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उत्तराखंड में दो सौ योजनाओं के अटकने के आसार, खत्म हुई विशेष छूट

Tue, 01 Jan 2019 09:34 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला, हल्द्वानी
विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला, हल्द्वानी Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Tue, 01 Jan 2019 09:34 AM IST
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Two hundred schemes in Uttarakhand likely to get stuck
forest - फोटो : डेमो

प्रदेश में वन भूमि हस्तांतरण को लेकर विशेष छूट खत्म होने से हर साल करीब दो सौ योजनाओं के अटकने के आसार है। अगर राज्य स्तर पर एक हेक्टेयर तक वन भूमि हस्तांतरण के प्रस्तावों को हरी झंडी देने का अधिकार नहीं मिलता है, तो पुल, स्कूल, अस्पताल जैसी छोटी योजनाओं के लिए वन भूमि प्राप्त करने के लिए केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के चक्कर लगना तय है।

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वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने करीब नौ साल पहले राज्य सरकार को एक हेक्टेयर तक की वन भूमि हस्तांतरण की अनुमति देने का अधिकार दे दिया था। 2013 में जब आपदा आई, तो पुनर्निर्माण के कामों में तेजी लाने के लिए केंद्र सरकार ने 2014 में राज्य सरकार को पांच हेक्टेयर तक वन भूमि हस्तांतरण का अधिकार प्रदान किया। पांच हेक्टेयर की अनुमति 2016 में खत्म हो चुकी है। हेक्टेयर तक की वन भूमि हस्तांतरण का अधिकार भी सोमवार को खत्म हो गया है। वनाधिकारियों के अनुसार हर साल एक हेक्टेयर तक वन भूमि हस्तांतरण वाले करीब 175 प्रस्ताव आते हैं।
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इसमें अधिकतर पुल, सरकारी स्कूल, अस्पताल, ट्रांसमिशन लाइन, पुलिस चौकी, पेयजल योजना, छोटी सड़क आदि शामिल हैं। अनुमति होने से इन योजनाओं के लिए तुलनात्मक तौर कम समय में वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हो जाती थी। अब विशेष अनुमति खत्म होने से इनका प्रस्ताव भी बड़ी योजनाओं केंद्र सरकार को भेजना होगा। बता दें कि राज्य को एक हेक्टेयर तक वनभूमि हस्तांतरण करने का अधिकार था वह 31 दिसंबर को खत्म हो गया है। 
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कई और भी मिलती सुविधा
वन भूमि हस्तांतरण से जुड़े अधिकारियों के अनुसार एक हेक्टेयर तक वन भूमि हस्तांतरण के प्रस्ताव में कई तरह की सुविधा थी। इसमें क्षतिपूरक वनीकरण की शर्त पूरी नहीं करनी होती है। जितनी वन भूमि विकास कार्यों के लिए दी जाती है, उसके बदले दोगुनी जमीन को आरक्षित वन भूमि घोषित करने की शर्त से छूट रहती है। केवल प्रयोक्ता एजेंसी को वन भूमि की नेट प्रजेंट वैल्यू (एनपीवी) जमा करना होता है।

रामनगर में कई मोटर मार्ग निर्माण कार्यों पर विलंब का खतरा

राज्य को केंद्र से मिले एक हेक्टेयर तक की वन भूमि हस्तांतरण का अधिकार नए साल से छिन रहा है। इस कारण वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया और जटिल हो जाएगी। इस कारण रामनगर में विकास की रफ्तार धीमी होने का खतरा है जबकि तमाम ग्रामीण मोटर कार्यों के निर्माण समेत वनाधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।
 
इन विकास कार्यों के लिए बढ़ेगी परेशानी
- काशीपुर-बुआखाल एनएच 121 का चौड़ीकरण, पुल निर्माण
- लालढांग-कालागढ़-कोटद्वार कंडी मार्ग
- क्यारी-पवलगढ़ मोटर मार्ग 
- भंडारपानी-सीतावनी-पवलगढ़ मोटर मार्ग 
- पाटकोट-रामपुर-कोटाबाग मोटर मार्ग
- मालधनचौड़ से पतरामपुर मोटर मार्ग
- ढेला-पटरानी-तुमड़िया डाम
- ढेला-फांटो-पतरामपुर मोटर मार्ग
- पूछड़ी से भगवाबंगर, कालूसिद्ध मंदिर मार्ग 
- पाटकोट-बमनगांव से सानणा मोटर मार्ग पर 
- अमोठा से रियाड़ मोटर मार्ग
- कोसी नदी पर भरतपुरी, कौशल्यापुरी का तटबंध
- वनग्रामों में स्कूल भवन, बिजली, पेयजल, शौचालय आदि योजनाएं

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