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सवालों के घेरे में उत्तराखंड में बन रहा विधानसभा भवन

Thu, 29 Sep 2016 08:40 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो / अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 29 Sep 2016 08:40 AM IST
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rit in NGT against gairsain assembly building
एनजीटी

उत्तराखंड में खासतौर से ग्रीष्मकालीन सत्र के लिए चमोली जिले में बनाए जा रहे विधानसभा भवन के निर्माण पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगा है।

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याची का आरोप है कि करीब 100 एकड़ में बनाए जा रहे इस भवन के लिए निर्माण से पहले पर्यावरणीय मंजूरी नहीं ली गई। जबकि अब तक भवन का 50 फीसदी से ज्यादा काम पूरा हो चुका है। वहीं एनजीटी की पीठ ने याचिका में की गई मांग में कुछ सुधार करने और मामले पर विचार के लिए 7 नवंबर की तारीख तय की है। 
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यह मामला जस्टिस जावद रहीम की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने बुधवार को विचार के लिए पेश किया गया। याचिका पर्यावरणविद विक्रांत तोंगड़ की ओर से दाखिल की गई है। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि वे इस याचिका के आधार पर सीधे उत्तराखंड सरकार को नोटिस नहीं जारी कर सकते। वहीं पीठ ने याची को उनकी मांगों में सुधार कर फिर से याचिका दाखिल करने को कहा है।
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याची ने अपनी मांगों में विधानसभा भवन के निर्माण कार्य पर रोक लगाने की भी मांग की थी। एनजीटी में दाखिल याचिका के मुताबिक चमोली जिले के भारीसेन क्षेत्र में बनाए जा रहे विधानसभा भवन के लिए वायु (संरक्षण व नियंत्रण) कानून और जल (संरक्षण व नियंत्रण) कानून, 1981 के तहत निर्माण से पहले पर्यावरण मंजूरी लेना अनिवार्य है।

याची की दलील है कि चमोली जिला उत्तराखंड का केंद्रीय भाग है। यह हिमालय के पर्यावरणीय क्षेत्र में आता है। ऐसे में यह निर्माण कार्य पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन करता है। याचिका में विधानसभा भवन की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) के आधार पर कहा गया है कि इस भवन निर्माण में विधानसभा भवन, कार्यालय, विधायकों व अधिकारियों के लिए 60-60 आवासीय परिसर, 16 मंत्रियों के लिए वीआईपी आवास, स्पीकर व मुख्यमंत्री के लिए वीवीआईपी आवास के साथ हेलीपैड बनाया जाना है।

इस निर्माण कार्य के लिए 100 एकड़ में 20812 वर्ग मीटर जगह का इस्तेमाल किया जाएगा। याचिका के मुताबिक डीपीआर में पानी की जरूरत और स्रोत के बारे में कोई जिक्र नहीं किया गया है और न ही कोई पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की गई है। इसके अलावा भवन के लिए किसी तरह की सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट योजना भी नहीं तैयार की गई है। याचिका के मुताबिक इतने बड़े निर्माण कार्य के लिए पर्यावरणीय पहलुओं की अनदेखी भारी पड़ सकती है।


याची ने मामले में पर्यावरण मंत्रालय, उत्तराखंड सरकार, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटेड, वन विभाग, केंद्रीय भू-जल प्राधिकरण को पक्षकार बनाया है। याची की मांग है कि पर्यावरण नियमों की अनदेखी के लिए पक्षकारों पर भारी जुर्माना लगाया जाए। साथ ही पर्यावरण मंजूरी देने के लिए सख्त आदेश दिए जाएं।

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