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सब रजिस्ट्रार कार्यालय गड़बड़ी मामला:: तो साजिशन चोरी हुआ दस्तावेजी इंडेक्स रजिस्टर
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सब रजिस्ट्रार प्रथम कार्यालय से गायब रिकॉर्डों में वहां का दस्तावेजी इंडेक्स रजिस्टर है। इसमें वर्ष 1959 से 2006 तक के क्रेता-विक्रेताओं की सूची समेत कई जानकारियां थीं। मामला 10 साल बाद एक शिकायत पर दोबारा उठा है तो इसमें उस वक्त की एक बड़ी साजिश का भी अंदेशा लगाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि दून में जमीन से जुड़ी धोखाधड़ी के ज्यादातर मामले इसी दरम्यान हुए हैं।
भूमि की खरीद-फरोख्त के बाद पंजीकरण का एक रजिस्टर तैयार होता है। रजिस्टर नंबर आठ के नाम से इस रजिस्टर को जाना जाता है। इसमें खरीददार-विक्रेता, भूमि की नाप, सर्किल रेट, स्टांप आदि की जानकारी होती है। पंजीकृत दस्तावेजों के साथ-साथ इस रजिस्टर को भी संभालकर रखा जाता है ताकि वक्त आने पर संबंधित भूमि या मालिक आदि के बारे में जानकारी जुटाई जा सके। ऐसे में यदि यह रजिस्टर गायब हुआ या चोरी हुआ है तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इसे चोरी करने के पीछे किसी की क्या मंशा रही होगी? चोरी करने वाले को इससे क्या लाभ पहुंचा होगा?
सूत्रों का कहना है कि वर्ष 2009 में इस रजिस्टर को साजिश के तहत चुराया गया होगा। ताकि, सब रजिस्ट्रार कार्यालय में पुराने दस्तावेजों की तस्दीक न हो सके। हालांकि, पंजीकृत दस्तावेज वहां उपस्थित होते हैं, लेकिन बिना रजिस्टर नंबर आठ के लाखों की संख्या में इन्हें खंगालना टेढ़ी खीर होता है। अधिकारियों के मुताबिक इस मामले में 10 साल पहले शिकायत हुई थी, लेकिन अब तक इस शिकायत का क्या हुआ यह किसी को जानकारी नहीं है?
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इसी अवधि के हैं ज्यादातर धोखाधड़ी के मामले
राजधानी में प्रतिदिन आने वाले धोखाधड़ी के मामले इन्हीं 47 सालों के दरम्यान के बताए जाते हैं। जिलाधिकारी सी रविशंकर ने बताया कि उनके पास इसी अवधि की शिकायतें बार बार आ रही हैं। ऐसे में जांच होने पर यह मामला बड़ा हो सकता है। अभी तक यह भी जानकारी नहीं है कि उस वक्त की शिकायत पर किसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई है।
नष्ट हो जाते हैं फिंगर प्रिंट्स
जिस व्यक्ति की शिकायत पर जिलाधिकारी ने जांच के आदेश दिए हैं, उस मामले में फिंगर प्रिंट्स रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए हैं। मामला वर्ष 1987 का है। उस वक्त दस्तावेजों पर उंगलियों के निशान लिए जाते थे। नियमों के तहत 20 साल के अंतराल पर एक फोरेंसिक रिकॉर्ड के लिए रखे जाने वाले ये दस्तावेज नष्ट कर दिए जाते हैं। लिहाजा, शिकायतकर्ता की यह शिकायत कि दस्तावेज जलाए गए हैं निराधार साबित हुई है।
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भूमि की खरीद-फरोख्त के बाद पंजीकरण का एक रजिस्टर तैयार होता है। रजिस्टर नंबर आठ के नाम से इस रजिस्टर को जाना जाता है। इसमें खरीददार-विक्रेता, भूमि की नाप, सर्किल रेट, स्टांप आदि की जानकारी होती है। पंजीकृत दस्तावेजों के साथ-साथ इस रजिस्टर को भी संभालकर रखा जाता है ताकि वक्त आने पर संबंधित भूमि या मालिक आदि के बारे में जानकारी जुटाई जा सके। ऐसे में यदि यह रजिस्टर गायब हुआ या चोरी हुआ है तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इसे चोरी करने के पीछे किसी की क्या मंशा रही होगी? चोरी करने वाले को इससे क्या लाभ पहुंचा होगा?
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सूत्रों का कहना है कि वर्ष 2009 में इस रजिस्टर को साजिश के तहत चुराया गया होगा। ताकि, सब रजिस्ट्रार कार्यालय में पुराने दस्तावेजों की तस्दीक न हो सके। हालांकि, पंजीकृत दस्तावेज वहां उपस्थित होते हैं, लेकिन बिना रजिस्टर नंबर आठ के लाखों की संख्या में इन्हें खंगालना टेढ़ी खीर होता है। अधिकारियों के मुताबिक इस मामले में 10 साल पहले शिकायत हुई थी, लेकिन अब तक इस शिकायत का क्या हुआ यह किसी को जानकारी नहीं है?
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इसी अवधि के हैं ज्यादातर धोखाधड़ी के मामले
राजधानी में प्रतिदिन आने वाले धोखाधड़ी के मामले इन्हीं 47 सालों के दरम्यान के बताए जाते हैं। जिलाधिकारी सी रविशंकर ने बताया कि उनके पास इसी अवधि की शिकायतें बार बार आ रही हैं। ऐसे में जांच होने पर यह मामला बड़ा हो सकता है। अभी तक यह भी जानकारी नहीं है कि उस वक्त की शिकायत पर किसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई है।
नष्ट हो जाते हैं फिंगर प्रिंट्स
जिस व्यक्ति की शिकायत पर जिलाधिकारी ने जांच के आदेश दिए हैं, उस मामले में फिंगर प्रिंट्स रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए हैं। मामला वर्ष 1987 का है। उस वक्त दस्तावेजों पर उंगलियों के निशान लिए जाते थे। नियमों के तहत 20 साल के अंतराल पर एक फोरेंसिक रिकॉर्ड के लिए रखे जाने वाले ये दस्तावेज नष्ट कर दिए जाते हैं। लिहाजा, शिकायतकर्ता की यह शिकायत कि दस्तावेज जलाए गए हैं निराधार साबित हुई है।