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दलित संग कब साझा होगा ‘ठाकुर का कुआं’
प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 18 Nov 2013 09:12 AM IST
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...चूल्हा मिट्टी का/मिट्टी तालाब की/ तालाब ठाकुर का। भूख रोटी की/रोटी बाजरे की/बाजरा खेत का/ खेत ठाकुर का।
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बैल ठाकुर का/हल ठाकुर का/हल की मूठ पर हथेली अपनी/फसल ठाकुर की। कुआं ठाकुर का/पानी ठाकुर का/खेत-खलिहान ठाकुर के/गली-मोहल्ले ठाकुर के/फिर अपना क्या....?’
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इस ‘क्या’ के सवाल पर मुखर रही वरिष्ष्ठ साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की कलम। दबे, कुचलों, दलितों की पीड़ा को बेहद सरल, सहज भाषा में उकेरा था मशहूर साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ताकि आम आदमी भी समझ ले कि जाति भेद के नाम पर कैसी विष बेल फैली है ।
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उत्तर भारत में दलित साहित्य की नींव
वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ को उत्तर भारत में दलित साहित्य की नींव की संज्ञा दी गई। तकरीबन चार साल पहले नेशनल दलित राइटिंग कांफ्रेंस के दौरान जब किसी ने सवाल पूछा था कि आखिर दलित साहित्यकारों का फोकस साहित्य सृजन के लिए आत्मकथा पर ही क्यों होता है? तो उनका जवाब-था कि उपन्यास लेखन दलित लेखक की दृष्टि से देखें तो कल्पनाओं से भरपूर विधा मानता है।
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ऐसे में पीड़ा, क्षोभ को केवल भोगा हुआ यथार्थ ही सामने परोस सकता है। कल्पनाशील लेखन नहीं। ओमप्रकाश वाल्मीकि मानते थे कि उत्तर भारत में दलित लेखन मराठी दलित लेखन से बहुत पीछे है। शायद ऐसा इसलिए क्योंकि मराठी लेखन रचना आयु में यहां से 25 वर्ष बड़ा है।
इस साहित्य में कई बार समाज का विरोध भी नजर आता है। वह दरअसल उन स्थितियों का प्रतिकार होता है, जो एक रचनाकार के दबे, कुचले होने के अहसास को व्यक्त करता है।
सोशल साइट्स पर श्रद्धांजलि का तांता
ओमप्रकाश वाल्मीकि के निधन के बाद उनके प्रशंसकों ने देश भर के साहित्यकारों को फेसबुक जैसी सोशल साइट के जरिए अपडेट किया। इस बीच खबर फैली कि वह स्वस्थ हैं तो एक महिला लेखिका ने शोक संवेदना जताने के लिए माफी मांगते हुए उनकी लंबी आयु की कामना कर डाली।
पुन: किसी साथी ने निधन की पुष्टि की तो एक बार फिर उन्होंने शोक संवेदना जताई। दून से बाहर रह रहे साहित्यकारों के बीच ओमप्रकाश वाल्मीकि के निधन की सूचना को लेकर यह ऊहापोह की स्थिति बनी रही और वह मोबाइल फोन के माध्यम से सूचना की पुष्टि करते गए।
उदयप्रकाश, लोकनाथ यशवंत, प्रेमचंद गांधी आदि रचनाकारों ने फेसबुक के ही माध्यम से वरिष्ठ दलित साहित्य लेखक को श्रद्धांजलि दी। हर किसी ने अपने शब्द लिखे। एक साहित्यकार के शब्द कुछ यूं थे, ‘सच ही खबर गलत है, देह मरती है, आत्मा नहीं। यह अलख जिंदा है...’।
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