उत्तराखंड: पंचायतीराज संशोधन बिल पर राजभवन की मुहर, दो बच्चों की शर्त का कानून बना
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पंचायतीराज संशोधन बिल-2019 पर राजभवन की मुहर लग गई है। इसके साथ ही, दो से ज्यादा बच्चे होने की स्थिति में कोई भी अब त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भाग नहीं ले पाएगा। ये ही नहीं, उम्मीदवारों के लिए पहली बार शैक्षिक योग्यता भी तय कर दी गई है। पंचायत चुनाव इस साल के आखिरी में संभावित माने जा रहे हैं।
पंचायतीराज संशोधन बिल पर राजभवन की मुहर लग जाने के बाद अब इस पर एक बार फिर से सियासी घमासान मचना भी तय माना जा रहा है। कांग्रेस समेत पंचायतों के तमाम संगठन पंचायतीराज विधेयक में खामियों को रेखांकित कर रहे हैं। दूसरी तरफ, पंचायतीराज मंत्री अरविंद पांडेय ने पूर्व सांसद बलराज पासी के साथ राज्यपाल बेबी रानी मौर्य से मुलाकात कर बिल को मंजूरी देने पर आभार जताया।
पिछले महीने 24 से 26 तारीख तक चले विधानसभा सत्र में पंचायतीराज संशोधन बिल-2019 को सरकार ने पारित किया था। इसे जुलाई के पहले सप्ताह में मंजूरी के लिए राजभवन भेजा गया था। इस बिल पर पहले दिन से ही सियासी घमासान छिड़ा हुआ है। दरअसल, एक्ट में संशोधन के दौरान दो बच्चों से जुड़ी शर्त पर बहस छिड़ी हुई है।
इस शर्त को लागू करते हुए 300 दिन के ग्रेस पीरियड को खत्म कर दिया गया है। इस पर पंचायत संगठनों को एतराज है। इसका सीधा सा यह अर्थ है कि राजभवन की मुहर लगने के बाद अब जैसे ही इस संबंध में गजट नोटिफिकेशन होगा, उस दिन से ही पंचायत चुनाव लड़ने के वे लोग अयोग्य हो जाएंगे, जिनके दो से ज्यादा बच्चे हैं।
कोई कट ऑफ डेट न देने होने के कारण एक झटके में हजारों दावेदार पंचायत चुनाव में दावेदारी से अब वंचित हो जाएंगे। इसी तरह, एक्ट में ओबीसी के लिए शैक्षिक योग्यता का कहीं कोई जिक्र न होने को भी पंचायत संगठनों से जुडे़ लोग इसके विरोध में उतरे हुए हैं।
हमने तीन बार राज्यपाल से इस मामले में मुलाकात की अनुमति मांगी, लेकिन नहीं मिल पाई। इस बिल पर मुहर लगने से पहले हमारी बात हो जाती, तो बेहतर था, लेकिन अब हमारे लिए कोर्ट के दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुल गया है। पंचायतीराज संशोधन बिल में जितनी खामियां हैं, वह दूर होनी चाहिए। हम संघर्ष करेंगे।
- जोत सिंह बिष्ट, संयोजक/संस्थापक पंचायत जनाधिकार मंच।
यह संशोधन परिवार नियोजन के साथ ही जनप्रतिनिधियों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिहाज से भी अहम है। पंचायतों में सुधार को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह बड़ा कदम उठाया है। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, उनके सियासी पूर्वाग्रह हैं। जनता के स्तर पर इस संशोधन का स्वागत किया जा रहा है।
- मदन कौशिक, शासकीय प्रवक्ता, उत्तराखंड।
निकायों की नजीर सामने, कानूनी दांव पेच चलेंगे
पंचायतीराज संशोधन बिल के एक्ट बन जाने के बाद इस मामले में कानूनी दांव पेंच चलने के आसार भी बन गए हैं। पंचायतों के तमाम संगठन इस इंतजार में थे कि एक्ट बनते ही वह कोर्ट का दरवाजा खटखटाए। दरअसल, पंचायत संगठनों का कहना है कि 2004 में दो बच्चों की शर्त नगर निकाय के चुनाव में भी लागू की गई थी, लेकिन एक कट ऑफ डेट उस वक्त भी दी गई थी।
इस बार ऐसा नहीं किया गया है। नगर निकाय और पंचायत में अलग-अलग व्यवस्था कैसे संभव है। दूसरी तरफ, कांग्रेस जैसे संगठन ये बात उठा रहे हैं कि पंचायत निकाय में ये व्यवस्था लागू की गई है, जबकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को क्या छोड़ दिया गया है।
एक्ट में फिर संशोधन के लिए अध्यादेश भी संभव
पंचायतीराज एक्ट में संशोधन की फिर से गुंजाइश भी संभव है। सरकार के भरोसेमंद सूत्र यह जानकारी देते रहे हैं कि ज्यादा विरोध बढ़ा, तो दो बच्चों की शर्त में कट ऑफ डेट के विकल्प पर बात आगे बढ़ सकती है। चूंकि हाल फिलहाल विधानसभा का कोई सत्र प्रस्तावित नहीं है, ऐसे में अध्यादेश लाने की स्थिति बन सकती है।
उधर कोर्ट में सुनवाई, इधर राजभवन की लगी मुहर
पंचायत चुनाव में देरी पर बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट में सुनवाई थी, तो दूसरी तरफ, इसीदिन राजभवन की मुहर संशोधन बिल पर लग गई। दरअसल, इस संशोधन बिल पर जिस तरह से सियासी संग्राम छिड़ा, उसके बाद राजभवन के रुख पर सबकी निगाह लगी हुई थी।