कोरोना का एक सालः लॉकडाउन के दौरान उत्तराखंड सरकार ने दी प्रवासियों को छूट, साढ़े तीन लाख लौटे लेकिन परेशानी भी बढ़ी
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पिछले साथ मार्च महीने में कोरोना लॉकडाउन लगा। जिन इलाकों में कोरोना के मरीज आ रहे थे, वहां बंदिशें लगाई गईं। स्थिति नियंत्रण में आने लगी, लेकिन सरकार ने प्रवासियों का लाने का जो फैसला लिया, उससे चिंताएं बढ़ गई। प्रवासियों को तो राहत मिली, लेकिन अधिकारियों के लिए चुनौती बन गई। इस चुनौती से जूझते हुए साढ़े तीन लाख से अधिक प्रवासियों को उनके घर तक सकुशल पहुंचाया गया।
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राज्य सरकार ने कोरोना लॉकडाउन के बीच मई महीने में प्रवासियों को वापस उत्तराखंड लाने का ऐलान किया। एक ओर केंद्र सरकार ने विशेष ट्रेनों का संचालन शुरू कर दिया तो दूसरी ओर राज्य सरकार ने भी इस दिशा में अपनी बसें दूसरे राज्यों को भेजनी शुरू कर दी। कोरोना लॉकडाउन की वजह से अपने काम धंधे ठप होने से परेशान प्रवासियों के लिए सरकार की यह घोषणा बड़ी राहत लेकर आई।
देहरादून और प्रदेश के दूसरे हिस्सों में जितनी भी ट्रेनें आईं, फुल होकर आई। सरकार ने यह घोषणा तो कर दी थी, लेकिन इन प्रवासियों को कोरोना से बचाकर, प्रदेश को महामारी फैलने से सुरक्षित रखते हुए उनके घर तक पहुंचाना चुनौती था।
देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी में बनाए गए प्रवासियों के ठिकाने
प्रदेश के देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी जैसे शहरों में सरकार ने प्रवासियों के ठिकाने बनाए। जो भी बस आती, वह प्रवासियों को यहां से लेकर जाती। इन जगहों पर उनकी जांच की जाती। उनका पूरा रिकॉर्ड रखा जाता। एंटीजन टेस्टिंग में अगर कोई पॉजिटिव आ जाता तो उसे या तो अस्पताल में भर्ती कराया जाता था या क्वारंटीन सेंटर में भेज दिया जाता था। वहां रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद ही उसे उसके घर रवाना किया जाता था। इससे काफी राहत मिली।
प्रवासियों के लिए ऑनलाइन पंजीकरण
प्रवासियों के अपने घर लौटने की प्रक्रिया दुरुस्त रखने के लिए सरकार ने घर वापसी करने वालों के पंजीकरण की ऑनलाइन व्यवस्था शुरू की। देखते ही देखते पंजीकरण का आंकड़ा बढ़ता चला गया। हालांकि इस प्रक्रिया से प्रवासियों को सकुशल लाने में काफी आसानी हुई।
खाली बैठे प्रवासियों के लिए रोजगार का जरिया बना होप
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 13 मई 2020 को होप यानी हेल्पिंग आउट पीपुल एवरीव्हेयर की शुरुआत की। इसका मकसद था कि प्रवासियों को उनकी स्किल के हिसाब से रोजगार मुहैया हो। कुछ ही महीनों में करीब 60 हजार प्रवासियों ने रोजगार की जरूरत के तहत इस पोर्टल पर अपना पंजीकरण कराया। सरकार की ओर से अभी भी होप पोर्टल के माध्यम से प्रवासियों को रोजगार की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
मनरेगा के तहत बढ़ी काम की मांग
लॉकडाउन के बाद राज्य में मनरेगा कार्य की मांग बढ़ी। जुलाई 2019 में जहां 90,623 परिवारों ने मनरेगा का काम मांगा था, वहीं 2020 जुलाई में लगभग ढाई गुणा अधिक 2,40,221 परिवारों ने मनरेगा का काम मांगा। इससे पहले अप्रैल में 74,951 परिवारों ने मनरेगा के काम की मांग की थी, जबकि मई में 1,95,182 परिवारों ने काम मांगा तो जून में 2,24,510 परिवारों ने काम मांगा था। 2019-20 में अप्रैल माह में काम मांगने वाले परिवारों की संख्या 1,27,912, मई में 99,651 व जून में 82,107 थी। कोरोना महामारी के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ी।
सरकार ने राशन कार्ड के बिना भी दिया राशन
राज्य सरकार ने प्रवासियों को राशन के मामले में भी बड़ी राहत दी। राशन में गुलाबी या पीले कार्ड की अनिवार्यता को खत्म करते हुए सरकार ने आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत प्रवासियों को राशन दिया। राशन में उन्हें पांच किलो गेहूं और एक किलो दाल निशुल्क दी गई। कई महीने तक यह सिलसिला चलता रहा, जिससे प्रवासियों को राहत मिली।
अभिनव प्रयोग कर प्रवासी हुए आत्मनिर्भर
जिन प्रवासियों को घर लौटने के बाद रोजगार नहीं मिल पाया, उन्होंने अपने अभिनव प्रयोग से अपने काम शुरू किए। दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में रेस्टोरेंट में काम करने वाले प्रवासियों ने पहाड़ में ही छोटे-छोटे रेस्त्रां खोलकर रोजगार की राह बनाई। पौड़ी के युवाओं ने हेयर सैलून खोला, जिसमें कई लोगों को रोजगार भी दिया और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बना। इसके अलावा बुरांश का जूस, मशरूम जैसे उत्पादन से भी प्रवासियों के लिए रोजगार की राह खुली।