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राज्य स्थापना दिवस: उत्तराखंड गठन के बाद सात जिलों में बढ़ा और छह में घटा वन आवरण
Wed, 10 Nov 2021 09:36 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Wed, 10 Nov 2021 09:36 AM IST
सार
भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सात जिलों में वन आवरण बढ़ा है, जबकि छह जिलों में वन आवरण में कमी है।
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- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
राज्य गठन के बाद वन अवस्थापना विकास कार्यों में बड़े पैमाने पर वन भूमि प्रयोग में लाई गई, जिससे इसके वन परिक्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई है। भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सात जिलों में वन आवरण बढ़ा है, जबकि छह जिलों में वन आवरण में कमी है। जबकि बागेश्वर में 34, हरिद्वार में 27, नैनीताल में 66, रुद्रप्रयाग में 11, ऊधमसिंह नगर में 337 और उत्तरकाशी में 35 वर्ग किमी क्षेत्रफल में वन आवरण की कमी हुई है।
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71.05 प्रतिशत भूमि वन आच्छादित
उत्तराखंड बनने से पहले भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट 1999 के अनुसार, राज्य का कुल वन आवरण 23948 वर्ग किमी था, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 44.76 प्रतिशत था। उत्तराखंड बनने के बाद भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट 2019 के अनुसार 355 वर्ग किमी वन आवरण में वृद्धि होकर कुल वन आवरण 24303 वर्ग किमी हो गया है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 45.44 प्रतिशत हो गया है।
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वर्ष 2020-21 उत्तराखंड आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखंड में 51,125 वर्ग किलोमीटर के कुल क्षेत्र में से लगभग 71.05 प्रतिशत भूमि वन आच्छादित है। इसमें से 13.41 प्रतिशत वन क्षेत्र वन पंचायतों के प्रबंधन के अंतर्गत आता है।
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स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में सुधार विशेषज्ञ डॉक्टरों की चुनौती बरकरार
राज्य गठन के बाद उत्तराखंड ने स्वास्थ्य के मोर्च पर लंबी छलांग लगाई है। स्वास्थ्य क्षेत्र में बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) समेत नए मेडिकल कॉलेज स्थापित होने से जहां लोगों को बेहतर इलाज की सुविधाएं मिली हैं। वहीं, प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की चुनौती बरकरार है।
राज्य बनने के समय उत्तराखंड में एक भी राजकीय मेडिकल कॉलेज नहीं था। वर्तमान में ऋषिकेश में एम्स और देहरादून, हल्द्वानी, श्रीनगर में राजकीय मेडिकल संचालित हैं। अल्मोड़ा में इसी साल से मेडिकल कॉलेज संचालित करने की तैयारी चल रही है। जबकि हरिद्वार, रुद्रपुर और पिथौरागढ़ में मेडिकल कॉलेज प्रस्तावित है।
राज्य में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का विस्तार और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का आकार बढ़ा है। जिससे लोगों की सेहत और सिस्टम में सुधार आया है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ने से प्रदेश में मातृ व शिशु मृत्यु दर में सुधार आया है। सरकार की ओर से मरीजों को निशुल्क पैथोलॉजी जांच के साथ ही दवाईयां भी मुफ्त दी जा रही हैं। इसके अलावा राज्य अटल आयुष्मान योजना के तहत प्रदेश के हर परिवार को पांच लाख मुफ्त इलाज की सुविधा दी है।
उत्तराखंड राज्य गठन से पहले स्वास्थ्य प्राथमिकता का क्षेत्र नहीं रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में अस्पतालों और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति काफी चिंताजनक थी। जिससे लोगों को छोटी सी बीमारी के लिए वैद्य या पारंपरिक घरेलू इलाज पर निर्भर रहना पड़ता है। उत्तर प्रदेश के समय पर्वतीय क्षेत्रों में डॉक्टर सेवाएं देने से कतराते थे। पहाड़ों में डॉक्टरों को तैनात करना एक सजा के रूप में देखा जाता है। अलग राज्य की मांग स्वास्थ्य सुविधा भी एक बड़ा मुद्दा था।
ये हैं चुनौतियां
प्रदेश में बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए अभी तक विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। हालांकि सरकार की ओर से डॉक्टरों की तैनाती के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग में 1147 विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद सृजित हैं। जिसमें वर्तमान में 493 ही कार्यरत हैं। जबकि 654 विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली हैं। बाल एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की सबसे ज्यादा कमी है। पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर व अन्य पैरामेडिकल स्टाफ की कमी के चलते मरीजों को बेहतर इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है। पहाड़ों में डॉक्टरों को तैनात करने चुनौती बरकरार है।