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विलुप्त होने की कगार पर हैं परंपरागत बीज
बिशन सिंह बोरा/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 16 Oct 2015 12:02 PM IST
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कृषि प्रधान देश में किसानों को दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। सरकार की उदासीनता और संसाधनों के अभाव से जूझ रहे किसान को नित नई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अब किसान के सामने संकट अपने परंपरागत बीजों को बचाने का है।
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दरअसल, पूरे देश में ही परंपरागत बीज संकटग्रस्त हैं, लेकिन उत्तराखंड में यह समस्या और गहरा गई है। कई पहाड़ी बीज विलुप्त होने की कगार पर हैं तो चीन और अमेरिका से आने वाले बीज किसान की बाजार पर निर्भरता बढ़ा रहे हैं। क्योंकि, विदेशों से आने वाले जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज सिर्फ एक सीजन ही उपयोग में लाए जा सकते हैं। चीन का अदरक व लहसुन पहाड़ में देशी किस्म पर भारी पड़ रहा है।
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उधर, केंद्र सरकार अब सरसों के जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज ‘मोनसेंटो’ को अनुमति देने जा रही है। जानकार बताते हैं, इस बीज के भारत में आने से न सिर्फ यहां का परंपरागत बीज नष्ट होगा, बल्कि इससे पैदावार और उत्पाद की गुणवत्ता में भी फर्क पड़ोगा। प्रसिद्ध पर्यावरणविद डॉ. वंदना शिवा ने बताया कि इस बीज से पहाड़ों के परंपरागत बीज को तो खतरा है ही, यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।
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देसी बीजों पर आए संकट के कारण
संग्रह के परंपरागत तौर तरीके भूल जाना, कम उत्पादन, ज्यादा लागत, हाईब्रिड बीजों की धमक और सबसे अहम जिम्मेदारों की उदासीनता।
विलुप्त होने की कगार पर पहुंची प्रजातियां
चीणा : गेहूं और धान की फसल के बीच के समय में इसकी फसल ली जाती है, इसका भात बनता है।
कोणी : यह मेडिसिन प्लांट है, इसका भात बनाया जाता है।
झंगोरा : पहाड़ में इसकी खीर प्रसिद्ध है, सरकार पिछले कुछ समय से इसे बढ़ावा दे रही है।
बथुआ : सर्दियों में पहाड़ों में इसका सूप इस्तेमाल में लाते रहे हैं।
मंडुआ : इसकी रोटी बनती है, सरकार इसकी खेती को बढ़ावा दे रही है।
जीएम सरसों एवं अन्य हाईब्रिड बीजों से मल्टीनेशनल कंपनियों को तो फायदा हो रहा है, लेकिन यह स्वास्थ्य के लिहाज से अच्छे नहीं हैं। इससे राज्य की परंपरागत कृषि भी प्रभावित होगी।
- डॉ. विनोद कुमार भट्ट, कार्यकारी निदेशक, नवधान्य