ऋषिकेश से कोलकाता तक गंगा में चलेंगे पानी के जहाज

अंकित कुमार गर्ग/ अमर उजाला, रुड़की Updated Mon, 03 Feb 2014 10:10 AM IST
ship will run in the Ganga river again
गंगा में कभी पानी के जहाज चलते थे। लेकिन कहीं गंगा उथली हुई, तो कहीं पानी कम हुआ इसलिए पानी के जहाज चलने बंद हो गए।

आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक का दावा
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक का दावा है कि जैक जेटी तकनीकी से गंगा में ऋषिकेश से कोलकाता (लगभग 2300 किलोमीटर) तक फिर से पानी के जहाज चलाए जा सकते हैं। इनसे माल ढोया जा सकता है, जो खर्चा बचाने के अलावा पर्यावरण के भी अनुकूल होगा।

यह है जैक जैटी तकनीक
जैक जैटी तकनीक नदियों के तटबंध के रूप में इस्तेमाल होती है। इस तकनीक में कंक्रीट और सीमेंट से बनने वाले कॉलम को एक खास डिजाइन दिया गया है।

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नदी के किनारे कॉलम के इस जाल से न केवल प्रवाहित होने वाले पानी की चौड़ाई घट जाती है, बल्कि किनारों पर रेत आदि का जमाव होने के कारण न केवल तटबंध को स्थायित्व मिलता है बल्कि प्रवाह से होने वाले भूमि के कटाव से भी रक्षा होती है।

वाराणसी में हो चुका है गंगा की गहराई बढ़ाने का प्रयोग
पानी की गहराई बढ़ाने और नौवहन (नेवीगेशन) को गति देने के लिए वाराणसी के पास गंगा की एक साइट पर इसका प्रयोग भी किया जा चुका है।

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यहां जैक जैटी तकनीक से गंगा के पानी की चौड़ाई को चार से घटाकर दो किलोमीटर कम किया गया। इससे साइट पर गंगा पानी की गहराई 1.4 मीटर से बढ़कर दो मीटर हो गई।

नौवहन का यह होगा रूट
ऋषिकेश से कोलकाता तक इनलैंड नेवीगेशन का रूट ऋषिकेश से शुरू होकर हरिद्वार, बिजनौर, नरौरा, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, मुंगेर एवं हुगली से होकर कोलकाता तक है।

अंतरदेशीय नौवहन में यह है मुख्य समस्या
देश में अंतरदेशीय नौवहन की मुख्य समस्या नदियों की कम गहराई है। दो हजार टन माल ढोने के एक जहाज को कम से कम 2.5 मीटर और 800 टन माल ढोने के लिए दो मीटर की गहराई जरूरी है।

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इलाहाबाद में नवंबर से जून तक गंगा की गहराई 0.9 मीटर रहती है। इलाहाबाद से कोलकाता पोर्ट तक नौवहन सुविधा है। लेकिन इस रूट पर मात्र 300 टन तक जहाज माल ले जा सकता है।

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इस रूट पर दो-दो किलोमीटर के 20 प्वाइंट ऐसे हैं जहां पानी की गहराई कम होने की वजह से जहाज फंस जाता है। इसके लिए जैक जैटी तकनीक एकदम सस्ती और कारगर निदान है।

मैंने जैक जैटी तकनीक को अंतरदेशीय नौवहन के लिए उपयुक्त पाया है। यह तकनीकी सस्ती और प्रदूषण के लिहाज से उपयुक्त है।
- डा. नयन शर्मा, वरिष्ठ वैज्ञानिक आईआईटी रुड़की

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