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आरएसएस और भाजपा के बूथ मैनेजमेंट ने आसान की भाजपाईयों की जीत की राह
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भाजपा को फिर बहुमत के साथ राज्य की सत्ता में पहुंचाने में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के बूथ मैनेजमेंट की अहम भूमिका रही। 2017 के चुनाव जीतने के साथ ही दोनों संगठनों ने 2022 के चुनाव के लिए तैयारियां शुरू कर दी। लगातार कार्यकर्ताओं से जुड़कर लोगों के साथ मिलकर बूथ मैनेजमेंट करते रहे। इसका फायदा उन्हें विधानसभा चुनाव में देखने को मिला है।
राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि कुछ भाजपा प्रत्याशियों को बहुत से वोट सिर्फ इसी नेटवर्क की वजह से मिले हैं। यह नेटवर्क डोर टू डोर संपर्क कर लोगों को जोड़ता रहा। विशेष तौर पर महिलाओं को जोड़ने पर उन्होंने फोकस किया है। संगठन से जुड़ी महिलाओं को इस बात के लिए तैयार किया गया कि वह अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान के लिए प्रोत्साहित करेंगी। इसके अलावा जहां भी वह रहती हैं, उसके आसपास जितनी भी महिलाएं हैं, उन्हें भी पार्टी प्रत्याशी को वोट देने के लिए कहेंगी। पार्टी का बूथ मैनेजमेंट भी गजब का रहा।
महानगर अध्यक्ष सीताराम भट्ट ने बताया कि देहरादून महानगर में कुल 927 बूथ थे। हर बूथ पर भाजपा ने 20 लोगों की कमेटी गठित की थी, जिसमें महिलाएं, युवा, बाइक वाले और स्मार्ट फोन वालों को शामिल किया गया था। हर दो बूथ पर डॉक्टर भी चिह्नित किए थे। वोटर लिस्ट में एक पन्ने पर 30 वोटरों (लगभग पांच से 10 परिवारों) के नाम होते हैं। एक पन्ने की जिम्मेदारी दो लोगों को सौंपी गई। महानगर में 15 मंडल हैं, उनके पदाधिकारियों को नियमित वोटरों से जुड़े रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अलावा महानगर में बूथ से ऊपर की टीम ने 24,700 ऐसे कार्यकर्ताओं की सूची बनाई, जो हर समय पार्टी से जुड़े रहे। वह किसी भी तरह के काम के लिए तैयार रहे। इसके अलावा वोटरों से जुड़ने के लिए वर्चुअल बैठकें, कोरोना के दौरान रूम बैठकें की, जिसमें 20 लोग को शामिल किया। रोजाना ऑफलाइन व ऑनलाइन बैठकें आयोजित की गई। मंदिर, मठ व धार्मिक संस्थाओं, एनजीओ के साथ नियमित तौर पर जुड़े रहे। पार्टी ने कोरोना के दौरान जिन लोगों को किसी भी तरह की मदद पहुंचाई, उन सभी की सूची भी तैयार की गई। उनसे भी पार्टी ने नियमित तौर पर बातचीत की।
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भाजपा का चुनाव मैनेजमेंट गजब का रहा, जिसके दम पर उन्होंने वोटरों के दिलों-दिमाग में अपनी पैठ बना ली। पिछला चुनाव जीतने के बाद से ही भाजपा ने इस चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। बूथ और पन्ना स्तर तक वोटरों से संपर्क करने के लिए अलग-अलग टीमें गठित की। उनका चुनाव प्रबंधन पूरे पांच साल चला, जिसका उन्हें इस बार फायदा मिला है। - प्रो. एचसी पुरोहित, राजनीतिक विश्लेषक, दून विश्वविद्यालय
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राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि कुछ भाजपा प्रत्याशियों को बहुत से वोट सिर्फ इसी नेटवर्क की वजह से मिले हैं। यह नेटवर्क डोर टू डोर संपर्क कर लोगों को जोड़ता रहा। विशेष तौर पर महिलाओं को जोड़ने पर उन्होंने फोकस किया है। संगठन से जुड़ी महिलाओं को इस बात के लिए तैयार किया गया कि वह अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान के लिए प्रोत्साहित करेंगी। इसके अलावा जहां भी वह रहती हैं, उसके आसपास जितनी भी महिलाएं हैं, उन्हें भी पार्टी प्रत्याशी को वोट देने के लिए कहेंगी। पार्टी का बूथ मैनेजमेंट भी गजब का रहा।
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महानगर अध्यक्ष सीताराम भट्ट ने बताया कि देहरादून महानगर में कुल 927 बूथ थे। हर बूथ पर भाजपा ने 20 लोगों की कमेटी गठित की थी, जिसमें महिलाएं, युवा, बाइक वाले और स्मार्ट फोन वालों को शामिल किया गया था। हर दो बूथ पर डॉक्टर भी चिह्नित किए थे। वोटर लिस्ट में एक पन्ने पर 30 वोटरों (लगभग पांच से 10 परिवारों) के नाम होते हैं। एक पन्ने की जिम्मेदारी दो लोगों को सौंपी गई। महानगर में 15 मंडल हैं, उनके पदाधिकारियों को नियमित वोटरों से जुड़े रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अलावा महानगर में बूथ से ऊपर की टीम ने 24,700 ऐसे कार्यकर्ताओं की सूची बनाई, जो हर समय पार्टी से जुड़े रहे। वह किसी भी तरह के काम के लिए तैयार रहे। इसके अलावा वोटरों से जुड़ने के लिए वर्चुअल बैठकें, कोरोना के दौरान रूम बैठकें की, जिसमें 20 लोग को शामिल किया। रोजाना ऑफलाइन व ऑनलाइन बैठकें आयोजित की गई। मंदिर, मठ व धार्मिक संस्थाओं, एनजीओ के साथ नियमित तौर पर जुड़े रहे। पार्टी ने कोरोना के दौरान जिन लोगों को किसी भी तरह की मदद पहुंचाई, उन सभी की सूची भी तैयार की गई। उनसे भी पार्टी ने नियमित तौर पर बातचीत की।
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भाजपा का चुनाव मैनेजमेंट गजब का रहा, जिसके दम पर उन्होंने वोटरों के दिलों-दिमाग में अपनी पैठ बना ली। पिछला चुनाव जीतने के बाद से ही भाजपा ने इस चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। बूथ और पन्ना स्तर तक वोटरों से संपर्क करने के लिए अलग-अलग टीमें गठित की। उनका चुनाव प्रबंधन पूरे पांच साल चला, जिसका उन्हें इस बार फायदा मिला है। - प्रो. एचसी पुरोहित, राजनीतिक विश्लेषक, दून विश्वविद्यालय