भूस्खलन से पहले उग जाती हैं ये झाड़ियां
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हिमालय अपनी पर्वत शृंखलाओं में होने वाले भूस्खलन का पूर्व संकेत दे देता है। यह संकेत है अतीश का पौधा। अतीश उसी क्षेत्र में उगता है, जहां भूस्खलन होने वाला हो।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी के शोध में यह बात सामने आई है। डॉ. नेगी का यह शोध अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका एलस्वेयर में प्रकाशित हुआ है।
डॉ. नेगी ने बताया कि अतीश (वैज्ञानिक नाम: एलनेस नेपलांसिस) एक खास झाड़ीनुमा पौधा है। बताया कि उन्होंने तीन साल तक उत्तराखंड के भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों यमुनोत्री, गंगोत्री, उत्तरकाशी, केदारनाथ, बदरीनाथ, रुद्रप्रयाग में शोध किया।
सभी जगह एक कॉमन बात सामने आई कि इन सभी क्षेत्रों में जिन जगहों पर भूस्खलन हुआ, वहां अतीश की झाड़ियां मौजूद थीं। खास बात यह थी कि ये झाड़ियां यहां भूस्खलन होने से कुछ समय पूर्व ही उगी थीं।
शोध के बाद डॉ. नेगी इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि पहाड़ पर कहीं अतीश की झाड़ियां बढ़ें तो समझ जाएं कि कुदरत का कहर बरपने वाला है।
यहां के लिए प्रभावी है अतीश
डॉ. नेगी बताते हैं कि भारत (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम) समेत अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, तिब्बत, भूटान, नेपाल, वियतनाम, थाईलैंड, म्यांमार, बांग्लादेश में अतीश की झाड़ियों से आपदा का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
मुफ्त में नुकसान से बचाव
डॉ. पीएस नेगी के मुताबिक अभी भूस्खलन की पूर्व जानकारी देने के लिए वैज्ञानिक शोध में भारी भरकम खर्च आता है।
इसके बावजूद स्थानीय लोगों को आसानी से जानकारी नहीं मिल पाती है। लेकिन इस वनस्पति की पहचान अगर स्थानीय लोगों को बताई जाए तो वे वक्त रहते बचाव कर सकते हैं।
कीट, मकड़ी, तितली देती हैं आपदा की पूर्व चेतावनी
ग्लोबल वार्मिंग, बदलती जैव विविधता, सिमटते ग्लेशियर, गायब होते जंगल, सूखती नदियां और लगातार घट रही दुर्लभ जीव-जंतुओं की संख्या और इन सबके बीच आपदा के तौर पर सामने आने वाला कुदरत का रौद्र रूप।
विकास की होड़ में प्रकृति को हो रहे नुकसान से दुनियाभर के वैज्ञानिक चिंतित हैं। धरती और मानव को बचाए रखने के लिए ताबड़तोड़ शोध भी हो रहे हैं। लेकिन बचाव के बाहरी उपायों की अपेक्षा दून के दो वैज्ञानिकों ने तबाही से पहले प्रकृति से ही आने वाले संकेत को समझने का तरीका खोज निकाला है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वीपी उनियाल के शोध से साफ होता है कि कई नन्हे जीवों, जिनमें मकड़ियां, तितलियां यहां तक कि बिना रीढ़ वाले बेहद छोटे कीट-पतंगे भी शामिल हैं, मौसम में आने वाले बदलावों और इसकी वजह से होने वाले विनाश का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम हैं।
आपदा आने से पहले कई कीट हो जाते हैं गायब
शोध में यह बात सामने आ चुकी है कि हिमालयन रीजन में आपदा आने से पहले कई कीट गायब हो जाते हैं। इसके अलावा कुछ खास कीट तभी नजर आते हैं, जब आपदा आने वाली हो। वह कहते हैं कि इन कीटों पर अध्ययन जारी है। इनके जरिये आपदा का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
उत्तराखंड स्थित वर्ल्ड हेरिटेज साइट नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व में शोध के दौरान डा. उनियाल ने वनस्पति की 1000 और कीट-पतंगों की 520 प्रजातियां पहचानी हैं। इनमें से 150 कीट सिर्फ रिजर्व में ही पाए जाते हैं। डॉ. उनियाल बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के असर को इन कीट पतंगों के अस्तित्व से पहचाना जा सकता है।
डा. उनियाल 27 सितंबर से 12 अक्तूबर के बीच अमेरिका के साल्ट लेक सिटी में आयोजित होने जा रही इंटरनेशनल यूनियन आफ फारेस्ट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन की वर्ल्ड कांग्रेस में अपना शोध पेश करेंगे।
60 एरेक्निड में से 33 हिमालय में
डॉ. वीपी उनियाल के साथ शोध कर रही डॉ. शाजिया कौसीन ने बताया कि देश में कुल 60 फैमिली एरेक्निड (आठ पैरों वाली मकड़ियां) पहचानी गई हैं। इनमें से 33 हिमालयन रीजन में पाई गई हैं। बताया कि इनकी संख्या अचानक घटती या बढ़ती है तो हिमालय में होने वाले परिवर्तन का पता चल जाता है।