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ताकतवर होते ही सतपाल महाराज ने खेला ये दांव, चेले हुए चित

Mon, 03 Apr 2017 09:01 AM IST
विपिन बनियाल/ अमर उजाला, देहरादून
विपिन बनियाल/ अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 03 Apr 2017 09:01 AM IST
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satpal maharaj politics against congress leader
सतपाल महाराज - फोटो : AmarUjala

गुरु गुड़ रह गए और चेले शक्कर हो गए...पुरानी कहावत है, मगर उत्तराखंड के सियासी माहौल में शक्कर हो गए चेलों को झटका देने से गुरु पीछे नहीं है। सत्ता की ताकत हाथ में आते ही सतपाल महाराज ने अपने एक दांव से अपने दो चेलों को फिलहाल तो चित्त कर दिया है।

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ये चेले हैं, भंग की गई समिति के अध्यक्ष गणेश गोदियाल और पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र भंडारी। गोदियाल को झटका इसलिए लगा है, क्योंकि दो साल का उनका कार्यकाल अभी शेष था, जबकि भंडारी के लिए ये मायूसी भरी खबर इसलिए है, क्योंकि समिति के उपाध्यक्ष पद को उनकी पत्नी रजनी भंडारी संभाले हुए थीं। सियासी संग्राम में साथ न देने वाले अपने दोनों चेलों को महाराज ने अपने एक फैसले से फिलहाल तो चित्त कर दिया है।
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गोदियाल और भंडारी दोनों ही महाराज के राजनीतिक शिष्य रहे हैं। महाराज ने ही गोदियाल की सियासी पारी शुरू कराई थी। राज्य बनने के बाद 2002 के अपने पहले चुनाव में थलीसैंण जैसी सीट को गोदियाल ने महाराज के भरोसे पर ही चुना था। उनके सामने बीजेपी के दिग्गज नेता डा. रमेश पोखरियाल निशंक थे, लेकिन महाराज की सरपरस्ती में उन्होंने चुनाव का मैदान मार लिया था।

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महाराज ने 2014 में ज्वाइन की बीजेपी

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सतपाल महाराज

इसी तरह, सियासत में राजेंद्र भंडारी ने मजबूती से कदम आगे बढ़ाए, तो उसके पीछे महाराज की ताकत भी काफी हद तक एक वजह रही। महाराज ने 2014 में जब बीजेपी ज्वाइन की, तो माना जा रहा था कि एपी मैखुरी, गणेश गोदियाल और राजेंद्र भंडारी भी अब कांग्रेसी नहीं रहेंगे।

मगर, हरीश रावत के साथ इनकी पींगे बढ़ गईं और राजनीतिक गुरु अकेले रह गए। राजनीति के माहिर खिलाड़ी रावत ने इन तीनों को अपने साथ जोडे़ रखने के लिए उन्हें खूब तवज्जो दी। इस बदले सियासी समीकरण के बाद महाराज और उनके शिष्यों की राहें निर्णायक तौर पर अलग हो गईं।

वैसे, पर्यटन और धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज इस बात को स्वीकार नहीं करते कि समिति भंग करने के पीछे किसी के प्रति पूर्वाग्रह ने काम किया है। महाराज-किसी को अपना चेला मानने के लिए भी तैयार नहीं हैं। दूसरी तरफ, करारी हार से चोट खाए गणेश गोदियाल और राजेंद्र भंडारी दोनों ही अब पलटवार के लिए और मजबूती से साथ खडे़ दिख रहे हैं। उत्तराखंड की सियासत में गुरु-चेलों की लड़ाई का एक नया मैदान भी तैयार हो रहा है।

सरकार पर भारी पड़े हैं ऐसे फैसले

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अनुसुइया प्रसाद - फोटो : self

यूपी की बात करें या फिर उत्तराखंड की इस तरह के फैसले सरकारों पर भारी पड़ते रहे हैं। प्रभावित पक्ष जब-जब कोर्ट की शरण में गया है, तब-तब उसके पक्ष में फैसला आया है। वर्ष 1991 में कल्याण सिंह सरकार ने मनोहर कांत ध्यानी को मंदिर समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया था।

1993 में सरकार भंग हुई, तो ध्यानी को भी हटा दिया गया। ध्यानी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली, तो फैसला उनके पक्ष में आ गया। कोर्ट के आदेश पर उन्हें बहाल करना पड़ा था। इसी तरह, उत्तराखंड बन जाने के बाद 2005 में कांग्रेस सरकार ने अनसुया प्रसाद मैखुरी को अध्यक्ष बनाया था, लेकिन 2007 में सत्ता परिवर्तन हो गया।

बीजेपी ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में नियुक्त अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को सत्तासीन होते ही हटा दिया। सरकार ने बीजेपी के अनसुया प्रसाद भट्ट को नया अध्यक्ष नियुक्त किया था। मगर मैखुरी ने कानूनी लड़ाई लड़ी। नैनीताल हाईकोर्ट से फैसला उनके पक्ष में आया और सरकार को उन्हें बहाल करना पड़ा था।

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