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मौत से एक दिन पहले यू-ट्यूब पर नया गाना अपलोड कर दुनिया को अलविदा कह गए मशहूर सिंगर पप्पू कार्की

Sun, 10 Jun 2018 09:05 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पिथौरागढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पिथौरागढ़ Updated Sun, 10 Jun 2018 09:05 AM IST
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pappu karki death in road accident in uttarakhand
Pappu Karki - फोटो : file photo

कुमाऊंनी गीतों के स्टार कलाकार के रूप में तेजी से उभरे प्रवेंद्र उर्फ पप्पू कार्की (34) की सड़क दुर्घटना में हुई मौत की खबर सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद यहां उनके गृहक्षेत्र प्रेमनगर (पांखू) के लोग स्तब्ध रह गए। पप्पू की मां ने जब अपने कलेजे के टुकड़े की मौत की खबर सुनी तो वह बेसुध हो गईं।

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पप्पू कार्की के चाचा हनुमान कार्की और चाची देवकी देवी सेलावन गांव से किसी काम के लिए प्रेमनगर आए थे। पप्पू की मां कमला देवी चार दिन पहले अपने पोते का जन्मदिन मनाकर हल्द्वानी से गांव लौटी थीं। पूरे इलाके में आग की तरह फैली इस खबर को उसकी मां को बताने का साहस कोई नहीं कर पाया। बाद में पप्पू की चाची और अन्य ग्रामीणों से अपने कलेजे के टुकड़े की मौत की जानकारी मिलने पर वह बेसुध हो गईं। होश में आने पर वह बार-बार प्रमेंद्र को याद कर दहाड़ें मारकर रोने लगतीं। ग्रामीण उन्हें ढाढ़स बंधाने का प्रयास कर रहे थे।
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बता दें कि पप्पू के यू ट्यूब चैनल पीके एंटरटेनमेंट ग्रुप पर शुक्रवार को झोड़ा ऑडियो गाना ‘चांचरी’ अपलोड किया गया था। और उसके एक दिन बाद वह दुनिया को अलविदा कह गए। शनिवार शाम चार बजे इस गाने पर 63489 हिट्स थे और दो घंटे बाद ही हिट्स की संख्या 84224 पहुंच गई। कल राज युवा महोत्सव में भी पप्पू कार्की ने यह गाना गाया था। इसी महोत्सव से लौटते वक्त शनिवार को हादसे में उनकी मौत हो गई।
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पांच साल की उम्र से ही न्योली गाना शुरू कर दिया था पप्पू कार्की ने
पिथौरागढ़ के बेड़ीनाग निवासी लोक गायक पप्पू कार्की ने शुरुआती शिक्षा प्राथमिक विद्यालय हीपा से ग्रहण की। जूनियर हाईस्कूल की पढ़ाई जूनियर हाईस्कूल प्रेमनगर से की। हाईस्कूल राजकीय हाईस्कूल भट्टीगांव से किया। उसकी गायन की प्रतिभा को बचपन से आंकने वाले पप्पू के रिश्ते के चाचा अध्यापक कृष्ण सिंह कार्की बताते हैं कि वह पांच साल की उम्र से ही कान में हाथ लगा कर न्योली गाने लगा था।

होली, रामलीला एवं स्कूल में राष्ट्रीय पर्वों में वह हमेशा ही गाता था। उन्होंने बताया कि परिवार की हालत खराब थी। इस कारण हाईस्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ कर दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करने लगा। कृष्ण कार्की बताते हैं कि वह खुद लोक संगीत में रुचि रखते थे एवं कुमाऊंनी गीतों का एलबम बनाते थे। उन्होंने अपने एलबम ‘फौज की नौकरी में’ पप्पू को गाने का मौका दिया। उसके बाद 2002 में उनके अन्य एलबम ‘हरियो रूमाला’ में भी पप्पू ने गीत गाए। बाद में पप्पू ने 2003 में अपने पहले एलबम ‘मेघा’ से खुद के गाए गीतों के एलबमों की शृंखला शुरू की। कार्की बताते हैं कि पप्पू उन्हें अपने गुरु के समान मानता था। बेड़ीनाग आने पर उनके आवास में रुकता था। प्रतिदिन सबसे पहले उन्हें सुप्रभात का संदेश भेजता था। आज सुबह उसका संदेश नहीं आया, कुछ देर बाद यह मनहूस खबर मालूम चल गई। बताते हैं कि उनके परिवार में भी सबका रो-रो कर बुरा हाल है। 

चाची मैंने कैसा गाना गाया...

pappu karki death in road accident in uttarakhand
Pappu Karki - फोटो : file photo
पप्पू की चाची देवकी देवी ने रोते हुए बताया कि बीती रात उसने डरावना सपना देखा था। उसे अनिष्ट होने का अंदेशा हो गया था। उन्होंने बताया कि उनकी शादी में कम उम्र के पप्पू ने कान में हाथ लगा कर न्योली गाकर पूछा कि चाची मैंने कैसा गाया। सैनर की प्रधान दीपा देवी ने बताया कि पप्पू कार्की इलाके के गौरव थे। गांव के सुंदर कार्की ने बताया कि पप्पू की मां चार दिन पहले हल्द्वानी से पोते का जन्मदिन मना कर आई थी। पप्पू उन्हें हल्द्वानी रहने को कहता था, लेकिन घर के मवेशियों और खेती से लगाव के कारण वह गांव में रहना पसंद करती हैं।

पप्पू थे परिवार के इकलौते चिराग
बेड़ीनाग तहसील की सैनर ग्राम पंचायत के शेलावन तोक में 1984 में जन्मे पप्पू कार्की के कृषक पिता कृष्ण कार्की का करीब डेढ़ साल पहले निधन हो चुका था। पप्पू परिवार के इकलौते चिराग थे। वह अपनी पत्नी कविता एवं पांच वर्षीय पुत्र दक्ष के साथ हल्द्वानी में किराए के मकान में रहते थे। गांव में उनकी मां कमला देवी, चाचा हनुमान कार्की, चाची देवकी देवी, अन्य दो दिवंगत चाचाओं का परिवार रहता है। पप्पू की 30 वर्षीय बहन कुंती का विवाह भैंस्कोट गांव में हुआ है।

नेपाली धुन पर पहाड़ी गाना
पप्पू को नए अंदाज में काम करना काफी पसंद था। वह अपनी टीम के साथ नया प्रयोग करते थे। हाल ही में नेपाली मूल की गायिका मान्डबी त्रिपाठी के साथ पप्पू ने छम छम बाजली हो पहाडी गाने को नेपाली संगीत में पिरोया था जिसकी काफी सराहना हुई थी। गाना काठमांडू के ही एमबी म्यूजिक स्टूडियो में रिकार्ड किया गया था जिसकी लाइव विडियो यू ट्यूब पर अपलोड की थी।

कई सम्मान थे खाते में
पप्पू कार्की ने वर्ष 2006 में दिल्ली में आयोजित उत्तराखंड आइडल में प्रतिभाग किया था। इसमें उन्हें दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था। वर्ष 2009 में मसूरी में आयोजित एक अवार्ड समारोह में उन्हें सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार का खिताब मिला। 2014 में बेस्ट सिंगर के लिए यूका अवार्ड से सम्मानित किया गया जबकि वर्ष 2015 में मुंबई में गोपाल बाबू गोस्वामी अवार्ड भी मिल चुका था। 
 

छह बहनों का इकलौता भाई था पप्पू

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Pappu Karki
लोकगायक पप्पू कार्की के साथ दुर्घटना का शिकार बीटेक का छात्र पुष्कर छह बहनों में इकलौता भाई था। उसका नोएडा की एक कंपनी में नौकरी के लिए चयन हो गया था। उसकी मौत की खबर पाकर पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे परिजनों का रो रोकर बुरा हाल था। 

गौनियारो निवासी डालकन्या प्राथमिक स्कूल में शिक्षक उत्तम सिंह का बेटा पुष्कर पढ़ाई के साथ ही सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता था। युवा महोत्सव 2018 के कार्यक्रम में पुष्कर को कोषाध्यक्ष बनाया गया था। इसी कारण वह गांव के एक व्यक्ति की कार मांगकर पप्पू कार्की को छोड़ने के लिए जा रहा था। कार पुष्कर खुद चला रहा था। घायल अजय आर्या का कहना था कि कार के आगे पत्थर आने के कारण गाड़ी अनियंत्रित हो गई जबकि अन्य लोगों का कहना था कि रात के कार्यक्रम में जागने के कारण पुष्कर को झपकी आ गई थी।

मोर्चरी में पुष्कर के चाचा विजय सिंह गौनिया, मामा तेज सिंह, बुआ मोहिनी, बहनें हेमा और खष्टी भी पहुंचीं। पुष्कर की एक बहन की शादी हो चुकी है। घटना का शिकार राजेंद्र तीन भाइयों में सबसे बड़ा था। अन्य भाई गिरधर, बहन यशोदा और छोटा भाई मुकेश हैं। राजेंद्र परिवार के कामों में हाथ बंटाता था। उसके पिता बिशन सिंह गौनिया किसान हैं।  

‘नरेंद्र सिंह नेगी से लगता था डर...’
उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि उन्हें पूरा यकीन था कि लोक संगीत के क्षेत्र में पप्पू कार्की बहुत आगे जाएगा। बकौल नेगी दा ‘ वह अक्सर कहता था कि मुझे आपसे बात करने में डर लगता है।’ तब मैंने उससे कहा था कि डरने की क्या बात है, हम सब कलाकार ही तो हैं। उन्होंने बताया कि इंग्लैंड में इसी महीने होने वाले कार्यक्रम के लिए जब उनसे किसी कलाकार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने आयोजकों को पप्पू कार्की का नाम ही सुझाया था। बकौल नेगी दा, उसका लोकगीतों के प्रति रुझान ही उसे आज के गायकों से अलग करता था। उनकी गायकी से प्रभावित होकर ही उन्होंने पप्पू कार्की को व्यक्तिगत रूप से फोन कर शुभकामनाएं दीं थीं। उनके निधन से उत्तराखंडी लोक संगीत को अपूर्णीय क्षति पहुंची है।
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