Uttarakhand: जंगल के मुखबिरों पर ऐसे ही नहीं लुटा पाएंगे जनता की कमाई, पहली बार जारी की जाएगी एसओपी
आमतौर पर पुलिस, कानून और सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों के कुशल संचालन के लिए गुप्तचरों का एक तंत्र खड़ा किया जाता है, जिसके लिए ऐसे विभागों या एजेंसियों को सरकार की ओर से गुप्त व्यय मद में अच्छा-खासा बजट उपलब्ध कराया जाता है।
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आपने गुप्त दान के बारे में सुना होगा, लेकिन आज हम आपको बताएंगे गुप्त व्यय के बारे में, जिसका हिसाब-किताब नहीं रखा जाता। उत्तराखंड वन विभाग में भी वनों की सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए गुप्त व्यय का प्रावधान है, लेकिन यहां भी इसके खर्च का हिसाब नहीं लिया जाता है। विभाग में पहली बार गुप्त व्यय को खर्च करने के लिए एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) तैयार की जा रही है।
आमतौर पर पुलिस, कानून और सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों के कुशल संचालन के लिए गुप्तचरों का एक तंत्र खड़ा किया जाता है, जिसके लिए ऐसे विभागों या एजेंसियों को सरकार की ओर से गुप्त व्यय मद में अच्छा-खासा बजट उपलब्ध कराया जाता है। इस बजट को कहां और किस प्रकार खर्च किया गया, हर विभाग में इसके अलग-अलग मानक तय हैं। बीतें दिनों फॉरेस्ट क्राइम कंट्रोल कमेटी की बैठक में यह मुद्दा उठा, तब जाकर एसओपी तैयार किए जाने के मुद्दे पर सहमति बनी।
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वित्तीय वर्ष 2023-24 में गुप्त व्यय पर खर्च के लिए वन विभाग की ओर से कुल 56.43 लाख रुपये बजट का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही इस राशि को वन संरक्षकों के निवर्तन पर रखे जाने का निर्णय लिया गया है। अगले तीन माह में एसओपी बनाने का भी निर्णय लिया गया है।
इसलिए महसूस की गई एसओपी की जरूरत...
नाम नहीं छापने की शर्त पर विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि वैसे तो इस राशि का प्रयोग मुखबिरों के सूचना तंत्र को मजबूत बनाने के लिए किया जाता है, जिनसे अपेक्षा की जाती है कि वह वन्यजीवों के शिकार रोकने, अतिक्रमण, अवैध पातन और वन जुड़े अन्य अपराधों को रोकने में मदद करें। लेकिन, बीते कुछ वर्षों में देखने में आ रहा है कि प्रभागीय वन अधिकारियों की ओर से गुप्त व्यय मद में मिलने वाली राशि का प्रयोग तमाम दूसरे कामों में कर दिया जा रहा है। इससे विभाग का सूचना तंत्र कमजोर पड़ा है। इसलिए अब इसके लिए एसओपी बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
खतरे में पड़ सकती है मुखबिरों की सुरक्षा
वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए मुखबिरों के सूचना तंत्र को रेंज स्तर तक विकसित किया जाता है। सूचनाओं की एवज में डीएफओ के स्तर पर रेंजों तक जरूरत के अनुसार बजट का उपलब्ध कराया जाता है। ऐसे में गुप्तचरों के नाम भी गुप्त रखे जाते हैं। वन सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो इस मामले में गुप्तचरों के नाम लिखत-पड़त में आने पर उनकी सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।
सुरक्षा की दृष्टी से गुप्त व्यय में खर्च की जाने वाली राशि का खुला हिसाब नहीं दिया जा सकता है। प्रभागों की संवेदनशीलता को देखते हुए इस राशि का वितरण किया जाता है। जो पैसा दिया जाता है, वन्य एवं वन्यजीवों के अपराधों से संबंधित केसों की सफलता के आधार पर उसका आकलन किया जाता है। शीघ्र ही इसके लिए एसओपी भी तैयार कर जDhami Pm।
- डॉ. समीर सिन्हा, चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन