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उत्तराखंड: पनबिजली परियोजना से चमोली के पुरातात्विक मंदिरों को खतरा, ग्रामीणों ने लिखा प्रधानमंत्री को पत्र

Mon, 27 Dec 2021 01:12 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Mon, 27 Dec 2021 01:12 PM IST
सार

पत्र में कहा गया है कि टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की ओर से उनके गांव के नजदीक चलाई जा रही 444 मेगावाट की विष्णुगाढ़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना के चलते उनके घरों के साथ-साथ क्षेत्र के प्राचीन मंदिरों के लिए भी खतरा पैदा हो गया है।

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uttarakhand news: archaeological temples of Chamoli is in danger due to hydroelectric project, villagers writes letter to pm
पीएम मोदी - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

चमोली जिले के ऐतिहासिक गांव नानि-काशी हाट (छोटी काशी) के निवासियों ने आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मंदिरों को बचाने के लिए पीएम मोदी को पत्र लिखकर गुहार लगाई है। यहां प्राचीन युग में स्थापित 15-20 छोटे मंदिरों का एक समूह है। 

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टिहरी हाइड्रो विकास निगम ने गांव के ठीक ऊपर कूड़ा डंपिंग जोन बनाया
पत्र में कहा गया है कि टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की ओर से उनके गांव के नजदीक चलाई जा रही 444 मेगावाट की विष्णुगाढ़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना के चलते उनके घरों के साथ-साथ क्षेत्र के प्राचीन मंदिरों के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। पीएम मोदी को लिखे गए पत्र में ग्रामीणों ने कहा है कि टिहरी हाइड्रो विकास निगम ने गांव के ठीक ऊपर कूड़ा डंपिंग जोन बनाया है।
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ग्राम प्रधान राजेंद्र हटवाल की ओर से भेजे गए पत्र में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि टीएचडीसी ने आदि शंकराचार्य की ओर से स्थापित लक्ष्मी नारायण मंदिर के गर्भगृह के ठीक ऊपर एक कचरा डंपिंग क्षेत्र स्थापित किया है। डंपिंग जोन की दीवार कभी भी गिर सकती है और मंदिर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

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ग्रामीणों के समर्थन में सामने आया आईएनटीएसीएच

इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (आईएनटीएसीएच) भी ग्रामीणों के समर्थन में सामने आया है। आईएनटीएसीएच ने टीएचडीसी के साथ-साथ विश्व बैंक इस संबंध में पत्र लिखा है। विश्व बैंक इस परियोजना को वित्त पोषित कर रहा है।

आईएनटीएसीएच के वास्तुशिल्प विरासत प्रभाग के प्रधान निदेशक दिव्य गुप्ता ने अपने पत्र में कहा कि प्राचीन परिसर (मंदिर स्थलों और अवशेषों सहित) और गांव को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की संरक्षित सूची में शामिल किया जाना चाहिए। इसके बजाय इसके बेहद करीब पनबिजली परियोजना शुरू कर दी गई है। प्राचीन बस्ती और पवित्र स्थल के आसपास के इलाके को बिजली परियोजना की डंपिंग साइट के रूप में नामित किया गया है, जो इस महत्वपूर्ण विरासत स्थल को स्थायी नुकसान के गंभीर जोखिम में डाल देता है।

गुप्ता ने विष्णुगढ़-पीपलकोटी एचईपी परियोजना स्थल के सर्वेक्षण के बाद 2009 में एएसआई की ओर से दायर रिपोर्ट का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि लक्ष्मी नारायण मंदिर जो 9-10वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का है, परियोजना के तत्काल प्रभावित क्षेत्र में स्थित है।

इस बीच विश्व बैंक के अधिकारियों ने पिछले दिनों करीब दो दर्जन ग्रामीणों के साथ ऑनलाइन बैठक की। जिसमें प्रधान हटवाल ने कहा कि विश्व बैंक इस परियोजना के लिए ऋण कैसे मंजूर कर सकता है, यदि उसे परियोजना स्थल और इसके महत्व के बारे में पता ही नहीं है? हमारे गांव में प्राचीन युग से संबंधित लगभग 15-20 छोटे मंदिर समूह हैं। हाल ही में एक ग्रामीण के घर से एक हजार वर्ष से अधिक पुराने तांबे के बर्तन मिले हैं, जो हमारे गांव के ऐतिहासिक महत्व को बताते हैं। फिर भी अधिकारियों ने हमारे गांव को पीपलकोटी में बिरई से हेलंग तक 14.5 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने के लिए एक डंपिंग साइट के रूप में चुना है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

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