 2009 को सुंदरलाल बहुगुणा पत्नी विमला के साथ नैनीताल आए।
समानता और वन संरक्षण के लिए 1973 में सिमलासू से शुरू की पैदल यात्रा
शराब बंदी आंदोलन में जनता का अपार समर्थन मिलने के बाद सुंदरलाल बहुगुणा ने जातीय समानता, शराबबंदी, महिला सशक्तिकरण और वन संरक्षण का संदेश पूरे उत्तराखंड में फैलाने की ठानी। 1973 में दीपावली के दिन उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरू और डिवाइन लाइफ सोसायटी के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद का आशीर्वाद लेकर 25 अक्तूबर को सिमलासू (नई टिहरी) से यात्रा शुरू की।
पुरानी टिहरी के सिमलासू से शुरू की गई यात्रा का पहला पड़ाव उन्होंने अपनी जन्मस्थल मरोड़ा गांव को बनाया। जो गांव उन्होंने अपने राजभक्त परिवार से मतभेद के बाद 13 साल की उम्र में छोड़ दिया था। तीन दशक बाद जब बहुगुणा अचानक मरोड़ा पहुंचे तो गांव वाले उनके घर में जुट गए। इस दौरान उनके साथ भवानी भाई भी थे। वहां से अपनी यात्रा जारी रखते हुए वह जौनपुर, जौनसार के रवांई, बावर, रुद्रप्रयाग, चमोली के सुखताल होते हुए ग्वालदम और थराली से कपकोट पहुंचे। वहां से पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और नैनीताल होते हुए उन्होंने 1400 किमी की पैदल यात्रा से पूरा उत्तराखंड नाप डाला। यह लंबी यात्रा उन्होंने 22 फरवरी 1974 को मुनिकीरेती में पूरी की।
जंगल बचाने के लिए आराकोट से अस्कोट तक भी निकाली पद यात्रा
पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा ने शराबबंदी आंदोलन की सफलता के बाद 1973 में हुए चिपको आंदोलन में युवाओं को जोड़ने के लिए 25 मई1974 को आराकोट (गढ़वाल)से अस्कोट (कुमाऊं) की यात्रा शुरू की । 700 किमी की यह यात्रा उन्होंने 44 दिन में पूरी की। उन्होंने इस यात्रा का शुभारंभ राजशाही की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए शहीद हुए अमर शहीद श्रीदेव सुमन के जन्मदिन 25 मई को चुना। यात्रा का नारा 'वन संरक्षण, शराबबंदी, स्त्री शक्ति जागरण और युवा पलायन' रखा गया। उनकी इस यात्रा में कुमाऊं से शेखर पाठक और शमशेर सिंह बिष्ट और गढ़वाल से प्रताप शिखर, कुंवर प्रसून और विजय जड़धारी भी शामिल हुए। उन दिनों से यह सभी छात्र थे। इस आंदोलन गांव-गांव से युवाओं का काफी समर्थन मिला।