इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी के जख्म अब भी हरे, लेकिन दावे धरे के धरे
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तराखंड में मानसून दरवाजे पर दस्तक देने वाला है। 16 जून 2013 की त्रासदी का गवाह पहाड़ का जनमानस डरा-सहमा है। एक बार फिर मानसून के चार महीने चिंता, आशंका और दहशत में गुजरेंगे।
फिर वही बादलों का फटना, पहाड़ों का टूटना और पुलों और सड़कों का ध्वस्त हो जाने की घटनाएं सुर्खियां बनेंगी। सरकारें चिंता जताएंगी। आपदा प्रबंधन के बड़े-बड़े दावे होंगे। खामियों से पर्दा उठेगा।
मगर मानसून के विदा होने के साथ आपदाओं को लेकर उठने वाले तलवार से तीखे ये सवाल सिस्टम की म्यान में ठूस दिए जाएंगे। सरकार चाहे जो तर्क, जो बहाने बनाए मगर असल सच यही है कि वर्ष 2013 की आपदा के जख्म अब भी हरे हैं और तमाम दावों के बावजूद सरकारों ने इनसे अब तक कोई सबक नहीं सीखा है।
इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी
उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं के ज्ञात इतिहास में 16 जून 2013 की आपदा इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी। केदारनाथ में अप्रत्याशित जलप्रलय हजारों जिंदगियां ली गईं। केदारनाथ ही नहीं प्रदेश के सभी पर्वतीय जनपदों में आसमान से कहर बरपा।
रूद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर, पिथौरागढ़ की करीब नौ लाख आबादी आपदा से दहल उठी। सड़कें, पुल और संपर्क मार्ग ध्वस्त हो गए। 13 नेशनल हाईवे, 35 स्टेट हाईवे, 2385 जिला व ग्रामीण सड़कें व पैदल मार्ग और 172 बड़े और छोटे पुल बाढ़, भूस्खलन और भारी बारिश में नष्ट हो गए।
आपदा के दौरान 4200 से ज्यादा गांवों से पूरी तरह संपर्क टूटा। 2141भवनों का नामों-निशान मिट गया। 11759 भवनों को आशिंक क्षति पहुंची। तीन हजार से ज्यादा भवनों को सामान्य हानि हुई। 995 सरकारी भवन जिनमें स्कूल भवन भी शामिल थे, का अस्तित्व मिट गया। 11091 मवेशी मारे गए। 1308.96 हेक्टेयर कृषि भूमि बह गई।
4400 से अधिक लोग मारे गए
16 जून 2013 की आपदा में करीब 4435 लोग मारे गए या लापता हो गए। इनमें 991 मृतक उत्तराखंड के थे, जिनमें बड़ी संख्या केदारनाथ धाम में पूजा-पाठ और होटल के कारोबार से जुड़े लोगों की थी। प्रशासन ने 197 लोगों के शव बरामद किए। सर्च आपरेशन में करीब 555 कंकाल खोजे गए, जिनमें से डीएनए जांच के बाद 186 की पहचान हो सकी। सर्च आपरेशन के दौरान एयरफोर्स और एनडीआरएफ के 18 जवान भी मारे गए। 26 सरकारी कर्मचारियों की मौत हुई।
जख्म पर मरहम
केंद्र सरकार ने आपदा राहत एवं पुनर्निर्माण के लिए 7980 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की। राहत कोष से सरकार ने उत्तराखंड के रहने वाले मृतकों के परिवारों को सात लाख रुपये और बाहरी राज्यों के मृतक आश्रित को साढ़े तीन लाख रुपये राहत राशि के तौर पर दिए। बेघर हो गए डिजास्टर रिकवरी परियोजना के तहत 2499 लोगों को आवास बनाने के लिए पांच लाख रुपये की राशि चार किस्तों में दी जानी हैं। इनमें अब भी 410 ऐसे परिवार हैं जिन्होंने पहली किस्त ही प्राप्त की है। ये राशि भी भूमि पर मालिकाना हक और भूर्भीय रिपोर्ट के बाद जारी की गई।
पुनर्निर्माण के नाम पर अब तक जो हुआ
सड़कें व पुल : पुनर्निर्माण के तहत 1963 किमी लंबी 113 सड़कों के लिए 882.07 करोड़ रुपये स्वीकृत किए है। करीब 744 करोड़ रुपये लागत की 1961 किमी सड़कों के 104 योजनाओं पर काम शुरू कर दिया गया जो अभी जारी है। इनमें से 57 कार्य पूरे हो चुके हैं। 233 उपयोजनाएं भी तैयार की गई हैं। इनमें 148.36 करोड़ रुपये लागत के 26 पुलों का भी निर्माण हो रहा है।
जख्म अब भी हरे हैं
केदारनाथ में: पुनर्निर्माण के नाम पर सरकार का मुख्य फोकस केदारनाथ पर ही रहा। लेकिन पूरी ताकत झोंक देने के बावजूद केदारनाथ में अब भी 40 फीसदी से ज्यादा काम बाकी है। पंडों के घर अब तक नहीं पाए हैं। कई संपर्क मार्ग अब भी अस्थायी हैं। आपदा से प्रभावित शेष जनपदों में पुनर्निर्माण कार्यों में उतनी तेजी से काम नहीं हुआ। सरकार को 52 हेलीपेड बनाने थे, जिनमें से आठ का ही निर्माण हो सका। चंद्रापुरी से गौरीकुंड के बीच फ्लड कंट्रोल लाइन नहीं बनी। सोनप्रयाग से केदारनाथ तक उच्च क्षमता की विद्युत लाइन नहीं बने। एक दर्जन से ज्यादा पुलों का निर्माण भी ढीला है।
स्वाल, जो अब भी बरकरार
ज्वलंत प्रश्न जो अनुत्तरित हैं
-450 से ज्यादा संवेदनशील गांव हैं जिन्हें सरकार सुरक्षा की दृष्टि से रहने लायक नहीं मानती है। इन गांवों का पुनर्वास व विस्थापन होना है। मगर इसके लिए सरकार को करीब नौ हजार करोड़ रुपये चाहिए। वह केंद्र का मुंह ताक रही है। मगर केंद्र ने इसके लिए अब तक हामी नहीं भरी है।
-राहत का असल मतलब यही है कि प्रभावित परिवार को सरकार उसकी पुरानी स्थिति के लायक बना दे। मगर सरकार की राहत मानकों में बंधी है, लिहाजा
आपदा की जद में आने वाले परिवार के पास अपनी पुरानी स्थिति लौटना नामुमकिन हो जाता है।
-नदियों, नालों, खालों के किनारे भवनों के निर्माण पर अदालतों के फैसले तक लागू नहीं हो रहे हैं। आपदा के बार-बार झटके खाने के बाद राज्य सरकार ने इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं की है। अभी सरकार यही सर्वे पूरा नहीं कर पाई है कि नदी तट पर बसी आबादी कितनी है और किस खतरनाक स्तर तक है। जबकि हर साल आने वाली बाढ़ अपने किनारों पर बसी आबादी को बार-बार आगाह कर रही है।
-पिछले एक दशक से मौसम पर निगेहबानी के लिए प्रदेश में डॉप्लर राडार लगाने के दावे हो रहे हैं। मगर राज्य और मौसम विभाग के मध्य समन्वय और फोकस न हो पाने की वजह से ये योजना भी अब तक खटाई में है।
सरकार का तर्क
मगर आपदा प्रबंधन विभाग की मानें तो 2013 की त्रासदी ने मानसून और आपदाओं को लेकर सरकारी सिस्टम की सोच को बदला है। सचिव अमित सिंह नेगी के मुताबिक, पिछले चार साल के दौरान विभाग के स्तर पर आपदा प्रबंधन और जागरूकता को लेकर कई नई पहल की गई हैं। विश्व बैंक की मदद से संवेदनशील पहाड़ों के स्लोप का ट्रीटमेंट करने के प्रोजेक्टों को मंजूरी मिली है। डॉप्लर राडार लगाने की योजना भी अब ठीक दिशा में है।
मानकों को व्यावहारिक बनाने की कोशिश की गई है, ताकि आपदा प्रभावित तक राहत तेजी से पहुंचे। जिलाधिकारियों को एडवांस में एडवाइजरी जारी हुई हैं। उन्हें एडवांस प्लानिंग के लिए कहा गया है। हर डीएम से जनपद के दो सबसे संवेदनशील गांवों का सम्पूर्ण ब्योरा मांगा गया है।