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अस्थिरता बनी उत्तराखंड की सियासत की पहचानः असंतोष, सत्ता संघर्ष बन रहे आधार
Wed, 10 Mar 2021 06:41 AM IST
दुष्यंत शर्मा
सुधाकर भट्ट, देहरादून
सुधाकर भट्ट, देहरादून
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 10 Mar 2021 06:41 AM IST
सार
- भारी बहुमत के बावजूद कार्यकाल पूरा करने से मात्र एक साल पहले कुर्सी गंवाई त्रिवेंद्र रावत ने
- नए मुख्यमंत्री को मिलेगा सिर्फ एक साल का कार्यकाल, खासा समय पुनर्गठन में बीतेगा
- सिर्फ एनडी तिवारी ही पूरा कर पाए पांच साल का कार्यकाल
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राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
छोटे से राज्य उत्तराखंड ने आर्थिक मोर्चे पर भले ही तेज विकास दर हासिल करने का जज्बा दिखाया हो लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर राज्य अस्थिरता का शिकार ही होता दिख रहा है। अब तक के आठ मुख्यमंत्रियों में सिर्फ एक एनडी तिवारी ही हैं जो पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाए। त्रिवेंद्र भी एनडी की राह पर थे लेकिन उनका नेतृत्व भी चार साल पूरा नहीं चल पाया।
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2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 57 सीट हासिल की थीं तो लगा था कि त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार इस भारी बहुमत के चलते पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी। शुरू के तीन साल तक उनके नेतृत्व पर संकट के इतने घनघोर बादल कभी मंडराए भी नहीं थे। सरकार खुद चार साल के कार्यकाल का जश्न मनाने की तैयारी कर भी रही थी। इतना होने पर भी चार साल पूरा होने से नौ दिन पहले ही मुख्यमंत्री के पद से त्रिवेंद्र सिंह रावत की विदाई हो गई।
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त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री पद से विदाई के पीछे एक कारण विधायकों के बीच असंतोष माना जा रहा है। हालांकि यह असंतोष कभी सामूहिक रूप से खुलकर सामने नहीं आया। लेकिन चंपावत के विधायक पूरन सिंह फर्तयाल की ओर से सदन में अपनी ही सरकार के खिलाफ काम रोको प्रस्ताव ले आना एक संकेत जरूर कर गया था। भाजपा में इसी तरह का असंतोष पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के कार्यकाल में भी सामने आया था। उस समय एक सिरे पर कुमाऊं के खांटी नेता भगत सिंह कोश्यारी खड़े दिखाई दिए थे। उस समय रमेश पोखिरियाल निशंक को भाजपा ने कुर्सी थमाई थी।
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इसके बाद सत्ता कांग्रेस के हाथ में आई तो विजय बहुगुणा को कमान सौंपी गई। कांग्रेस में भी पार्टी के अंदर का सत्ता संघर्ष खुलकर सामने आया और 2013 की आपदा के बाद विजय बहुगुणा को भी कुर्सी गंवानी पड़ी।
इसके बाद मुख्यमंत्री बने हरीश रावत को खासा झंझावात झेलना पड़ा। पार्टी के नौ मंत्री और विधायक बगावत कर गए। उत्तराखंड को राष्ट्रपति शासन का दंश झेलना पड़ा। रावत कोर्ट की बदौलत अपना कार्यकाल पूरा कर पाए लेकिन खुलकर शासन करना उनके लिए भी संभव नहीं हो पाया।
पहले और अब में एक बात और जो सामने आई वह थी अफसरशाही और विधायिका के बीच तालमेल की कमी। अफसरों से न बन पाने के कारण भी विधायकों का असंतोष लगातार बढ़ता गया। भुवन चंद्र खंडूड़ी के समय प्रभात सारंगी का नाम सामने आता रहा। कांग्रेस ने बाकायदा सारंगी लेकर विधानसभा के सामने प्रदर्शन तक किया था।
त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में भी अफसरशाही के बेलगाम होने की बात की जाती रही। मंत्री रेखा आर्य ने तो एक अफसर को खोज कर लाने के लिए पुलिस को चिठ्ठी तक लिखी थी। किच्छा विधायक राजेश शुक्ला भी एक अफसर के खिलाफ खुलकर मैदान में आए थे। अब नए मुख्यमंत्री के पास भी काम करने के लिए मात्र एक साल का ही समय होगा।