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थकने लगे हैं मंत्रिमंडल में जगह पाने के दावेदार

अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 29 Jun 2015 12:13 PM IST
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फेरबदल कराकर उत्तराखंड कैबिनेट में बर्थ पाने में जुटे दावेदार अब थकावट महसूस करने लगे हैं। थकान भी ऐसी कि अब उम्मीदों के मील खत्म होते नहीं दिखते।
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अब तो खुद दावेदार भी कहने लगे है कि जल्द ही कुछ ना हुआ तो फिर कुछ होना नहीं होना बराबर रहेगा। क्योंकि चुनाव में मात्र डेढ़ वर्ष शेष है। लेकिन ऐसी स्थिति दिग्गज कांग्रेसियों को भीतर ही भीतर खाए जा रही है। क्योंकि घड़ी की र्सुई लगातार घूम रही है।


रिक्त एक पद पर भी किसी को मंत्री बनाना बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा ही है। शायद इन सारी परिस्थितियों से वाकिफ हरीश रावत नब्बे के दशक में केंद्र में रही नरसिंह राव सरकार के नो डिसिजन इस द बेस्ट डिसिजन के फार्मूले पर आगे बढ़ रहे है।

राज्य मंत्रिमंडल में फेरबदल कराकर अपने विधायकों को शामिल कर कांग्रेस की हिस्सेदारी बढ़ाने का अभ्यास निर्रथक साबित हो रहा है। क्योंकि तमाम कवायद व दिल्ली दौड़ के बावजूद अब सुगबुगाहट भी नहीं है। यही वजह है कि पिछले एक साल से मंत्रिमंडल में बदलाव को लेकर लगाई जा रही अटकलें और दावेदारों की मुहिम में थकावट नजर आने लगी है।

दावेदार भी मानने लगे है कि यदि एकाध महीने में कुछ नहीं हुआ तो फिर कोई फायदा नहीं। पूर्व सीएम विजय बहुगुणा खुद कह चुके है कि जब मुख्यमंत्री बदल सकता है तो मंत्री क्यों नहीं बदल सकते। बहुगुणा कैंप सोनिया गांधी के सामने मंत्रिमंडल में बदलाव का दबाव भी डाल चुका है लेकिन कांग्रेस में दूसरा शक्ति केंद्र इस अभियान को ठंड़ा कर देता है।

कैबिनेट के मजबूत दावेदारों में शैलेंद्र मोहन सिंघल, सुबोध उनियाल, नवप्रभात, मुसलिम होने के नाते फुरकान अहमद, हरीश रावत के कट्टर समर्थक रहे मयूख महर, उत्तरकाशी से विजयपाल सजवाण समेत कई नाम शामिल हैं। लेकिन किसी एक को भी बनाने से सारे समीकरण बदलेंगे और स्थिति संभालना मुश्किल भी हो सकता है।

सुरेंद्र राकेश के निधन से रिक्त हुई कैबिनेट की एक सीट पर यदि उनकी पत्नी ममता राकेश को जगह नहीं मिली और किसी अन्य कांग्रेसी को मंत्री बनाया गया तो हरिद्वार में दलित वोटों के बसपा में शिफ्ट होने की संभावना रहेगी।

अगर बदलाव होता भी है और किसी मुसलिम को कैबिनेट में नहीं लिया गया तो कांग्रेस का यह परम्परागत वोट बैंक भी खिसक सकता है। इसलिए कोई निर्णय नहीं लेना ही इस समय अच्छा निर्णय समझा जा रहा है।
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