उत्तराखंड: कई विवादों से रहा त्रिवेंद्र सिंह रावत का नाता, एक बार सीबीआई तक पहुंचा था मामला
- हाईकोर्ट ने सीबीआई को दिए थे मुख्यमंत्री के मामले में एफआईआर दर्ज करने के आदेश
- उत्तरा प्रकरण से लेकर अपने ही विधायकों की नाराजगी को लेकर भी रहे विवाद
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जीरो टॉलरेंस की नीति को लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत का विवादों ने पीछा नहीं छोड़ा। विवाद यहां तक पहुंचे की उच्च न्यायालय ने उनसे जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने तक के आदेश दे दिए। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिल गई। उत्तरा प्रकरण हो या अपनों की नाराजगी, गाहे-बगाहे विवादों का साया मंडराता ही रहा।
शिक्षिका से जनता दरबार में तल्खी के बाद आए निशाने पर
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र का सबसे पहला विवाद 29 जून 2018 को चल रहे जनता दरबार कार्यक्रम में हुआ। जनता मिलन कार्यक्रम में उस वक्त अफरातफरी मच गई, जब उत्तरकाशी से आई प्राइमरी शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा ने हंगामा शुरू कर दिया। उन्होंने सीएम को ट्रांसफर न होने पर अपनी समस्या बताई तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत गुस्सा गए और उत्तरा पंत को सस्पेंड तक कर देने की धमकी दे डाली। जिस पर शिक्षिका ने आपा खो दिया और सीएम को बुरा-भला कह दिया, जिससे हंगामा हो गया। तत्कालीन शिक्षा सचिव भूपेंद्र कौर औलख ने शिक्षिका के निलंबन के आदेश जारी कर दिए। इस पूरे प्रकरण को लेकर मुख्यमंत्री न केवल शिक्षक संगठनों के निशाने पर आए बल्कि जनता के बीच भी उनकी छवि धूमिल हुई।
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जब हाईकोर्ट ने दिए मुकदमा दर्ज करने के आदेश
28 अक्तूबर 2020 को नैनीताल हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को तगड़ा झटका दिया। कोर्ट ने पत्रकार उमेश जे कुमार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों को निरस्त करने का आदेश दिया। साथ ही उमेश की याचिका में लगाए आरोपों के आधार पर सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ लगे आरोपों को देखते हुए यह सही होगा कि सच सामने आए। यह राज्य हित में होगा कि संदेहों का निवारण हो। हालांकि बाद में राज्य सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई।
अपने ही सिंचाई मंत्री ने बैठा दी सीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट की जांच
27 अक्तूबर 2020 को सिंचाई मंत्री सतपाल महाराज ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल सूर्यधार झील के निर्माण कार्य की विशेष जांच करने के आदेश दे दिए। महाराज ने कुछ दिन पहले ही सिंचाई विभाग से निर्माण कार्य की लागत बढ़ने का कारण पूछा था। विभाग की ओर से दिए गए जवाब पर असंतोष जाहिर करते हुए महाराज ने यह आदेश जारी कर दिए। महाराज का कहना था कि विभाग के स्तर पर दिए गए जवाब में कई गड़बड़ियां थीं।
भोगपुर में बनाई जा रही इस बांध परियोजना में 1837.34 लाख की लागत का अनुमान था। 41 करोड़ रुपये का भुुगतान किया जा चुका था। डीपीआर में बैराज की ऊंचाई आठ मीटर थी। आईआईटी अहमदाबाद और आईआरआई रुड़की से मॉडल स्टडी के बाद यह ऊंचाई दस मीटर होनी थी। इस पर मौखिक निर्णय लिया गया। इसी योजना को लेकर सिंचाई मंत्री सतपाल महाराज ने 27 सितंबर को स्थलीय निरीक्षण भी किया था। इस आदेश से मुख्यमंत्री काफी असहज हो गए थे।
जब विधायक फर्त्याल ने लगाया था भ्रष्टाचार का आरोप
जीरो टॉलरेंस की नीति पर अमल करने वाली त्रिवेंद्र सरकार में उनके ही विधायक पूरन फर्त्याल ने सितंबर 2020 में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए विधानसभा सत्र के दौरान सदन में कार्य स्थगन के प्रस्ताव की सूचना लाकर सबको असहज कर दिया था। टनकपुर-जौलजीवी सड़क के टेंडर के मुद्दे पर विधायक फर्त्याल आर-पार की जंग लड़ रहे हैं। विधानसभा सत्र से पहले भी उन्होंने इस मामले में सरकार और शासन के अफसरों की भूमिका पर सवाल उठाए थे।
उनके इस आचरण पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भगत ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया था। जिसका तत्काल जवाब न देकर फर्त्याल ने पार्टी अध्यक्ष को अपना पक्ष रखने के लिए लंबा इंतजार कराया। पार्टी कार्यालय पहुंचने पर प्रदेश अध्यक्ष ने फर्त्याल को ताकीद किया था कि वे ऐसा कोई भी बयान या आचरण न करें, जिससे सरकार और संगठन की छवि प्रभावित हो। तब यह मान लिया गया था कि फर्त्याल नरम पड़ गए हैं। लेकिन उनके रुख में कोई नरमी नहीं आई। फर्त्याल ने इसकी शिकायत संगठन के केंद्रीय पदाधिकारियों से भी की थी। उनका कहना था कि इस सड़क के टेंडर में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार किया गया है।
दायित्वधारी बनाने पर भी अंदरखाने कलह
मुख्यमंत्री ने हाल ही में 18 लोगों को दायित्वधारी बनाया, लेकिन इस पर संगठन में काफी असंतोष व्याप्त है। सूत्रों के मुताबिक, ऐसे-ऐसे लोगों को दायित्व सौंप दिए गए, जिनका भाजपा से पूर्व में कोई लेना-देना भी नहीं रहा है। पार्टी के कार्यकर्ताओं को इस बात पर नाराजगी है कि 20-20 साल से सेवा करने वालों को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री ने अपनी मनमर्जी से दायित्व बांट दिए।
गैरसैंण में लाठीचार्ज से भी उपजा आक्रोश
गैरसैंण में विधानसभा बजट सत्र के पहले ही दिन एक मार्च 2021 को हुए लाठीचार्ज ने एक और विवाद पैदा कर दिया। डेढ़ लेन सड़क निर्माण की मांग को लेकर सत्र के पहले ही दिन कांग्रेस और यूकेडी के कार्यकर्ता विधानसभा कूच कर रहे थे। इस कूच में घाट क्षेत्र के करीब चार हजार लोग शामिल थे। पुलिस ने उन्हें पहले ही रोक लिया। धक्का मुक्की हुई इसके बाद पुलिस ने जमकर लाठियां भांज दीं।
शाम होते-होते यह घटना पूरे प्रदेश में चर्चाओं में आ गई। न केवल आंदोलनकारी संगठन बल्कि आम जनता भी इस पर सरकार की आलोचना करने लगी। शाम को मुख्यमंत्री ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए। आदेश तो हो गए लेकिन घाट क्षेत्र के लोगों का जख्म अभी भी ताजा है। इससे त्रिवेंद्र के खिलाफ पार्टी आलाकमान तक नकारात्मक माहौल बन गया।
गैरसैंण मंडल से फैला कुमाऊं में असंतोष
मुख्यमंत्री ने विधानसभा सत्र के दौरान गैरसैंण मंडल बनाने की चौंकने वाली घोषणा की। इसमें गढ़वाल मंडल से रुद्रप्रयाग और चमोली जबकि कुमाऊं मंडल से अल्मोड़ा और बागेश्वर को शामिल किया गया लेकिन इस पर कुमाऊं मंडल में भारी असंतोष पनप गया। खासकर अल्मोड़ा और बागेश्वर के लोगों ने इसका विरोध किया। जनता की आवाज पर विधायक भी अंदरखाने मुख्यमंत्री के इस फैसले से विरोध में खड़े हो गए। उधर, मुख्यमंत्री के इस फैसले पर मंत्री, कोर कमेटी में भी सवाल खड़े हुए। उनका कहना था कि सूबे से जुड़ा इतना बड़ा फैसला लेने से पहले मुख्यमंत्री ने किसी से चर्चा तक नहीं की। इससे त्रिवेंद्र को काफी नुकसान हुआ।