रक्षाबंधन विशेषः देवता भी निभाते हैं भाई-बहन का रिश्ता
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रिश्तों की मर्यादाएं मानव ही नहीं, धरती पर देवी-देवता भी निभाते हैं। धर्म को साक्षी मानकर बने इन रिश्तों की परंपरा श्रीनंदा राजजात में भी देखने को मिलती है।
नंदा और लाटू देवता का धर्म भाई-बहन का रिश्ता भक्तों में अपनत्व एवं आस्था का संचार करता है।
अपनी बहन को सुसराल भेजने के लिए लाटू देवता अपने मूल मंदिर वाण (देवाल) के बाद स्वयं कठिन स्थानों पर यात्रा की अगुवाई कर उसे सकुशल होमकुंड तक पहुंचाते हैं। 12 वर्ष या उससे अधिक समय में होने वाली राजजात में लाटू देवता की विशेष भूमिका होती है।
मां नंदा ने लाटू को बनाया था धर्म भाई
किवदंतियों के अनुसार प्राचीन काल में कन्नौज का एक ब्राह्मण हिमालय भ्रमण एवं मां नंदा के दर्शनों को पहुंचा, लेकिन कारणवश वह वाण क्षेत्र में अपने दांतों से अपनी जीभ काट लेता है, जिससे उसकी मौत हो जाती है।
देवी मां उसकी आत्मा को कैलास ले जाती है और उसे धर्म भाई बनाते हुए राजजात में वाण से यात्रा की अगुवाई की जिम्मेदारी सौंपती है।
लाटू देवता आज भी इस जिम्मेदारी को निभा रहा है। ज्यूंरागली में भक्तों को रास्ता पार कराने के लिए लाटू को भेंट भी देनी होती है।
इनका है कहना
मां श्रीनंदा और लाटू देवता धर्म भाई-बहन हैं। श्रीनंदा की डोली और छंतोली के वाण पहुंचने पर लाटू प्रसन्न होता है। अपनी धर्म बहन को कैलास विदा करने के लिए वह यहां से पथ प्रदर्शक बनकर आगे चलता है।
-प्रो. डीआर पुरोहित, पूर्व निदेशक लोक संस्कृति एवं कला निष्पादन केंद्र, एचएनबी केविवि श्रीनगर गढ़वाल
आंख पर पट्टी बांधकर होती है लाटू की पूजा
देवाल के वाण गांव में स्थित लाटू देवता के मंदिर में आज भी पुजारी आंखों पर पट्टी बांधकर पूजा करते हैं। परपंराओं के अनुसार माना जाता है कि मंदिर के भीतर देवता के आभूषणों की चमक से आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है अथवा मंदिर के भीतर दैवी शक्तियों को देखने के चलते आंखों पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है।
ऐसे में पुजारी आंखों पर पट्टी बांधकर मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं और दीप प्रज्ज्वलित कर बाहर आ जाते हैं। यहां मंदिर परिसर के 10 मीटर के दायरे में पुजारियों के अलावा किसी को प्रवेश करने नहीं दिया जाता।