फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   roads will dangerous for himalaya

सड़कों का जाल, कहीं बन न जाए जी का जंजाल

Fri, 09 Sep 2016 03:53 PM IST
जेपी मैठाणी
जेपी मैठाणी Updated Fri, 09 Sep 2016 03:53 PM IST
विज्ञापन
roads will dangerous for himalaya
नेशनल हाईवे

हिमालय दिवस पर हिमालय को सहेजने के लिए हिमालय सा दृढ़ संकल्प, अडिग और पृथ्वी के भूगोल को समझने और संरक्षण के लिए कठोर होने का वक्त नजदीक आता जा रहा है।

विज्ञापन


यह समय की मांग है, वरना आने वाले वक्त में पहाड़ों में गाँव होगा, सड़कें होंगी, लेकिन पहाड़वासी पलायन कर सुरक्षा और सुविधा के लिए मैदानों में पलायन कर जाएंगे। हम पहाड़ के विभिन्न क्षेत्रों में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजना के तहत बन रही सड़कों के संदर्भ में बात कर रहे हैं कि यह देखने की जरूरत है कि कहीं बिना सोचे-समझे सड़कों का जाल किसी बड़े खतरे को आमंत्रण तो नहीं है। हिमालय दिवस पर यह हिमालय-सा विकट-कठिन प्रश्न हम सभी के सामने मुंह बाये खड़ा है।
विज्ञापन


जनपद चमोली के विकासखण्ड दशोली में बन रहे कुछ प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजनाओं के ऑन द स्पॉट अध्ययन पर हमने पाया कि- नीति निर्माताओं विकासखण्ड के अधिकारियों का मुख्य फोकस सिर्फ अपने-अपने क्षेत्र में जहाँ क्षेत्र की ग्राम सभाओं की जनसंख्या 500 से अधिक हो (अब इस मानक को 250 की जनसंख्या तक लाया जा रहा है) को सड़क मार्ग से जोड़ा जा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस सड़कों के जाल वाले विकास की प्रक्रिया में शायद ही कोई ऐसी सड़क होगी, जिसका पूर्व में जियोलॉजिकल और पर्यावरणीय अध्ययन किया गया हो। सड़कें सिर्फ गाँव तक पहुँचा देना तब चाहे वह कैसी भी बने, यही जनप्रतिनिधियों और कुछ राजनैतिक पार्टियों के रसूखदार ठेकेकदारों का उद्देश्य रह गया है।

बहुत सारी सड़कों का सर्वेक्षण समरेखण, अभियांत्रिकी/ इंजीनियरिंग और आपदा प्रबंधन की दृष्टि से उचित सर्वे कार्य नहीं किया जाता है। यही नहीं पर्यावरणीय और कृषि  तथा उद्यानिकी भूमि, गौशाला क्षेत्र, गौचर, पनघट, चरागाह आदि पर अवैज्ञानिक तरीके से बनने वाली छोटी-छोटी सड़कों के द्वारा पड़ने वाले कुप्रभावों का पूर्वानुमान और कोई समुचित वैज्ञानिक प्लानिंग नहीं की जा रही है।

डम्पिंग जोन के ढाल पर फेंक दिया जाता है मलबा

roads will dangerous for himalaya
badrinath highway - फोटो : amar ujala

प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजनाएं हर गाँव को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए एक बेहतर उपाय और सुविधा तो माना जा सकता है लेकिन इन सड़कों के निर्माण के दौरान बड़ी भारी मात्रा में बुलडोज़र और जेसीबी से खुदान और सड़क कटान करने के बाद निकलने वाले मलबे को बिना डम्पिंग जोन के ढाल पर फेंक दिया जाता है। इस मलबे से ढाल पर उग रही वनस्पति क्षेत्र, जंगल और गोचर पनघट तथा जलागम क्षेत्र पर बुरे प्रभाव पड़ते हैं।

सड़कों का ढाल, जल प्रवाह, नालियां कलवटों का निर्माण, स्कवर, सुरक्षा दीवाल, पैराफिट आदि के मानकों को इंजीनियरिंग की दृष्टि से नहीं देखा जा रहा है। बेहतर तो यह होता कि इस निर्माण की प्रक्रिया में ग्रामीणों को प्रशिक्षण देकर सड़कें बनायी जाती, जिससे एक ओर सैकड़ों मानव दिवस का रोजगार प्राप्त होता, निकलने वाले मलबे का ग्रामीण आपसी सूझ-बूझ और सहमति से निस्तारण करते और कुछ सामग्री का प्रयोग जैसे पत्थर, मिट्टी, स्लेट, रोड़ी का उपयोग अपने घरों के निर्माण के लिए करते।

काटी गयी झाड़ियों और पेड़ों के अवशेर्ष इंधन हेतु घरों में प्रयोग किए जाते। कम समय में अधिक लम्बी और चौड़ी सड़कें बनाने का जो सिलसिला उत्तराखण्ड के हजारों गाँवों में एक साथ पिछले पांच वर्षों से चल रहा है। उससे व्यापक पैमाने पर हिमालय के शरीर पर छोटे-बड़े लाखों घाव हो गए हैं। थोड़ी सी वर्षा आने पर व्यापक भूस्खलन, भू-क्षरण, भूमि कटाव होने लगा है। परिणामस्वरूप् गाड गधेरों की बाढ़, कस्बों और छज्ञेट नगरों कों प्रभावित कर रही है।

जंगलों में वर्ष 2016 अप्रैल से जून में लगी आग की वजह से जंगल क्षेत्र के भूमि ढालों की ऊपरी सतह भुरभुरी, कच्ची हो गयी हैं। थोड़ी सी तेज बारिश की बूंदें बिना घास-झाड़ी और छोटे पेड़-पौधों की मिट्टी के आवरण को बहाकर सारे उत्तराखण्ड के अधिकतर पर्वतीय क्षेत्रों में बाढ़ का कारण साबित हुई है। गाड़-गदेरों में आने वाली मिट्टी और गाद की वजह से सहायक नदियों और मुख्य नदियों में बाढ़ आ रही है। नदियों का जलस्तर बढ़ता जा रहा है।

नदियों के किनारे बसे नगर और उप नगरीय सभ्यता के साथ-साथ हिमालय से जुड़े गंगा जमुना के मैदान उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, प. बंगाल, सुदूर पूर्वोत्तर में असम, नागालैण्ड, मिजोरम ही नहीं बल्कि मैदानी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, हिमांचल प्रदेश को भी बाढ़-जनित आपदाओं का दंश झेलना पड़ा है।

एक अध्ययन के अनुसार अकेले जनपद चमोली के दशोली और जोशीमठ विकासखण्ड में 180 से अधिक छोटी-बड़ी सड़कें जिनमें से कुछ का निर्माण लोक निर्माण विभाग, एशियन डेवलपमेन्ट बैंक, जिला पंचायत, उत्तराखण्ड पर्यटन विभाग और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजनाओं के अंतर्गत किया जा रहा है। भूगर्भशास्त्री बताते हैं कि एक घनमीटर सड़क के खुदान से 12 से 16 कुन्तल मिट्टी या मलबा निकलता है।

जिसे बिना नियोजन और निस्तारण के ढलानों पर या सड़क निर्माण के दोनों ओर फेंक या छोड़ दिया जाता है। सिर्फ 10 मीटर लम्बी 4 मीटर चौड़ी सड़क बनाने में लगभग 700 से लेकर 1000 टन मलबा निकलता है। ऐसे अगर अनुमान लगाया जाए तो उत्तराखण्ड की सिर्फ  दो  विकासखण्डों में बिना योजनाबद्ध तरीकों से बनायी जा रही सड़कों से लाखों टन मलबा बे-तरतीब तरीके से फेंका जा रहा है। जो गाँवों के आस-पास बाढ़-रूपी आपदा ला रही है और खेती की भूमि, पशुचारागाह, घास कटापने के क्षेत्रों, राष्ट्रीय राजमार्गों को तहस-नहस कर पहाड़ में खाद्य आपूर्ति, संचार सुविधाओं की पहुँच, बिजली पानी की सप्लाई, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाओं को प्रभावित कर पहाड़ में मानव जीवन को पहाड़ सा कठिने बना रही है।

जल विद्युत परियोजनाओं के बाँधों में जमा हो रहा मलबा ओर सिल्ट 

roads will dangerous for himalaya
जल विद्युत परियोजना

सिर्फ छज्ञेटी-छोटी ग्रामीण सड़कें ही नहीं बल्कि सीमा सड़क संगठन, लोक निर्माण विभाग द्वारा बनायी जा रही बड़ी सड़कों के निर्माण में मलबे के निस्तारण के लिए पहाड़ के हरे-भरे ढालों और प्रमुख नदियों को मलबा निस्तारण का साधन के रूप में प्रयोग किया जा रहा है जिससे जल विद्युत परियोजनाओं के बाँधों में मलबा ओर सिल्ट जमा हो रहा है।

जल स्तर ऊपर उठकर पाण्डुकेश्वर, गोविंदघात बिरही, अल्कापुरी, नंदप्रयाग, कालेश्वर, बालखिला, भीरी चंद्रापुरी, अगस्तमुनि, रूद्रप्रयाग, श्रीनगर, कौड़ियाला, ब्यासी, ऋषिकेश, मंग्लौर, रूड़की, दूसरी ओर भागीरथी घाटी में हर्सिल, भटवाड़ी, मनेरी, गरमपानी, उत्तरकाशी, जोशियाड़ा, यमुना घाटी में संगमचट्टी, बड़कोट, पिथौरागढ़ में जौलजीवी, बागेश्वर आदि स्थानों को सड़कों के निर्माण से निकले और बे-तरतीब तरीके से फेंके गए मलबे की वजह से बाढ़ और भूस्खलन का संकट झेलना पड़ रहा है। अत: समय की मांग है कि गाँव-गाँव को सड़कों से जोड़ने के प्रयास के साथ सड़कों के किनारे सुरक्षित मलबा डंपिंग जोन बनायी जाएं। 
स्थानीय ग्रामीणों को मिट्टी, पत्थर, रोड़ी बजरी की चुगान की नि:शुल्क सुविधा दी जाए। बदले में वन विभाग, जलागम प्रबंधन विभाग, ग्राम एवं वन पंचायत, जायका परियोजना, कैम्पा परियोजना के तहत् सड़क निर्माण के साथ-साथ सड़कों के किनारे घास और झाड़ीनुमा पौधों को तुरंत रोपण किया जाए। घटिया निर्माण कार्य करने वाले इंजीनियरों और ठेकेदारों के लिए त्वरित और कड़ी सजा का प्रावधान हो।

जिले के भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण कार्यालय का ध्यान सिर्फ नदी किराने के खनन पट्टों पर ना हो बल्कि हर जिले में सड़कों के निर्माण, योजना और अनुरक्षण के लिए सभी विभागों जैसे ग्रामीण विकास विभाग, लोक निर्माण विभाग, पीएमजीएसवाई कार्यालय, आपदा प्रबंधन विभाग, वन विभाग, राजस्व विभाग, उत्तराखण्ड पावर कॉर्पोरेशन, जल संस्थान, जल निगम, दूर संचार विभाग, क्षेत्रीय शोध संस्थान, कॉलेजों के मध्य तालमेल से सड़कों का विकास किया जाए। स्थानीय ग्रामीण संगठनों को छोटी-छोटी सड़कों के निर्माण के गुणवत्ता, जांच और रखरखाव का जिम्मा दे दिया जाए तो सम्बन्धित गाँवों की सड़कें अच्छी बनेंगी।

(उत्तराखण्ड में लगभग 15 हजार गाँवों को भविष्य में जोड़ सकने वाली प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजनाओं के तीन वर्ष के अध्ययन से निकले निष्कर्ष पर यह विषय सामग्री आधारित है।)

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed