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इनकी कार नहीं बेकार, स्वच्छ शहर का सपना करेंगे साकार
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हरिद्वार शहर की सफाई कर कूड़ा अपनी कार में ले जाते नरेश गिरी ।
- फोटो : HARIDWAR
आपने अपने शहर में ऐसे बहुत से लोगों को देखा होगा जो अपने का घर का कूड़ा लेकर कार से निकलते हैं और जहां कहीं भी सड़क के किनारे उसको फेंककर चलते बनते हैं। इन लोगों को इससे कोई मतलब नहीं होता है कि वह कूड़ा सड़क पर गिरा या फिर नाली में। इसके ठीक उल्ट धर्मनगरी हरिद्वार के नरेश गिरी एक ऐसे शख्स हैं जो गंगा घाटों से लेकर वार्डों में जगह-जगह फैले प्लास्टिक और कूड़े को उठाते हैं। कूड़े को एकत्र कर अपनी कार में रखते हैं और फिर उसे डस्टबिन में डालते हैं। इतना ही नहीं नरेश गिरी नालियों की सफाई तक करते हैं। शहर को गंदगी मुक्त बनाने के जुनून को उन्होंने अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया है। मकसद भी अमर उजाला की खबर से प्रेरित होकर मिला है।
आज हर निकाय क्षेत्र में घर-घर से कूड़ा उठाने की व्यवस्था है। इसके बाद भी बहुत से कोठी बंगले वाले निकाय के कूड़ा वाहनों में अपने घर का कूड़ा डालने से बचते हैं। हर महीने हजारों रुपये तेल पर फूंकने वाले ऐसे लोग शायद महीनेभर में सौ रुपये नहीं देना चाहते। अपनी कार से घर से निकलेंगे तो उसमें थैले में भरकर कूड़ा रखते हैं। घर से कुछ दूरी पर ही जहां जरा सुनसान इलाका दिखता है तो कूड़े के थैले को फेंक देते हैं। कई बार ऐसे लोग कूड़ादान के पास कार की गति धीमी करके कूड़ा फेंक देते हैं। इनको इससे कोई मतलब नहीं होता कि कूड़े का थैला कूड़ादान के अंदर गिरा या नहीं। ऐसी जगह पर यह लोग कार से उतरना अपनी तौहीन मानते हैं। अब जरा भूपतवाला निवासी 53 वर्षीय नरेश गिरी की कहानी सुनिए।
नरेश गिरी की सफाई योद्धा बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। बात 2012 नवंबर की है। उस समय राम रहीम और उनके अनुयायियों ने हरिद्वार में सफाई अभियान चलाया। इतना कूड़ा एकत्र हो गया कि नगर निगम उसे उठाकर ट्रंचिंग ग्राउंड तक नहीं पहुंचा पाया। हर जगह कूड़े के ढेर लग गए। नालों से निकाली गई गंदगी सड़कों पर फैलने लगी। इससे आवाजाही में परेशानी होने लगी। उस समय अमर उजाला ने ‘काश! कूड़ा उठाने भी कोई आ जाए’ शीर्षक से आठ नवंबर के अंक में खबर प्रकाशित की थी। खबर पढ़कर भूपतवाला के नरेश गिरी खुद को नहीं रोक पाए। उनको महसूस हुआ अखबार ने शहर को साफ सुथरा बनाने के लिए उनको जिंदगी का मकसद दे दिया।
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इससे पहले तक वह ट्रेवल एजेंसी चलाते थे। कूड़ा उठवाने के लिए वाहन ढूंढे लेकिन नाकाम रहे। कूड़ा उठाने की बात सुनकर ही वाहन चालक नाक-मुंह सिकोड़ने लगे। आखिर में नरेश गिरी ने अपनी मारुति 800 को ही कूड़ा गाड़ी में बदल दिया। घर में रखे ड्रम को काटकर दो हिस्से बना लिए। कार की पिछली सीट उतारकर उसमें ड्रमों को रखने की जगह बना ली। नरेश गिरी कार से कूड़ा ढोकर ट्रंचिंग ग्राउंड तक फेंकने लगे। इसके लिए दिहाड़ी पर एक मजदूर भी रखा। उनको ऐसा करते देख परिवार के लोग काफी नाराज भी हुए और आसपास के लोग तंज कसने लगे।
नरेश गिरी के दो बेटे और पत्नी हैं। बेटा सागर गिरी एसबीआई तो दूसरा आकाश गिरी यूपी प्रथमा ग्रामीण बैंक में अधिकारी हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा और लोगों के ताने सुनकर बेटों ने नरेश गिरी को काफी समझाया लेकिन नरेश गिरी ने कूड़ा उठाना नहीं छोड़ा। आखिर में परिवार ने रिश्तेदारों को बुलाया ताकि वह उन्हें समझा सकें। नरेश गिरी परिवार और रिश्तेदारों की बातों से इतने आहत हुए कि परिवार से अलग होने का मन बना लिया। नरेश गिरी की जिद और जुनून के आगे परिवार भी हार गया। बेटों ने उन्हें टोकना बंद कर दिया। नरेश गिरी की 2012 से अब तक शहर को गंदगी मुक्त बनाने के लिए मुहिम जारी है।
नरेश गिरी ‘नया सवेरा लाएंगे, शहर को स्वच्छ बनाएंगे’ स्लोगन के साथ अपनी कार से सप्ताह में पांच दिन घर से कूड़ा एकत्र करने निकलते हैं। गंगा घाटों से लेकर शहर में जगह-जगह फैले कूड़े और प्लास्टिक को उठाते हैं। कार में रखे एक डिब्बे में गीला तो दूसरे में सूखा कूड़ा भरते हैं। कूड़े को नजदीकी बड़े डस्टबिनों में डालते हैं। हर रोज 12 डिब्बे कूड़ा उठाकर डस्टबिनों तक पहुंचाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान शुरू किए जाने से नरेश गिरी का मनोबल बढ़ा। शहर के अधिकतर लोग अब नरेश गिरी को पहचानते और सम्मान देते हैं।
नरेश के बेटे सागर और आकाश का कहना है कि पिता को शहर को साफ-सुथरा बनाने का जुनून है। शुरुआती दिनों में हमें अच्छा नहीं लगा। उनके इस जुनून से काफी कुछ सीखने को मिला।
नरेश गिरी का कार्य सराहनीय है। एक दशक से शहर को गंदगी मुक्त बनाने में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं। कई बार फोन कर या मुलाकात कर सुझाव भी देते हैं। नगर निगम की ओर से नरेश गिरी को सम्मानित किया जाएगा। उनको निगम का ब्रांड एंबेसडर बनाने का बोर्ड में प्रस्ताव भी लाया जाएगा।
- अनीता शर्मा, मेयर
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आज हर निकाय क्षेत्र में घर-घर से कूड़ा उठाने की व्यवस्था है। इसके बाद भी बहुत से कोठी बंगले वाले निकाय के कूड़ा वाहनों में अपने घर का कूड़ा डालने से बचते हैं। हर महीने हजारों रुपये तेल पर फूंकने वाले ऐसे लोग शायद महीनेभर में सौ रुपये नहीं देना चाहते। अपनी कार से घर से निकलेंगे तो उसमें थैले में भरकर कूड़ा रखते हैं। घर से कुछ दूरी पर ही जहां जरा सुनसान इलाका दिखता है तो कूड़े के थैले को फेंक देते हैं। कई बार ऐसे लोग कूड़ादान के पास कार की गति धीमी करके कूड़ा फेंक देते हैं। इनको इससे कोई मतलब नहीं होता कि कूड़े का थैला कूड़ादान के अंदर गिरा या नहीं। ऐसी जगह पर यह लोग कार से उतरना अपनी तौहीन मानते हैं। अब जरा भूपतवाला निवासी 53 वर्षीय नरेश गिरी की कहानी सुनिए।
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नरेश गिरी की सफाई योद्धा बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। बात 2012 नवंबर की है। उस समय राम रहीम और उनके अनुयायियों ने हरिद्वार में सफाई अभियान चलाया। इतना कूड़ा एकत्र हो गया कि नगर निगम उसे उठाकर ट्रंचिंग ग्राउंड तक नहीं पहुंचा पाया। हर जगह कूड़े के ढेर लग गए। नालों से निकाली गई गंदगी सड़कों पर फैलने लगी। इससे आवाजाही में परेशानी होने लगी। उस समय अमर उजाला ने ‘काश! कूड़ा उठाने भी कोई आ जाए’ शीर्षक से आठ नवंबर के अंक में खबर प्रकाशित की थी। खबर पढ़कर भूपतवाला के नरेश गिरी खुद को नहीं रोक पाए। उनको महसूस हुआ अखबार ने शहर को साफ सुथरा बनाने के लिए उनको जिंदगी का मकसद दे दिया।
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इससे पहले तक वह ट्रेवल एजेंसी चलाते थे। कूड़ा उठवाने के लिए वाहन ढूंढे लेकिन नाकाम रहे। कूड़ा उठाने की बात सुनकर ही वाहन चालक नाक-मुंह सिकोड़ने लगे। आखिर में नरेश गिरी ने अपनी मारुति 800 को ही कूड़ा गाड़ी में बदल दिया। घर में रखे ड्रम को काटकर दो हिस्से बना लिए। कार की पिछली सीट उतारकर उसमें ड्रमों को रखने की जगह बना ली। नरेश गिरी कार से कूड़ा ढोकर ट्रंचिंग ग्राउंड तक फेंकने लगे। इसके लिए दिहाड़ी पर एक मजदूर भी रखा। उनको ऐसा करते देख परिवार के लोग काफी नाराज भी हुए और आसपास के लोग तंज कसने लगे।
नरेश गिरी के दो बेटे और पत्नी हैं। बेटा सागर गिरी एसबीआई तो दूसरा आकाश गिरी यूपी प्रथमा ग्रामीण बैंक में अधिकारी हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा और लोगों के ताने सुनकर बेटों ने नरेश गिरी को काफी समझाया लेकिन नरेश गिरी ने कूड़ा उठाना नहीं छोड़ा। आखिर में परिवार ने रिश्तेदारों को बुलाया ताकि वह उन्हें समझा सकें। नरेश गिरी परिवार और रिश्तेदारों की बातों से इतने आहत हुए कि परिवार से अलग होने का मन बना लिया। नरेश गिरी की जिद और जुनून के आगे परिवार भी हार गया। बेटों ने उन्हें टोकना बंद कर दिया। नरेश गिरी की 2012 से अब तक शहर को गंदगी मुक्त बनाने के लिए मुहिम जारी है।
नरेश गिरी ‘नया सवेरा लाएंगे, शहर को स्वच्छ बनाएंगे’ स्लोगन के साथ अपनी कार से सप्ताह में पांच दिन घर से कूड़ा एकत्र करने निकलते हैं। गंगा घाटों से लेकर शहर में जगह-जगह फैले कूड़े और प्लास्टिक को उठाते हैं। कार में रखे एक डिब्बे में गीला तो दूसरे में सूखा कूड़ा भरते हैं। कूड़े को नजदीकी बड़े डस्टबिनों में डालते हैं। हर रोज 12 डिब्बे कूड़ा उठाकर डस्टबिनों तक पहुंचाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान शुरू किए जाने से नरेश गिरी का मनोबल बढ़ा। शहर के अधिकतर लोग अब नरेश गिरी को पहचानते और सम्मान देते हैं।
नरेश के बेटे सागर और आकाश का कहना है कि पिता को शहर को साफ-सुथरा बनाने का जुनून है। शुरुआती दिनों में हमें अच्छा नहीं लगा। उनके इस जुनून से काफी कुछ सीखने को मिला।
नरेश गिरी का कार्य सराहनीय है। एक दशक से शहर को गंदगी मुक्त बनाने में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं। कई बार फोन कर या मुलाकात कर सुझाव भी देते हैं। नगर निगम की ओर से नरेश गिरी को सम्मानित किया जाएगा। उनको निगम का ब्रांड एंबेसडर बनाने का बोर्ड में प्रस्ताव भी लाया जाएगा।
- अनीता शर्मा, मेयर