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Dehradun News: राजमा में दिखाई दे रहे जड़ सड़न रोग के लक्षण, पत्ते पड़ रहे पीले
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कृषि वैज्ञानिकों ने दी छिड़काव और निराई गुड़ाई की सलाह
जनजातीय क्षेत्र में करीब 500-600 हेक्टेयर में की जाती है खेती
रोग की चपेट में आकर सूख जाती है जड़
बारिश के कारण मिट्टी में बढ़ी नमी से जौनसार बावर क्षेत्र में उगाई जाने वाले राजमा में जड़ सड़न रोग के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इसमें पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे जड़ सूख जाती है और पौधा मर जाता है। कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के वैज्ञानिकों ने किसानों को छिड़काव के साथ ही निराई गुड़ाई की सलाह दी है।
राजमा जनजातीय क्षेत्र की प्रमुख नकदी फसल है। यह चकराता की राजमा के नाम से जानी जाती है। इसकी बाजार में भारी डिमांड है। किसानों को इसके बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं, लेकिन प्रारंभिक दौर में फसल में जड़ सड़न रोग के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. एके शर्मा ने बताया कि जनजातीय क्षेत्र में करीब 500-600 हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है। यह फसल किसानों की आर्थिकी की रीढ़ मानी जाती है।
आम तौर पर जून और जुलाई माह में इसकी बुआई की जाती है। अक्टूबर नवंबर में फसल तैयार हो जाती है। वर्तमान में पौधा दो पत्ती स्टेज में है। इस समय ही जड़ सड़न रोग सबसे ज्यादा फसल को प्रभावित करता है। बारिश के चलते मिट्टी में बढ़ी नमी के कारण संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि पौधे के बढ़ने और तापमान कम होने से पौधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। जिस कारण रोग का प्रकोप स्वत: ही कम हो जाता है।
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उन्होंने बताया कि कार्बन डाई जीन की दो ग्राम मात्रा एक लीटर पानी के अनुपात में मिलाकर छिड़काव करने से रोग का प्रभाव कम होता है। निराई गुड़ाई करने से भी मिट्टी की नमी कम होती है। यह भी एक प्रभावी तरीका है।
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जनजातीय क्षेत्र में करीब 500-600 हेक्टेयर में की जाती है खेती
रोग की चपेट में आकर सूख जाती है जड़
बारिश के कारण मिट्टी में बढ़ी नमी से जौनसार बावर क्षेत्र में उगाई जाने वाले राजमा में जड़ सड़न रोग के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इसमें पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे जड़ सूख जाती है और पौधा मर जाता है। कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के वैज्ञानिकों ने किसानों को छिड़काव के साथ ही निराई गुड़ाई की सलाह दी है।
राजमा जनजातीय क्षेत्र की प्रमुख नकदी फसल है। यह चकराता की राजमा के नाम से जानी जाती है। इसकी बाजार में भारी डिमांड है। किसानों को इसके बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं, लेकिन प्रारंभिक दौर में फसल में जड़ सड़न रोग के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. एके शर्मा ने बताया कि जनजातीय क्षेत्र में करीब 500-600 हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है। यह फसल किसानों की आर्थिकी की रीढ़ मानी जाती है।
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आम तौर पर जून और जुलाई माह में इसकी बुआई की जाती है। अक्टूबर नवंबर में फसल तैयार हो जाती है। वर्तमान में पौधा दो पत्ती स्टेज में है। इस समय ही जड़ सड़न रोग सबसे ज्यादा फसल को प्रभावित करता है। बारिश के चलते मिट्टी में बढ़ी नमी के कारण संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि पौधे के बढ़ने और तापमान कम होने से पौधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। जिस कारण रोग का प्रकोप स्वत: ही कम हो जाता है।
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उन्होंने बताया कि कार्बन डाई जीन की दो ग्राम मात्रा एक लीटर पानी के अनुपात में मिलाकर छिड़काव करने से रोग का प्रभाव कम होता है। निराई गुड़ाई करने से भी मिट्टी की नमी कम होती है। यह भी एक प्रभावी तरीका है।