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ग्लेशियर, नदियां, झरने खुलकर लेंगे सांस

Sun, 09 Apr 2017 11:59 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 09 Apr 2017 11:59 AM IST
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uttarakhand administration will work for glacier, river and waterfall
glacier broken behind gaukumkh - फोटो : file photo

उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश के बाद ग्लेशियर, नदियां और झरने अब खुलकर सांस ले सकेंगे। प्रदेश शासन के साथ अब विज्ञानी भी पूरी तैयारी में जुट गए हैं।

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इसमें दिलचस्प यह है कि ग्लेशियरों, नदियों और झरनों को सहेजने के नुस्खे वैज्ञानिक शोधों से अधिक देश के प्राचीनतम ग्रंथों में मिल रहे हैं। मानव सभ्यता और ग्लेशियर, नदियों, झरनों के सह अस्तित्व के ये प्रावधान पुराने ग्रंथों में विस्तार से उपलब्ध हैं। अब दुनिया के विज्ञानी इन्हें अपनी कार्ययोजना में शामिल कर रहे हैं।
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नैनीताल हाईकोर्ट का ग्लेशियरों, नदियों और झरनों को जीवित व्यक्ति की संज्ञा देना विश्व विज्ञानियों को नई दिशा दे रहा है। सीएफसी-2017 में आए विश्व वैज्ञानियों ने इस संज्ञा को गंभीरता से लिया है। हो सकता है कि अगले साल लंदन की बैठक में कॉमनवेल्थ की सरकारें बाकायदा इस अवधारणा को अपने एक्शन प्लान में शामिल करें।
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सालों से इस दिशा में काम कर रहे हिमनद विज्ञानियों की इस आदेश से मुराद पूरी हुई है। ग्लेशियरों में फैली गंदगी के संबंध में वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान का हिमनद केंद्र एनजीटी को भी अवगत करा चुका है।


नदियों के सहेजने के संबंध में अब कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन किया जा रहा है। वाडिया के निदेशक डॉ. एके गुप्ता  ने बताया कि अर्थशास्त्र में नदियों में मूत्र त्यागने पर 70 स्वर्ण पण अर्थ दंड का प्रावधान रहा है। डॉ. गुप्ता का कहना है कि सरकारों की कार्ययोजना आने पर काम शुरू होगा।

प्राचीन ग्रंथों में नदियों और झरनों को मां, बहन सरीखे मानव रिश्तों का नाम दिया गया है। हिमनद केंद्र के विज्ञानी डॉ. समीर तिवारी का कहना है कि गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपर से तपोवन जाने के रास्ते से गंदगी फैल रही है। लोग ग्लेशियर क्लाइंबिंग करते हैं, इसके बीच से होकर जाते हैं। इससे माइक्रो क्लाइमेट बदल रहा है। इस संबंध में कई बार रोक के लिए कहा जा चुका है, लेकिन अब इस पर प्रतिबंध लगेगा।

ग्लेशियर, नदियां सहेजना इसलिए जरूरी
- विश्व में 97 फीसदी पानी खारा
- 3 फीसदी पानी साफ पीने लायक
- इसमें 2.75 फीसदी ग्लेशियरों में जमा
- .25 फीसदी पानी ही पीने के लिए उपलब्ध

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