केदारनाथ में उस रात नाच रही थी मौत
सोमवार 17 जून 2013 की वह सुबह तो रात से भी काली थी। 16 जून, 2013 को रविवार था। चारधाम यात्रा अपने चरम पर थी।
लाखों यात्री केदार बाबा और बदरीनाथ के दर्शनों को केदारघाटी में थे। कोई दिन में बाबा के दर्शन करके होटल, अतिथिगृहों में आराम कर रहा था। कई शाम को केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह में आरती और भजन की सुरलहरियों में खोया था।
उत्तराखंड में वक्त से पहले धमका मानसून घटाटोप बनकर बरस रहा था। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक पश्चिमी विक्षोभ का गठजोड़ इसे प्रलंयकारी बना रहा था।
इंद्रदेव बूंदों के बाण नहीं वज्र चलाए जा रहे थे। रात खौफनाक हो चली थी। आधी रात होते-होते मंदाकिनी उफना गई थी। पानी ऊपर चढ़ने लगा था। मंदिर परिसर के आसपास के भवनों तक पानी की लहरें मचल रही थीं।
प्रशासनिक अमले को हो चला था अहसास
केदारघाटी में मौजूद प्रशासनिक अमले को खतरे का अहसास हो चला था। आनन-फानन में होटल और अतिथिगृह खाली कराए जाने लगे। लोगों को जबरन बाहर किया जाने लगा।
बिना इस बात की फिक्र किए कि भीषण बारिश में लोग कहां जाएंगे। खतरे की सीमा, इलाके के भूगोल और अपने भविष्य से अनजान लोग भागने लगे थे।
कोई ऊपर की पहाड़ियों में खुद को सुरक्षित करने में लगा था तो कोई जंगल का रास्ता पकड़ रहा था। जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में सुबह हो गई।
उस वक्त केदारनाथ मंदिर में मौजूद वेदपाठी नरेश कुकरेती बताते हैं कि सुबह करीब साढ़े छह बजे तक पानी का वेग कुछ कम हुआ।
उस वक्त वहां मौजूद लोगों के चेहरे पर रात के सही सलामत गुजरने का सुकून था। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। सोमवार की सुबह ठीक सवा सात बजे शिव का रौद्र रूप सामने आया।
मंदाकिनी के स्रोत पर धमाके के साथ करीब ढाई सौ मीटर ऊंचा काला बादल उठा।
(बाद में पता चला कि भारी बारिश और गर्मी के चलते चौराबारी ग्लेशियर पिघल गया था और केदारनाथ धाम के पीछे गांधी सरोवर टूट चुका था) धूल, गर्द और धुएं का गुबार चारो और फैल गया। अगले ही पल लगा प्रलय आ गई।
ताश के पत्तों की तरह ढह गए भवन
तूफानी हवाओं के साथ आए पानी के तेज बहाव ने वहां मौजूद भवनों को ताश के पत्तों की तरह ढहाना शुरू कर दिया। अगले ही पल सभी मौजूद लोग मलबे में बुरी तरह घिरे थे।
इस बीच फिर मूसलाधार बारिश शुरू हो चली थी। चारों ओर बचाओ, बचाओ का स्वर गूंजने लगा था। जिधर देखो उधर लोग बहते, बचने के लिए हाथ-पांव मारते नजर आ रहे थे। चारों ओर मौत नाच रही थी।
अपनी जान बचाने के लाले पड़े थे। बच्चों के सामने मां-बाप, माता-पिता की आंखों के सामने बच्चे, पत्नी के सामने पति, पति के सामने पत्नी को सैलाब में बहते हुए देखने की मजबूरी थी।
हर ओर बेबसी और लाचारी का आलम था। क्रूर कुदरत ने मदद के हर रास्ते बंद कर दिए थे। जब कुदरत की विनाशलीला थमी तो ऐसी मार्मिक कहानियां सामने आईं जिसे सुनकर पत्थरदिल भी मोम हो सकता था।
कुछ ऐसी भी दास्तां होंगी जिसे न तो सुनाने वाला बचा, न ही कोई सुनने वाला।
मिट्टी खुरच कर निकाली बेटे की लाश
मध्य प्रदेश के लाचार सुरपाल ने अपनी मां को आंखों के सामने बहते देखा। केदार बाबा के आशीर्वाद से 41 साल की उम्र में मां बनी राधिका उनका शुकराना अदा करने आई थी।
आपदा ने उसके जुड़वा बेटे लील लिए। लुधियाना निवासी संदीप सलवान की आंखों के सामने उनका 12 साल का बेटा सर्वेश बचने की जद्दोजहद में पहाड़ी झरने की चपेट में आ गया।
जौनपुर यूपी के उपाध्याय परिवार की तीन बहादुर बेटियों नेहा, विभा और भावना ने अपने मलबे में दबे अपने पिता शिव प्रसाद उपाध्याय को हाथों से मिट्टी खुरच-खुरच कर बचा लिया लेकिन भाई उत्कर्ष का नहीं बचा पाईं।
उसे जब निकाला गया तो वह लाश में तब्दील हो चुका था।
बचे पिता ने कलेजे पर पत्थर रखकर अपनी बेटियों को हौसला दिया और हालात को देखते हुए बेटे उत्कर्ष के शव का मुक्ति प्रदान करने की मंशा से खुद अपने हाथों मंदाकिनी में धकेल दिया।
पूरा परिवार अपलक अपने कलेजे के टुकड़े को तबतक निहारता रहा जब तक मंदाकिनी की लहरों ने उसे पूरी तरह अपने आगोश में नहीं ले लिया।
सहारनपुर की सविता दो दिन तक अपने पति के शव को सीने से चिपकाई बावरी बैठी रही। राजस्थान के यात्री कल्याण सिंह पत्नी मालती समेत जिस भवन में ठहरे हुए थे, उसकी तीसरी मंजिल तक पानी आ गया।
डरे सहमे सभी तीसरी मंजिल पर आ गए। इसी बीच उनकी पत्नी मालती का हाथ छूटा और पानी उसे अपनी ओर खींच ले गया।