मायके से ली विदा, अब बेटी नहीं बहू हैं मां नंदा
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राजजात के सातवें दिन नंदा अपने मायके के आखिरी गांव केवर को छोड़कर ससुराल क्षेत्र में प्रवेश कर गई।
मायके के मोह में बंधी नंदा केवर गदेरे के पुल को पार करते समय फूट-फूट कर रोई। नंदा के साथ-साथ आसपास के गांवों के कई हजार महिलाओं के आंखें भी नम हो गई। यहां से आगे की यात्रा में नंदा अब घुघंट में है। नंदा अब बेटी नहीं बहू है।
भगवती (भगोती) से आगे बढ़ चुकी नंदा देर शाम कुलसारी भी पहुंची और नंदा अब ससुराल क्षेत्र में एक बहू की लोक परंपरा में भी बंध गई है। भगोती में प्रात: पांच बजे से ही नंदा के विदाई की तैयारी शुरू हो गई थी। प्रात: 10.35 बजे 12 थानों की छंतोलियों और अपने पूरे लावा-लश्कर के साथ नंदा ने भगवती से विदा ली।
करीब डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित केवर गांव में पहुंचते ही नंदा को मायके के मोह ने घेर लिया। भगवती से केवर गाड़ तक के दो किमी के सफर को तय करने में नंदा को कई घंटे लगे। मायके वालों का हालचाल पूछती नंदा के लिए आगे का एक-एक कदम बढ़ाना मुश्किल हो रहा था। केवर गांव में नंदा पहुंची तो केवर के भूम्याल देवता ने नंदा से भेंट की।
अब वह क्षण भी आया, जब नंदा को मायके से विदा लेने थी। केवर गांव सहित आस-पास के हजारों लोग केवर गदेरे में पास एकत्र थे। मान्यता के अनुसार केवर गदेरे के पास ही केली बगवान है। यहां पर नंदा छुपने के लिए जाती है। आज रविवार को जब सभी छंतोलियों के साथ नंदा यहां पर पहुंची तो आधे पुल के बाद उसने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया।
साज-श्रृंगार का सारा सामान लेकर मां नंदा हुई विदा
नंदा करीब तीन बार यहां से लौटकर वापस केवर की ओर वापस लौटी। केवर गांव की ध्याणियों ने नंदा को समझाया मुझाया, उसे अखरोट, मुंगरी, काखड़ी, चूड़ा सहित साज-श्रृंगार का सारा सामान देकर विदा किया। आखिरकार केवर की ध्याणियों से समझने के बाद नंदा ने अपने ससुराल क्षेत्र की ओर कदम बढ़ा ही लिए।
नंदा को विदा करने के लिए आसपास के करीब तीन दर्जन लोग केवर गदेरे में एकत्र हुए थे। हर आंख नम थी और नंदा फूट-फूट कर रो रही थी। केवर से निकलने के बाद नंदा ने अगले पड़ाव कुलसारी की ओर कदम बढ़ाया। पंती, विनायक, पैठाणी, मींग, हरमनी आदि गांवों से होते हुए नंदा देर शाम कुलसारी पहुंच गई।
रास्ते में पड़ने वाले नारायणबगड़ से लेकर कुलसारी तक का रास्ता सड़क का है। बड़ी संख्या में यात्री नंदा के साथ-साथ इस दस किमी का सफर तय कर कुलसारी पहुंच चुके हैं। कुलसारी में पास्तोली, मेटा, आलकोट, कौब, कनुखल और थान की पांच छंतोलियें भी राजजात में शामिल हो गई है। कुलसारी नंदा की बड़ी बहन काली का अपना क्षेत्र है।
यहां पर नंदा कालिंका से मिलती है। कुलसारी के कालिंका मंदिर में पूजा-अर्चना होती है और काली के लिए बलि दी जाती है। पिछली दो यात्राओं में इस बलि पर सवाल उठे थे, किसी न किसी वजह से यह बलि नहीं हो पाई थी। सोमवार को कुलसारी से नंदा की यह यात्रा चेपड़ों के लिए रवाना होगी।
नंदा के दर्शन के लिए कुलसारी में भी करीब 15 से 20 हजार लोग एकत्र हो गए हैं।
बेटी को विदा करना सृष्टि का नियम
केवर गदेरे से जब नंदा ससुराल के लिए विदा हुई तो, उसका मायका मोह भी सामने आया। अपनों को बिछड़ने का गम भी दिखा, जिस पर नंदा पुल से तीन बार वापस लौटी। मान-बुझा कर उसे ससुराल के लिए विदा किया गया, तो महिलाएं क्या युवतियां और बड़े-बुर्जगों की आंखें भी नम हो गई।
केवर गांव के एक वृद्व का कहना था हर पिता को एक दिन अपनी बेटी को आंगन से विदा करना होता है, क्योंकि यह सृष्टि का नियम है।
कभी पैदल तो कभी गोद में चल रहा चौसिंग्या खाडू
नंदा राजजात का पथ प्रदर्शक चौसिंग्या खाडू पांच माह का है। हजारों भक्तों की भीड़ में ढोल-दमाऊं और भंकुर की आवाज से कहीं यह देवी का दूत घबरा या कहीं दौड़ न जाए, इसलिए इसे कई स्थानों पर गोद में उठाकर भी रास्ता पार कराया जा रहा है।
लोक मर्यादाओं का पाठ भी पढ़ा रही नंदा
नंदा की कैलास की धार्मिक व अध्यात्मिक यात्रा लोकलाज, लोक परंपराओं और मान-मर्यादाओं कीे यात्रा भी है। यात्रा अब पिंडर के सहारे आगे बढ़ रही है। नंदा अब बेटी नहीं बहू है। अपनी अध्यात्मिक शक्ति से हजारों को एक सूत्र में पिरो रही नंदा अब यहां भी बता रही है कि बहू का धर्म क्या है। देवी, भगवती एक मानव की तरह आचरण करते हुए घुघंट में है।
एक लक्ष्मण रेखा जो इस आदिम समाज ने मानव परिवार के लिए खींची थी, आदिशक्ति नंदा उस लक्ष्मण रेखा को शक्ति संपन्न होते हुए भी नहीं लांग रही है। नंदा की यह यात्रा अब अपने ससुराल क्षेत्र में है। पिंडर के आते ही क्षेत्र की संस्कृति भी बदल रही है। इस देव यात्रा में संस्कृति का यह बदलाव साफ देखने को मिल रहा है।
नंदा के स्वागत में कहीं कोई कमी नहीं है पर लोगों का नंदा से संबंध बदल गया है। नंदा उनकी ईष्ट है, आराध्य देवी है पर क्षेत्र की बहू भी है। नंदा अब एक बहू की तरह शांत होकर आगे बढ़ रही है। इसके साथ-साथ ही पिंडर की अपनी संस्कृति, समृद्वि व सहेज रही है। वर्ष 2000 में जब नंदा यहां से निकली होगी, तो पिंडर और खूबसूरत थी और उसके किनारे बसे गांवों पर आपदा की मार नहीं थी।
जून 2013 में आई आपदा के निशान पिंडर में जहां-तहां दिखाई दे रहे हैं। पंती गांव से कुलसारी तक की सड़क कई जगह टूटी हुई है और भू-धंसाव का शिकार है। दो दिन पहले तक यह सड़क बंद थी। करीब आधा दर्जन गांव इस बीच के दस किमी के दायरे में विस्थापन की कगार पर हैं। नंदा की यह यात्रा इन गांव के लोगों को दिलासा देने की भी है।
यात्रा को शुभ संकेत मान रहे लोग
किसी के चेहरे पर कोई सिकन नहीं है और न किसी को कोई शिकायत है। आपदा को एक देवी अनिष्ठ मानने वाले ये लोग नंदा की इस यात्रा को एक शुभ संकेत भी मान रहे हैं। नंदा आई है, तो क्षेत्र में अब खुशहाली रहेगी, आपदाएं कम होंगे और लोक सुकून से रह सकेंगे। पिंडर के बिलकुल सटे इलाकों में आगे बढ़ रही नंदा लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक संकेत भी दे रही है।
दूर-दराज के लोग यात्रा मार्ग पर पहुंचकर नंदा से भेंट कर रहे हैं। यात्रा आगे बढ़ रही है। कैलाश की ओर निकल रही, नंदा की शक्ति दिनोंदिन बढ़ रही है। कुलसारी में पिंडर और चांदपुर क्षेत्र की अलग-अलग संस्कृति का मेल भी देखने को मिलता है। कत्यूरी राजा कभी यहां पर काली की पूजा करते थे। नंदा, काली के इस स्वरूप को भी स्वीकार करती है।
यहां पर काली को हालांकि बली दिए जाने की परंपरा रही है। लेकिन नंदा इसका कोई विरोध नहीं करती, बलि को लेकर अगर कोई विरोध है, तो इस पिंडर में आए बदलाव की वजह से है।
नंदा को संभालने की कोशिश में पुलिस
भगोती-केवर क्षेत्र की संस्कृति और कानून व्यवस्था के बीच का टकराव नंदा राजजात के लिए एक अजब पहेली बनता जा रहा है। एक ओर नंदा है, जो सीधे महिलाओं से संवाद करती है, उनके दुख-दर्द को सांझा करती है। दूसरी ओर पुलिस और प्रशासन है, जिसके लिए नंदा की यह यात्रा एक व्यवस्था भर है। नंदा लोक परंपराओं और समाज की व्यवस्था को मानता है।
पुलिस प्रशासन प्रशासनिक व्यवस्था से बंधा है। ऐसे में पुलिस और नंदा की यह शांत यात्रा के बीच खटपट का अंदेशा बना हुआ है। नंदा की इस ऐतिहासिक यात्रा में हजारों यात्री हर रोज शामिल रहते हैं। कई ऐसे हैं, जिन्होंने कभी एक वर्दीधारी सिपाही को कभी देखा हीं नही, उसके लिए नंदा की छंतोलियों के लिए रास्ता बनता पुलिस का सिपाही एक अबूझ पहेली है।