पढ़िए, चीन-पाक को धूल चटाने वाले जवानों की कहानी
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1965 और 1971 के युद्ध में रण क्षेत्र को पाकिस्तानी सेना के कब्रिस्तान में बदल कर अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देने वाले बंगाल इंजीनियर्स ग्रुप का 212 वर्षों का स्वर्णिम इतिहास शौर्य, बलिदान और गौरव का प्रतीक है।
बंगाल सैपर्स की स्थापना कानपुर में 1803 को हुई थी। इसकी पद स्थापना रुड़की में सात नवंबर 1853 को हुई थी। पद स्थापना के उपलक्ष्य में बंगाल सैपर्स हर वर्ष 07 नवंबर को ग्रुप-डे का आयोजन कर गौरवशाली अतीत को सलामी देता है।
बंगाल सैपर्स की स्थापना कप्तान टी वुड द्वारा 20 जुलाई 1803 को कोर आफ बंगाल पायनियर्स के रूप में हुई थी। जिसे किंग जार्ज ऑन सैपर्स रूप में जाना गया और अब बंगाल इंजीनियर्स समूह एवं केंद्र के रूप में गौरवान्वित है।
जवानों के कौशल ने कई बार किया गौरवान्वित
रुड़की में इसका आगमन सात नवंबर 1853 को हुआ था। इसी उपलक्ष्य में गुरुवार से तीन दिवसीय ग्रुप-डे का आयोजन किया जा रहा है। बीईजी एंड सेंटर के इंजीनियर और जवानों के कौशल ने इसके इतिहास को एक ही नहीं कई-कई बार गौरवान्वित किया है।
1826 में सूबेदार देवी सिंह और अन्य 12 जवानों ने गुजनी किले पर कब्जा कर उस समय के उच्चतम वीरता पुरस्कार इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट को प्राप्त किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी सैपर्स का विजयी अभियान जारी रहा।
1962 के ऑपरेशन के दौरान चुंशूल में उच्चतम वायु रणक्षेत्र और लद्दाख क्षेत्र में त्वरित लैंडिंग ग्राउंड का निर्माण बंगाल सैपर्स की कार्य कुशलता का परिचायक है।
कश्मीर आपदा में बनाए ब्रिज और सड़क
1974 और 1968 के परमाणु परीक्षणों में भी कार्यकुशलता से भागीदार बना है। अपने 200 वर्षों से अधिक समय के स्वर्णिम इतिहास में विभिन्न आपरेशनों में भाग लेकर 80 युद्ध, 11 थिएटर सम्मान और 11 विक्टोरिया क्रॉस प्राप्त किए हैं।
बंगाल सैपर्स ने राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के साथ-साथ बाढ़, चक्रवात, भूकंप और सुनामी जिनमें गुजरात का भूकंप, सुनामी और केदारनाथ बाढ़ के दौरान त्वरित सहायता प्रदान कराई।
यही नहीं हाल ही में कश्मीर में आई बाढ़ आपदा में भी बंगाल सैपर्स ने क्षतिग्रस्त ब्रिज और सड़कों का निर्माण कर सराहनीय योगदान दिया।