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उत्तराखंड राज्य स्थापना के 20 साल : अधूरी है स्थायी राजधानी की कहानी, मौजूद हैं दो विधानसभा भवन

Sat, 07 Nov 2020 04:00 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 07 Nov 2020 04:00 PM IST
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uttarakhand state foundation day 2020 : no permanent capital, two assembly buildings exist
गैरसैंण

राज्य स्थापना की वर्षगांठ के बहाने स्थायी राजधानी का मुद्दा एक बार फिर गर्माने लगा है। झारखंड और छत्तीसगढ़ के साथ 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए इस पर्वतीय राज्य की स्थायी राजधानी की कहानी 20 साल बाद भी अधूरी है। जनभावनाओं की प्रतीक गैरसैंण (भराड़ीसैंण) को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनने में ही 20 साल लग गए, लेकिन दो दशक बाद भी स्थायी राजधानी की पहेली अबूझ है। 

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आज उत्तराखंड देश का अकेला ऐसा राज्य है जिसमें दो विधानसभा भवन हैं और तीसरा बनाने की तैयारी है, लेकिन स्थायी राजधानी का कुछ पता नहीं। वर्तमान सरकार के ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करने के बाद कांग्रेस ने सत्ता में आने पर गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की घोषणा की है। उसने भी यह घोषणा तब की जब वह विपक्ष में है। सत्ता में रहते हुए यह मौका उसके पास भी था, लेकिन तब इस पर अमल नहीं किया। 
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राजधानी के लिए कांग्रेस व अन्य विरोधी पार्टियां भाजपा को ही गुनहगार ठहराती हैं। उनका मानना है कि राज्य गठन के समय झारखंड और छत्तीसगढ़ की राजधानी तय हो गईं तो तत्कालीन भाजपा सरकार ने उत्तराखंड की स्थायी राजधानी पर फैसला क्यों नहीं लिया। इसके स्थान पर देहरादून को अस्थायी राजधानी बना दिया गया, जो आज स्वयंभू राजधानी का स्वरूप ले चुकी है। 
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ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने में 20 साल लग गए 

जनभावनाओं की प्रतीक गैरसैंण (भराड़ीसैंण) को ग्रीष्मकालीन राजधानी में 20 साल लग गए। स्थायी राजधानी तय न करने का लांछन यदि भाजपा पर लगता है तो गैरसैंण को ग्रीष्मकाली राजधानी बनाने का श्रेय भी भाजपा की सरकार व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को ही जाता है। 

गैरसैंण में मनेगा राज्य स्थापना दिवस

विपक्षियों की आलोचना से बेपरवाह मुख्यमंत्री अपने गैरसैंण के एजेंडे पर आगे बढ़ रहे हैं। पहली बार वह गैरसैंण में राज्य स्थापना दिवस का जश्न में शामिल होंगे। अगले दिन मुख्यमंत्री पैदल चलकर वीरचंद्र सिंह गढ़वाली के गांव दूधातोली जाएंगे। इस दौरान वह घोषणाएं भी करेंगे। 

स्थायी राजधानी की राह में अड़चन बनीं भूल-चूक

- केंद्र की तत्कालीन भाजपा सरकार ने उत्तराखंड की स्थायी राजधानी घोषित न कर भूल की
- फैसला पहली निर्वाचित सरकार पर छोड़ा, देहरादून को अस्थायी राजधानी बना दिया
- अंतरिम सरकार ने राजधानी तय करने के लिए एक सदस्यीय आयोग बना दिया, छह महीने में रिपोर्ट मांगी
- आयोग में मात्र एक व्यक्ति होने और जरूरी सुविधाओं के अभाव में छह महीने में इस्तीफा दे दिया
- पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने आयोग को विस्तार दिया
- छह साल में आयोग को करीब 11 विस्तार दिए, तब जाकर रिपोर्ट आई
- तब से गैरसैंण में विस भवन बन गया, ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित हो गई, लेकिन स्थायी राजधानी की पहेली अब भी जस की तस है

भाजपा ने गलती की। बिना राजधानी का राज्य दिया। मेरा 21 साल का अनुभव है कि राजनीतिक नेतृत्व ठीक से फैसला नहीं कर पाया। दिशा नहीं दे पाया। ग्रीष्मकालीन राजधानी पर्वतीय वोटों को साधने का उपाय है। कांग्रेस नेताओं का संकल्प है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाएंगे। 
- धीरेंद्र प्रताप, पूर्व अध्यक्ष राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद 

भाजपा की तत्कालीन केंद्र सरकार ने स्थायी राजधानी का विकल्प खुला छोड़ दिया। ऐसा देश के किसी और प्रदेश के साथ नहीं हुआ। झारखंड व छत्तीसगढ़ की राजधानियां घोषित हुईं। उत्तराखंड को लेकर अगस्त 2000 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश को पत्र लिख दिया कि जब तक स्थायी राजधानी नहीं हो जाती, तब तक देहरादून अस्थायी राजधानी होगी। गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाये जाने से साफ हो गया कि उसका स्थान दूसरे दर्जे का है। 
- इंद्रेश मैखुरी, भाकपा नेता 

राज्य से पहले राजधानी तय हो गई थी। नब्बे के दशक में यूकेडी ने वीरचंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर चंद्रनगर नाम दिया, लेकिन राज्य गठन के 20 साल बाद भी राज्य की स्थायी राजधानी तय नहीं हो सकी। पहाड़ की राजधानी पहाड़ में हो, गैरसैंण इस अवधारणा की प्रतीक थी। चूंकि राज्य में पहाड़ केंद्रित नीतियों का अभाव है, इसलिए ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित हो गई। जबकि आज तक उसका कोई ब्लू प्रिंट सामने नहीं आया है। 
- रविंद्र जुगरान, वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी 

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