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नर कंकालों से पटा है केदारनाथ का रास्ता

Wed, 18 Jun 2014 09:12 AM IST
राकेश शर्मा / अमर उजाला, देहरादून
राकेश शर्मा / अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 18 Jun 2014 09:12 AM IST
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skeleton found in kedarnath

केदारनाथ स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने सोमवार को रामबाड़ा से सोनप्रयाग तक जंगलों में मानव कंकालों की तलाश की।

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रामबाड़ा के ऊपर जंगल में चार मानव कंकाल सोमवार को मिले। एसटीएफ की 22 सदस्यीय टीम ने रामबाड़ा के ऊपर सफाई अभियान भी चलाया।

केदारनाथ पैदल मार्ग के नजदीकी जंगलों में जलप्रलय के दौरान बचकर भागे और बाद में मारे गए लोगों के शव बरामद हो रहे हैं।

11 से 16 जून तक चीरवासा और रामबाड़ा में 42 मानव कंकाल बरामद हो चुके हैं। एसटीएफ के मुखिया डीआईजी जीएस मर्तोलिया ने बताया कि सर्च आपरेशन एक हफ्ते तक चलेगा।

इस दौरान टीम रामबाड़ा से सोनप्रयाग तक जंगलों में कांबिंग करेगी। टीम में एसटीएफ के पर्वतारोही, एसडीआरफ और स्थानीय पुलिस के जवान शामिल हैं।

कंकालों की चिता बन गई धर्म

skeleton found in kedarnath

‘चारों ओर तबाही के निशान। धराशायी भवन, बाढ़ में बहकर आए बोल्डर, ढहते पहाड़ और इनके बीच कंकाल शेष रह गए सैकड़ों शव। वहां न रहने का कोई ठिकाना था, न चलने के लिए रास्ते।

लेकिन, जीवन के अंतिम सत्य से साक्षात्कार के बाद कंकालों की चिता सजाना धर्म बन गया। कोई शव क्रियाकर्म से बच न जाए, हर जवान अपनी परवाह छोड़ यही चिंता करने में जुट गया।

मीलों पैदल चलकर, जंगलों में भटककर लकड़ियां जुटाई जातीं। इन्हें कंधों पर ढोकर वहां लाया जाता, जहां कंकालों के ढेर होते और फिर पूरे रीति रिवाज के साथ क्रियाकर्म किया जाता।

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कुदरत के आगे इंसानी वजूद की कोई बिसात नहीं

skeleton found in kedarnath

परेशानियां बहुत हुईं, लेकिन जो चले गए, उन्हें सम्मान देने के संतोष के आगे वे कुछ नहीं।’

गत वर्ष आपदा राहत आपरेशन में करीब ढाई माह तक केदारनाथ क्षेत्र में तैनात रहे एसपी सिटी नवनीत सिंह भुल्लर आज भी उन पलों को याद कर सिहर उठते हैं।

भुल्लर कहते हैं 16-17 जून की उस आपदा ने साबित कर दिया कि कुदरत के आगे इंसानी वजूद की कोई बिसात नहीं। बताया कि उन्हें आपदा के अगले ही दिन हेलीकाप्टर से राहत आपरेशन के लिए भेज दिया गया था।

गौरीकुंड में हेलीकाप्टर से उतरे तो आपदा के निशान देख कांप उठे। बताया पहले तीन दिन बदहवासी की स्थिति रही। लगातार बारिश से फिर अनहोनी का डर सताता रहा।

लेकिन, जवानों ने विपरीत हालात में 28 जून तक बचे लोगों को सुरक्षित निकाल लिया।

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शव के नाम पर रहे गए थे बस कंकाल

skeleton found in kedarnath

एक जुलाई से शवों के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई। भुल्लर ने बताया कि उनके नेतृत्व में चले अभियान में गौरीकुंड से रामबाड़ा तक 72, देवविष्णु से गोमुखड़ा तक 187, जंगल चट्टी से भीम बली और केदारनाथ तक 185 शव बरामद किए गए।
 
शव के नाम पर सभी कंकाल ही रह गए थे। भुल्लर ने बताया कि केदारनाथ और गौरीकुंड में दुकानों के टेंट बनाने के लिए लगाई जाने वाली बल्लियों की मदद से शवों का अंतिम संस्कार किया गया।

लेकिन देव विष्णु से ऊपर लकड़ियां जुटाने में जवानों को जद्दोजहद करनी पड़ी। हेलीकाप्टर के जरिये घी, रॉल आदि पर्याप्त मात्रा में पहुंचाया गया था।

सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि लगातार बारिश से लकड़ियां गीली हो गई थीं। ऐसे में जवानों ने कई किलोमीटर चलकर लकड़ियां जुटाईं।

तब बड़ी परेशानियां झेलनी पड़ीं, लेकिन हर जवान के चेहरे पर दर्द की जगह यही भाव नजर आता था कि वह किसी के जीवन के 16 संस्कारों में से अंतिम का सहभागी बन रहा है।

यही वजह रही कि अंतिम सत्य की प्रक्रिया में किसी ने कहीं कोई कोताही नहीं की।

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