...जब बरनाला ने जीत लिया उत्तराखंड के लोगों का दिल
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उत्तराखंड के पहले राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला के निधन से प्रदेश में शोक की लहर है। नौ नवंबर 2000 से सात जनवरी 2003 तक के अपने कार्यकाल में उन्होंने प्रदेश में गहरी छाप छोड़ी।
चाहे ऋषिकेश से हेमकुंड साहिब तक लंगर लगाने की अनुमति देने का फैसला रहा हो चाहे नए बने राज्य में उच्च शिक्षा का माहौल मजबूत बनाने का हो। हर मामले में उनके फैसले ने प्रदेश को मजबूती देने का कार्य किया।
विधानसभा के पूर्व सचिव महेश चंद्र तत्कालीन राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला को याद कर कहते हैं कि राज्यपाल के तौर पर उनका कार्यकाल बेहद प्रभावी रहा। संविधान का गहरा जानकार होने के साथ ही वे संवैधानिक विषयों पर गहन विमर्श करते थे। वे बेहद जिज्ञासु और सकारात्मक सोच के थे। कई मर्तबा उनसे संवैधानिक व अन्य विधायी विषयों पर चर्चा होती थी। विद्वान होने के बावजूद उनमें तनिक भी अहंकार नहीं था।
छोटे कार्यक्रमों में भी शिरकत से नहीं था संकोच
बरनाला को याद करते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना बताते हैं कि राज्यपाल के तौर पर उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया। वे छोटे कार्यक्रमों में भी शिरकत करने में संकोच नहीं करते थे।
धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक कार्यक्रमों में तो वे प्रोटोकाल तोड़कर पहुंच जाते थे। उन्होंने बताया कि राज्यपाल रहते हुए उन्होंने ऋषिकेश से हेमकुंड साहिब तक लंगर लगाने की अनुमति प्रदान की थी। इससे यात्रियों को काफी लाभ पहुंचा था। वे पर्यावरण प्रेमी थे। उन्हें भारतीय वन अनुसंधान के परिसर से बेहद लगाव था।
राजपुर मार्ग स्थित कांग्रेस कार्यालय में आयोजित शोक सभा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने स्व. बरनाला को श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने संबोधन में उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री व केंद्र सरकार में कृषि मंत्री रहते हुए शानदार काम किया। जब वह उत्तराखंड के राज्यपाल थे तब भी वह आर्थिक तौर पर सबसे कमजोर व्यक्ति के कल्याण के लिए प्रयासरत रहे।