पहले ही हो गई थी केदारनाथ प्रलय की आहट
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कहावत है कुदरत अचानक आपदा के रूप में हमला नहीं बोलती, पहले संकेत देती है। केदारनाथ जल प्रलय से पहले प्रकृति साफ चेता रही थी।
लेकिन सरकार, शासन, प्रशासन और आपदा प्रबंधन तंत्र सभी गहरी नींद सोए रहे। शायद आपदा में इतने बड़े पैमाने पर नुकसान होने की वजह यही है।
मौसम के पूर्वानुमानों के मुताबिक ही 13 जून की रात से ही गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी। भारी पैमाने पर भूस्खलन भी शुरू हो गया था।
15 हजार से ज्यादा तीर्थयात्री रास्ते में फंस गए थे। अमर उजाला ने पहले पेज पर यह खबर छापी। भविष्य में स्थिति बिगड़ने की आशंका भी जताई गई थी। लेकिन यात्रियों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया।
उस वक्त तक राज्य में मानसून के आने का ऐलान नहीं किया गया था। केदारघाटी में हजारों तीर्थयात्रियों के फंसे होने और घोड़े-खच्चर वालों की हड़ताल के साथ हेलीकाप्टर सेवा ठप कराने से पैदा हुए हालात के बारे में भी लगातार जानकारी दी जाती रही।
15 जून की रात को प्रलंयकारी बारिश शुरू हुई तो राज्य सरकार के मौसम विभाग ने मानसून के आने की घोषणा कर दी।
इसी दिन अमर उजाला ने लीड खबर के जरिए मानसून आने और उससे हालात बिगड़ने की आशंका जताई। साथ ही राज्य में बढ़ते डैंजर जोनों की ओर भी तर्जनी संकेत किया। लेकिन सरकारी तंत्र ने ध्यान नहीं दिया।
हजारों जान व खरबों की संपत्ति लील गई आपदा
बीते साल केदारनाथ की आपदा वर्ष 2004 में आई सुनामी के बाद दुनिया की सबसे बड़ी कुदरती त्रासदी थी। यह अपने साथ हजारों इंसानी जान, अरबों-खरबों की संपत्ति लील गई।
केदारघाटी की जंगलचट्टी अभी भी लाशें उगल रही है। आपदा अनगिनत परिवारों को ऐसा जख्म दे गई है जिसे वक्त का मरहम भी शायद ही कभी भर पाए।
आपदा के जरिए कुदरत ने तो अपनी ताकत का अहसास करा दिया लेकिन कई यक्ष प्रश्न अनुत्तरित रह गए। क्या आपदा में हुए नुकसान को कम किया जा सकता था?
इसके कुछ दिन बाद ही उड़ीसा में आए भीषण तूफान ने इसका जवाब भी दे दिया। अलर्ट जारी होने के बाद राज्य सरकार ने कमर कसी और प्रचंड तूफान से होने वाले नुकसान को न्यूनतम बना दिया। क्या ऐसा केदारनाथ में भी हो सकता था।
किंतु-परंतु से जो नुकसान हुआ उसे वापस तो नहीं लाया जा सकता लेकिन यह बात तय है कि कुदरत के अलावा इंसानी चेतावनी की भी राज्य सरकार ने भारी अनदेखी की जिसका खामियाजा इतने बड़े पैमाने पर उठाना पड़ा।
यह भविष्य के लिए बड़ा सबक है
मंदाकिनी और अलकनंदा का जल कहर बनकर 16-17 जून की रात को केदारघाटी पर टूटा था। लेकिन उससे पहले ही हालात ऐसे बन रहे थे जिसमें तबाही की इबारत लिखी जा रही थी।
11 जून, 2013 को दिन में ही सैकड़ों वाहन केदारनाथ और बदरीनाथ मार्ग पर फंस गए थे। इलाके में मूसलाधार बारिश हुई थी। भूस्खलन से रास्ते अवरुद्ध हो गए थे।
15 हजार से ज्यादा तीर्थ यात्री रास्तों में रास्तों में फंसे थे। राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। जैसी तैयारियां दीख रही हैं उससे साफ है कि राज्य सरकार ने बीते साल की आपदा से कोई सबक नहीं सीखा।
तीर्थयात्रियों का जमावड़ा, घोड़े-खच्चर वालों की हड़ताल
कुछ ऐसी समस्याएं जिसका समाधान सरकार पहले ही कर सकती थी लेकिन नहीं किया गया जो अंततोगत्वा घातक साबित हुईं।
घोड़े-खच्चर, डंडी-कंडी वालों ने मजदूरी बढ़ाने के लिए चारधाम यात्रा के लगभग डेढ़ महीने बाद जब हड़ताल की तब तक केदारघाटी में अनुमान के मुताबिक सवा से डेढ़ लाख लोग आ चुके थे।
इनके पास दर्शन के बाद पैदल ही वापसी का विकल्प बचा था। इसलिए यात्री बहुत सुस्त गति से लौट रहे थे। हड़तालियों ने फाटा हेलीपैड पर धरना देकर हेलीकाप्टर सेवा भी बंद करवा दी थी।
इससे भी यात्रियों केनिकलने का रास्ता बंद हो गया। सरकार ने इसकी ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। बस स्थानीय प्रशासन आंदोलनकारियों से वार्ता का नाटक करता रहा। अंत में कोई समाधान नहीं निकला और आपदा आ गई।
मौसम अलर्ट की पूरी तरह अनदेखी
मौसम विभाग के अलावा कई वेब साइटों और टूर एडवाइजरी में इलाके में 11 जून से अगले चार दिन तक भारी से भारी बारिश और बादल फटने की साफ चेतावनी दी गई थी।
राज्य सरकार, शासन अथवा किसी जिला प्रशासन ने इसका नोटिस ही नहीं लिया। न सरकार जागी, न प्रशासन न ही आपदा प्रबंधन। ऐसे में ऐहतियाती उपाय क्या किए जाते आसानी से समझा जा सकता है।
न कोई गाइड लाइन, न ही भूगोल बताने वाली पुस्तिका
आस्था के वशीभूत होकर अनाहूत उमड़े तीर्थयात्रियों की संख्या पर राज्य सरकार इतराती तो रही लेकिन इतना भी नहीं हो सका कि यात्रियों को किसी तरह की गाइड लाइन देती अथवा इलाके का भूगोल बताती एक पुस्तिका तक थमाई जाती।
आपदा में फंसे तीर्थयात्रियों में से कई ने बाद में जब आपबीती सुनाई तो इस मुद्दे पर राज्य सरकार की खामी साफ तौर पर उभर कर सामने आई।
जल प्रलय से बचे कई तीर्थयात्रियों को इलाके के भूगोल की अज्ञानता, भूख और बीमारी ने मार डाला। कुछ शवों के पोस्ट मार्टम रिपोर्टों से खुलासा हुआ कि मरे लोगों के पेट में अन्न का एक दाना तक नहीं था।
आपदा प्रबंधन का वजूद ही नहीं दिखा
कुदरती लिहाज से अति संवेदनशील राज्य के आपदा प्रबंधन की खूबियों और खामियों पर चर्चा करना ही बेकार है क्योंकि आपदा धमक जाने के बाद भी इसका वजूद कहीं नजर नहीं आया।
इसकी विकलांगता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब आपदा के चार दिन बाद राज्य का सूचना विभाग मौतों का आंकड़ा 550 बता रहा था तो यह 207 की संख्या पर अटका पड़ा था।
इतनी भारी बारिश के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे
आंकड़े बताते हैं कि 16-17 जून के दौरान सामान्य बारिश की अपेक्षा 375 फीसदी ज्यादा बारिश हो गई। राजधानी देहरादून में सिर्फ 12 घंटे में ही 220 एमएम बारिश रिकार्ड की गई।
इतने कम समय में इतनी बारिश बादल फटने जैसी घटनाओं में ही होती है। इतनी बारिश की न तो किसी को अपेक्षा थी न ही सरकार अथवा इसका आपदा प्रबंधन तंत्र इसके लिए तैयार था। जाहिर है नुकसान तो होना ही था।
राहत एजेंसियों में तालमेल ही नहीं
जंगल चट्टी में साल भर बाद भी शव मिल रहे हैं। इसमें अचरज आपदा की रिपोर्टें बताती हैं कि सैकड़ों तीर्थयात्री इलाके का भूगोल न जानने की वजह से जंगलों में भटक गए।
कई भूख और बीमारी के चलते मर गए। उन्हें फौरी मदद मिलती तो शायद सैकड़ों जानें बचाई जा सकती थी। सरकार को तो आपदा की भयावहता का कई दिनों तक अनुमान ही नहीं लगा जानकारी तो बहुत दूर की बात है।
जब जानकारियां भी आईं तो राहत एजेंसियों में सरकार और शासन का कोई तालमेल नहीं रह गया था।
यह भी विडंबना है कि सरकार के ही एक मंत्री ने हेलीकाप्टर से केदारनाथ का निजी दौरा करके मीडिया को आपदा की तस्वीरें मुहैया कराईं तो दारुण स्थिति सामने आ सकी।
बेलगाम घोड़ों की तरह राहत पहुंचाने की कवायद की गई। आपदा में एनडीआरएफ की टीमें सबसे ज्यादा असरदार साबित हो सकती थीं लेकिन उन्हें एक अदद हेलीकाप्टर तक मुहैया नहीं कराया गया।
एनडीआरएफ की टीमों को पैदल ही प्रभावित इलाकों में जाने को कहा गया। ऐसी सूरत में राहत एजेंसियों और सरकार के बीच तालमेल बैठाने के लिए केंद्र को वी के दुग्गल के रूप में अपना प्रतिनिधि भेजना पड़ा।